अब राजस्थान सरकार खुद बेचेगी 'तेज करंट वाली अंग्रेजी शराब', ब्रांड का नाम होगा RML

आबकारी थानों, आबकारी निरोधक दल, कार्यालयों पर वर्ष 2013-2014 से वर्ष 2018-19 तक कुल 2, 99,71,70,908 रुपए खर्च हुए हैं. 

अब राजस्थान सरकार खुद बेचेगी 'तेज करंट वाली अंग्रेजी शराब', ब्रांड का नाम होगा RML
हरियाणा से तस्करी की शराब रोकने के लिए राज्य सरकार ने नई आबकारी नीति में नया दांव खेला है.

जयपुर: हरियाणा से आने वाली तस्करी की हल्की सस्ती अंग्रेजी शराब को रोकने के लिए राज्य सरकार अब खुद तेज करंट वाली अंग्रेजी शराब बनाकर बेचेगी. यह शराब देसी शराब की दुकानों पर आरएमएल (राजस्थान निर्मित मदिरा) के नाम से बिकेगी. 

नई आबकारी नीति में सरकार ने हरियाणा से तस्करी की शराब रोकने के लिए RML की अंग्रेजी मदिरा को देशी शराब की दुकानों पर उतारने का नया दांव खेला है.

हरियाणा से तस्करी की शराब रोकने के लिए राज्य सरकार ने नई आबकारी नीति में नया दांव खेला है. सरकार का मानना है कि बहुतायत में हरियाणा से तस्करी होकर शराब गुजरात के अलावा राजस्थान में बेची जाती है. यह अंग्रेजी शराब हल्की होने के बावजूद सस्ती के चक्कर में लोग धडल्ले से पीते हैं. इसको रोकने के लिए सरकार राजस्थान में ही निर्मित अंग्रेजी मदिरा में तेजी डालकर (करंट) देशी शराब की दुकानों पर बेचेगी. यह शराब 25 यूपी (अंडर प्रूफ) की होगी.

'देसी के साथ राजस्थानी अंग्रेजी शराब' की ब्रिकी होगी
आबकारी अधिकारियों के मुताबिक, देशी शराब ठेकों पर 'देसी के साथ राजस्थानी अंग्रेजी शराब' की ब्रिकी होगी. आरएमएल उच्च गुणवत्ता युक्त मदिरा होगी, जिसमें व्हिसकी, रम, वोदका, जिन ब्रांड भी होंगे. यह पव्वे और नए पैक में बिकेगी. इसको बॉटलिंग और उत्पादन करने वाली इकाईयों की ओर से ही आपूर्ति की जा सकेगी. उत्पादन और आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में नहीं होने पर इसके लिए राज्य सरकार आवश्यक निर्णय ले सकेगी.

तस्करी घटने के बजाय बढ़ती जा रही है
राजस्थान में शराब की तस्करी रोकने में आबकारी प्रवर्तन निदेशालय की व्यवस्था पूरे राज्य में नाकाम साबित हुई. इस व्यवस्था से सरकारी खजाने से प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का खर्च हो रहा है लेकिन इसके बावजूद तस्कर और तस्करी घटने के बजाय बढ़ती जा रही है. तस्करी की अवैध रोकथाम के लिए सरकार ने आबकारी निदेशालय के 1 अप्रैल 2005 को राज्य में 150 थाने स्वीकृत किए गए थे, जिनमें पहले राजस्थान पुलिस और बॉर्डर होमगार्ड लगाए गए. बाद में सरकार ने भर्ती की. हर थाने को अच्छा भवन, सरकारी मोबाइल, हथियार और दस से पंद्रह की नफरी उपलब्ध करवाई गई लेकिन इसका कोई खासा परिणाम नहीं आया.

वर्तमान में 149 आबकारी थाने संचालित हैं
हर साल इस लंबे-चौड़े लवामजे पर सरकार करीब 80-90 करोड रुपये खर्च कर रही है. आबकारी विभाग के आंकडों को देखें तो आबकारी थानों, आबकारी निरोधक दल, कार्यालयों पर वर्ष 2013-2014 से वर्ष 2018-19 तक कुल 2, 99,71,70,908 रुपए खर्च हुए हैं. इनमें कार्यरत अधिकारियों, कर्मचारियों के वेतन भत्ते, वाहन, भवन किराया, रख-रखाव सहित सभी खर्च शामिल हैं. राज्य सरकार की ओर से 23 अक्टूबर, 2005 और 06 मार्च, 2012 को जारी आदेश के बाद वर्तमान में 149 आबकारी थाने संचालित हैं. सभी आबकारी थानों का कार्य अवैध शराब की तस्करी रोकना, उन्हें पकड़ना और अवैध शराब के निर्माण, भण्डारण, परिवहन एवं विक्रय पर नियंत्रण करना है.

मिलीभगत कर ट्रक को पार करवाया जाता
बहरहाल, जानकारों की मानें तो वर्तमान में प्रतिदिन 25 से 30 ट्रक गुजरात शराब तस्करी के पहुंचते हैं. धरपकड़ के चलते इनकी संख्या कम होने के साथ ही रूट बदल दिए जाते हैं लेकिन तस्करी बरकरार रहती है. तस्कर एस्कोर्ट करते हुए पूरी तरह से मिलीभगत कर ट्रक को पार करवाते हैं. दिखावे के लिए धरपकड़ के दौरान ज्यादा कॉर्टन वाली हल्की शराब पकड़वाई जाती है. हरियाणा से गुजरात शराब तस्करी के कारोबार को सभी को पता है लेकिन गुजरात में मद निषेध होने से चंडीगढ़ और राजस्थान से ज्यादा कीमत वहां मिलने से इनमें से कई तस्कर जुड़े हैं.