राजस्थान: गुर्जर आरक्षण के लिए फिर विधेयक ला सकती है सरकार, लेकिन...

राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकारों ने माना कि गुर्जरों को आरक्षण मिलना चाहिए. इसको लेकर सरकारों ने अपने कदम आगे तो बढ़ाए, लेकिन हर बार मामला अदालत में अटक गया.

राजस्थान: गुर्जर आरक्षण के लिए फिर विधेयक ला सकती है सरकार, लेकिन...
सर्वणों को 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने के बाद दायरा 50 से बढकर 60 तक पहुंच गया है.

जयपुर/ आशीष चौहान: राजस्थान में गुर्जर आरक्षण को लेकर लगातार आग बढ़ती ला रही है. आरक्षण की आग बुझाने के लिए गहलोत सरकार लगातार अपने कदम आगे बढ़ा रही है. इसको लेकर एक बार फिर से सरकार विधेयक ला सकती है. इससे पहले भी गुर्जरों को आरक्षण दिए जाने के लिए सरकार तीन बार विधेयक लेकर आई और एक बार नोटिफिकेशन के जरिए आरक्षण दिया लेकिन हर बार आरक्षण का मामला अदालत में अटका और बार बार आरक्षण की आग लगती चली गई.

राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकारों ने माना कि गुर्जरों को आरक्षण मिलना चाहिए. इसको लेकर सरकारों ने अपने कदम आगे तो बढ़ाए, लेकिन हर बार मामला अदालत में अटक गया. सरकार बार बार विधेयक लाती रही, कोर्ट बार बार उस पर स्टे लगाता रहा. राजस्थान में पहली बार सरकार 2008 में विधेयक लाई. उसमें आरक्षण का दायरा 68 प्रतिशत हो गया था. जिसमें ईबीसी को 14, 5 प्रतिशत एसबीसी, 21 प्रतिशत ओबीसी, 16 प्रतिशत एससी, 12 प्रतिशत एसटी को आरक्षण दिया गया था लेकिन कोर्ट ने यह कहते हुए रोक लगाया कि आरक्षण का दायरा बहुत ज्यादा हो रहा है. उस वक्त गुर्जरों को एसबीसी कोटे से 5 फीसदी आरक्षण दिया गया था.

2008 में कोर्ट के स्टे के बाद राजस्थान सरकार 2012 में नोटिफिकेशन लेकर आई. जिसमें गुर्जर समेत एसबीसी की पांचों जातियों को 5 प्रतिशत आरक्षण दिया. लेकिन इसे भी कोर्ट में चैलेंज किया गया और कोर्ट ने स्टे लगा दिया. 2015 में सरकार दूसरी बार गुर्जरों को आरक्षण देने के लिए विधेयक लाई, लेकिन कोर्ट ने ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट सही नहीं मानी और आरक्षण को खारिज कर दिया. इसके बार 2018 में मानसून सत्र में राजस्थान सरकार तीसरी बार विधेयक लेकर आई. विधेयक सदन में पास भी हो गया. लेकिन कुछ दिनों बाद ही हाईकोर्ट ने रोक लगा दी. जिसके बाद राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में गई, लेकिन वहां भी कोर्ट ने 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण होने पर रोक लगा दी. कोर्ट की रोक के बाद गुर्जरो के लिए मोर बेकवर्ड क्लास बनाया गया. जिसमें 1% आरक्षण का लाभ दिया. 1 प्रतिशत आरक्षण का लाभ ठुकराते हुए गुर्जरों ने पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग की और आंदोलन का ऐलान कर दिया लेकिन उसके बाद विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने के बाद गुर्जरों ने आंदोलन नहीं किया.

विधानसभा चुनाव के बाद गहलोत सरकार के आते ही फिर आंदोलन की आग लगी. अब सरकार मामले को देखते हुए फिर से विधेयक लेकर आएगी. हालांकि, गहलोत सरकार बार बार ये कह रही है कि संविधान में संशोधन के बिना कोई स्थाई समाधान नहीं निकल सकता है. संवधिान में संशोधन केंद्र सरकार को करना है. सर्वणों को 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने के बाद दायरा 50 से बढकर 60 तक पहुंच गया है, लेकिन गुर्जरों को आरक्षण देने के लिए ये दायरा बढाना पढेगा. इसके लिए संविधान में संशोधन करना ही पड़ेगा. यदि सरकार फिर से विधेयक लाई तो मामला एक बार फिर से कोर्ट में अटक सकता है. इसलिए गहलोत सरकार आरक्षण पर स्थायी समाधान निकालना चाहती है. सरकार की मांग है कि केंद्र सरकार संविधान में संशोधन कर आरक्षण का दायरा बढाएं.

क्या मजबूरी है गुर्जर आरक्षण पर सीएम गहलोत की
गुर्जर आरक्षण पर गहलोत सरकार कि मजबूरी ये है कि यदि विधेयक के जरिए गुर्जरों को 5 फीसदी आरक्षण दे भी दिया तो मामला कोर्ट में अटक सकता है. गहलोत सरकार मामले को लेकर स्थायी समाधान चाहती है. प्रदेश में आरक्षण का दायरा 50 फीसदी तक सीमित है. जबकि संविधान में संशोधन का अधिकार केंद्र सरकार के पास है. संविधान संशोधन के बाद ही आरक्षण का दायरा बढ़ सकता है. यदि संविधान संशोधन बिना विधेयक लाकर आरक्षण दिया तो फिर मामला कोर्ट में अटकने के आसार है. राजस्थान में मौजूदा आरक्षण की स्थिति की बात करें तो  16 प्रतिशत आरक्षण एससी को, 12 फीसदी एसटी को, 21 फीसदी आरक्षण ओबीसी के लिए प्रस्तावित है. ऐसे में कुल 49 फीसदी आरक्षण हो जाता है. ऐसे में सरकार के पास 1 फीसदी आरक्षण ही बचता है. बाकी के चार फीसदी आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन करना ही पड़ेगा, नहीं तो मामला बार बार कोर्ट में अटकना तय है.