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राजस्थान: सदन में गूंजा 'जय आदिवासी' का नारा, उठी भील प्रदेश की मांग

शपथ के बाद आदिवासियों का जयकारा और जय भील प्रदेश का नारा लगाने वाले रामप्रसाद कहते हैं कि उनका क्षेत्र आदिवासी क्षेत्र है

राजस्थान: सदन में गूंजा 'जय आदिवासी' का नारा, उठी भील प्रदेश की मांग
नेता जी ने जय आदिवासी और जय भील प्रदेश का नारा लगाकर पूरे सदन को चौंका दिया

जयपुर : प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन के साथ ही नई चिंता भी उभरती दिख रही है. यह चिंता पन्द्रहवीं विधानसभा के पहले सत्र के साथ ही उभरना शुरू हो गई है हालांकि अभी तक इसकी गम्भीरता का अंदाजा किसी को नहीं है. कई बार ऐसा माना जाता है कि यह चिंता केलव उन लोगों को है जो राजस्थान की विविधता में एकता को नहीं समझते हैं, जबकि कुछ मानते हैं कि यह अलार्म है और इसे बड़ी चुनौती से पहले की आहट के रूप में देखा जाना चाहिए. यह संभावित चुनौती है. राजस्थान के दक्षिणी हिस्से से भील प्रदेश की मांग की आवाज आई है. 

आम तौर पर प्रदेश की राजनीति में अलूफ माने जाते रहे वागड़ में अचानक से हलचल दिखी है. यह हलचल आदिवासी प्रदेश या कहें भील प्रदेश की आहट को लेकर है. दरअसल विधानसभा चुनाव से पहले इस मामले पर कोई भी इतनी गम्भीरता से नहीं सोच रहा था. लेकिन नई विधानसभा के पहले सत्र में सदस्यों की शपथ के दौरान दो नाम चौंकाने वाले थे. वैसे तो राजुमार रोत और चुनाव दिसम्बर में ही जीत चुके थे और इनकी जीत ने प्रदेश के राजनीतिक मानचित्र पर भारतीय ट्राइबल पार्टी की उपस्थिति भी दर्ज करा दी थी. अबकी बार प्रकृति के नाम पर शपथ लेने वाले राजकुमार रोथ के साथ शपथ के बाद जय आदिवासी और जय भील प्रदेश का नारा लगाकर पूरे सदन को चौंका दिया. 

इस बार सदन के सबसे युवा विधायकों में शुमार राजकुमार रोत चोरासी विधासनभा से जीतकर आए हैं. पूर्व मंत्री सुशील कटारा को हराकर सदन में आने वाले रोत अपनी शपथ के बारे में कहते हैं कि उनके क्षेत्र में प्रकृति को पूजा जाता है और उस प्रकृति को बाहर से आए लोग खराब कर रहे हैं. ऐसे में वे प्रकृति की अहमियत फिर से स्थापित करने की कोशिश करेगे और क्षेत्र के आदिवासियों को मजबूत करेंगे. 

वहीं अपनी शपथ के बाद आदिवासियों का जयकारा और जय भील प्रदेश का नारा लगाने वाले रामप्रसाद कहते हैं कि उनका क्षेत्र आदिवासी क्षेत्र है. वे कहते हैं कि डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ के साथ ही गुजरात के दाहोद और उससे लगे जिलों के साथ ही मध्य प्रदेश के झाबुआ और उसके आस-पास का क्षेत्र भील प्रदेश की श्रेणी में आता है. सागवाड़ा विधायक रामप्रसाद कहते हैं कि इस क्षेत्र में आदिवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है, और यहां भी विकास की दरकार है. 

इससे पहले 9 अगस्त को हर साल विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर प्रतापगढ़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा में आयोजन होते हैं. ऐसे ही एक आयोजन में तकरीबन डेढ़ साल पहले आदिवासी महासभा ने 22 मुद्दों का अपना अलग मांग पत्र भी तैयार किया. आदिवासी महासभा ने अपने साथ 15 राज्यों के अलग-अलग संगठनों को अपने साथ जोड़ा. हालांकि भील प्रदेश की आहट को पूर्व गृह मन्त्री और नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया ज्यादा दमदार नहीं मानते. कटारिया कहते हैं कि भील प्रदेश की चर्चा तो होती है लेकिन यह बहुत अस्त-व्यस्त हिस्सा है, लिहाजा इसमें ज्यादा गम्भीरता नहीं दिखती. 

कटारिया कुछ दिन पहले ही सरकार से बाहर हुए हैं, लेकिन नई आई सरकार के लिए भी अभी तक यह मामला ज्यादा गम्भीर संकट वाला नहीं दिख रहा है. हालांकि सरकारी स्तर पर इतना ज़रूर कहा जाता है कि टीएसपी एरिया के लिए सरकार विशेष योजनाएं ला रही है तो इस क्षेत्र के विकास पर ख़ास फोकस है.