जिस बग्वाल को कभी अंग्रेज नहीं रोक पाए, इस बार वो कोरोना के चलते नहीं खेली जाएगी

कहा जाता कि एक बार अंग्रेजों ने भी बग्वाल को रोकने का प्रयास किया था, लेकिन तब भी बग्वाल खेली गई थी. वहीं इस बार कोरोना महामारी के चलते बग्वाल न खोलने का फैसला लिया है.

जिस बग्वाल को कभी अंग्रेज नहीं रोक पाए, इस बार वो कोरोना के चलते नहीं खेली जाएगी
बग्वाल मेले की पुरानी तस्वीर.

ललित मोहन भट्ट/चंपावत: इतिहास में पहली बार विश्व प्रसिद्ध मां बाराही धाम देवीधुरा की बग्वाल नहीं खेली जाएगी, कोरोना महामारी के कारण चंपावत जिला प्रशासन और मंदिर कमेटी ने यह निर्णय लिया है. रक्षाबंधन के दिन होने वाली ऐतिहासिक बग्वाल में इस बार सिर्फ पूजा-अर्चना और मंदिर मैदान की परिक्रमा चार खाम और 7 तोकों मंदिर समिति के चुनिंदा लोग ही करेंगे.

कहा जाता कि एक बार अंग्रेजों ने भी बग्वाल को रोकने का प्रयास किया था, लेकिन तब भी बग्वाल खेली गई थी. वहीं इस बार कोरोना महामारी के चलते बग्वाल न खोलने का फैसला लिया गया है. बता दें कि बग्वाल में चार खाम और सात तोकों के वीर मां बाराही को प्रसन्न करने के लिए एक दूसरे पर पत्थरों की वर्षा होती है. जब तक एक आदमी के शरीर के बराबर रक्त नहीं बह जाता था तब तक बग्वाल खेली जाती थी.

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मान्यता है कि देवीधुरा क्षेत्र में नरवेगी यज्ञ हुआ करता था जिसमें यहां नर बलि दी जाती थी. हर साल परिवार के किसी एक पुरुष की बलि दी जाती थी. लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्ध महिला के परिवार की बारी आयी तो उनके पास सिर्फ उसका नाती था जो उनका एक मात्र सहारा था. जिसके बाद उन्होंने मां बाराही से प्रार्थना की और कहा जाता है कि मां बाराही ने सपने में दर्शन दिया और समस्त गांव वालों के साथ मिलकर बग्वाल के आयोजन करने के लिए कहा. तब से यह मेला रक्षाबंधन पर खेला जाता है.

लेकिन कुछ सालों से हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बग्वाल खेले जाने के स्वरूप में परिवर्तन आया है, बग्वाल अब फल और फूलों से खेली जाने लगी है. मंदिर में बलि देने की परंपरा भी अब बिल्कुल समाप्त हो गई है.

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