'गुमनामी बाबा' को लेकर क्यों गहराया रहस्य? जानें क्या था उनका नेता जी से कनेक्शन

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में रह रहे गुमनामी बाबा की मृत्यु 16 सितंबर, 1985 को हुई थी, जिसके बाद उनके बारे में चर्चाओं ने और जोर पकड़ा. 

'गुमनामी बाबा' को लेकर क्यों गहराया रहस्य? जानें क्या था उनका नेता जी से कनेक्शन

नई दिल्ली: अंग्रेजों से लड़ कर भारत को आजादी दिलाने की बात जब भी की जाएगी, सुभाष चंद्र बोस का नाम सबसे पहले हमारे दिमाग में आएगा. 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' का नारा बुलंद कर बोस देश की आजादी के लिए जी-जान से लड़े. वह सुभाष चंद्र बोस ही थे, जिन्होंने देशवासियों को समझाया था कि सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है. वह सुभाष चंद्र बोस ही थे, जिन्होंने समझाया था कि सफलता हमेशा असफलता के स्तंभ पर खड़ी है.  

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भारतीय स्वतंत्रा संग्राम के महान योद्धाओं में से एक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज 125वीं जयंती है. आज ही के दिन 1897 को सुभाष चंद्र बोस का जन्म कटक (ओडिशा) में हुआ था. उन्होंने उच्च शिक्षा कलकत्ता के प्रेसिडेंसी और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से प्राप्त की. 1920 में इंग्लैंड में सिविल सर्विस परीक्षा में चौथा स्थान भी हासिल किया. नेताजी से जुड़े कई रोचक किस्‍से हैं, जिन्होंने खूब सुर्खियां बटोरीं. इन्हीं में गुमनामी बाबा से जुड़ा एक किस्सा भी है, जो 1985 में खूब चर्चा में रहा था. आइए जानते हैं कौन थे ये गुमनामी बाबा.

गुमनामी बाबा और नेताजी का रहस्य
सुभाष चंद्र बोस को लेकर यह आम धारणा रही है कि उनका निधन अगस्‍त 1945 में हुए एक विमान हादसे में हो गया था. लेकिन इसे लेकर कोई पुख्ता प्रमाण सामने नहीं आए हैं. इस कारण सुभाष चंद्र बोस को लेकर हमेशा एक रहस्य बरकरार रहा है. कुछ लोगों का जहां मानना है कि उन्‍हें साइबेरिया की एक जेल में रखा गया, वहीं कुछ लोग ये भी मानते रहे हैं कि सुभाष चंद्र बोस का निधन विमान हादसे में नहीं हुआ था और वे एक हिंदू भिक्षु के रूप में भारत लौट आए थे. यहीं से शुरू होता है उनसे जुड़ा गुमनामी बाबा का किस्सा...

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गुमनामी बाबा के पास थीं नेताजी की खास चीजें
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में रह रहे गुमनामी बाबा की मृत्यु 16 सितंबर, 1985 को हुई थी, जिसके बाद उनके बारे में चर्चाओं ने और जोर पकड़ा. शहर के सिविल लाइन्स के 'राम भवन' में रहने वाले गुमनामी बाबा को स्थानीय लोग भगवानजी के नाम से भी जानते थे. उन्हें गुमनामी बाबा इसलिए कहा जाता था, क्‍योंकि वह बेहद गोपनीय तरीके से यहां रहते थे. उनसे मिलने-जुलने की इजाजत बहुत कम लोगों को थी. उनका अंतिम संस्‍कार भी इसी तरह की गोपनीयता के साथ किया गया था. लेकिन लोगों के मन में उन्हें लेकर रहस्य हमेशा से बरकरार रहा.

फर्राटेदार अंग्रेजी, जर्मन भाषा बोलते थे गुमनामी बाबा
उस वक्त जो रिपोर्ट्स आई थीं, उनमें गुमनामी बाबा को थोड़ा-बहुत जानने वालों के हवाले से यह भी कहा गया कि वह फर्राटेदार अंग्रेजी और जर्मन भाषा बोलते थे. उनके पास दुनियाभर के नामचीन अखबार, पत्रिकाएं और साहित्य भी पहुंचते थे. उनके निधन के बाद जब कमरे से मिले सामानों को देखा गया तो वहां किताबों और अखबारों का जखीरा मिला था.

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रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके पास से नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार की तस्वीरों के साथ-साथ वे चिट्ठियां भी मिलीं, जो कलकत्ता से लोग लिखते थे. इन्हीं सब बातों ने सुभाष चंद्र बोस को लेकर रहस्य और कौतूहल को और बढ़ाया और यह कयास लगने लगे कि गुमनामी बाबा सुभाष चंद्र बोस हो सकते हैं. हालांकि, इतिहास यह मानकर चलता है कि 1945 में प्लेन क्रैश में उनका निधन हो गया था. इन सबसे अलग भारत मां के सच्चे सपूत के संघर्ष को याद कर आज हर कोई उन्हें नमन कर रहा है.

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