उत्तराखंड के 'वृक्षमानव' ने प्रकृति को समर्पित किया जीवन, लगाए 50 लाख ज्यादा पेड़

विश्वेश्वर दत्त सकलानी जो अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर है. आंखों की रोशनी अब जा चुकी है, लेकिन जबान से लड़खड़ाते हुए केवल यही शब्द निकलते है. वृक्ष मेरे माता-पिता हैं, मेरी संतान हैं, वृक्ष मेरे सगे साथी हैं.  

 उत्तराखंड के 'वृक्षमानव' ने प्रकृति को समर्पित किया जीवन, लगाए 50 लाख ज्यादा पेड़
धरती मां की सेवा के लिए विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने आंखों की रौशनी तक गंवा दी.

देहरादून, (संदीप गुसाईं): एक वनऋषि जिन्होनें मात्र 5 साल की उम्र से पेड़ लगाने शुरू किए और अब तक 50 लाख से अधिक पेड़ लगा चुके हैं. ये पहाड़ का मांझी है, जिसने अपनी मेहनत से विशाल जंगल तैयार कर दिया. विश्वेश्वर दत्त सकलानी जो अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर है. आंखों की रोशनी अब जा चुकी है, लेकिन जबान से लड़खड़ाते हुए केवल यही शब्द निकलते है. वृक्ष मेरे माता-पिता हैं, मेरी संतान हैं, वृक्ष मेरे सगे साथी हैं.  

उत्तराखंड का वृक्षमानव
विश्वेश्वर दत्त सकलानी को वृक्षमानव कहा जाता है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन वृक्षों को दे दिया. वृक्ष मानव की उपाधि से सम्मानित विश्वेस्वर दत्त सकलानी और उनके द्वारा लगाए गए वन साम्राज्य आज कई जल स्रोतों और पूरी घाटी को नया जीवनदान दे रहा है. मात्र पांच साल की उम्र से इन्होंने पेड़ लागाने शुरू किए और आज तक करीब 50 लाख से ज्यादा पेड़ लगा दिए. टिहरी गढ़वाल के पुजार गांव में जन्मे विश्वेश्वर द्त्त सकलानी का जन्म 2 जून 1922 को हुआ था. पहली पत्नी की मौत के बाद इन्होंने अपना पूरा जीवन वृक्षारोपण को समर्पित कर दिया. इनके एक छोटी सी कोशिश से सकलानी घाटी को अपने भगीरथ प्रयास से हरा भरा कर दिया. 

पत्नी-भाई की मौत ने जंगल-पर्यावरण से जोड़ा
बचपन से विश्वेश्वर दत्त को पेड़ लगाने का शौक था. वे अपने दादा के साथ जंगलों में पेड़ लगाने जाते रहते थे. दरशत मांझी की तरह विश्वेश्वर दत्त सकलानी के जिन्दगी में अहम बदलाव तब आया जब उनकी पत्नी शारदा देवी और बड़े भाई का देहांत हुआ. 11 जनवरी 1948 को उनके बड़े भाई नागेन्द्र सकलानी टिहरी रियासत के खिलाफ विद्रोह में शहीद हो गए है और फिर 11 जनवरी 1956 को उनकी पहली पत्नी शारदा देवी का देहांत हो गया. इन घटनाओं ने उनका वृक्षों से लगाव और बढ़ा दिया. इसके बाद उनके जीवन का सिर्फ एक ही उद्देश्य बन गया, वृक्षारोपण. 

धरती मां के लिए गवां दी आंखों की रोशनी 
विश्वेश्वर दत्त सकलानी पिछले 80 सालों से वृक्षारोपण कर रहे है. धरती मां की सेवा के लिए उन्होंने आंखों की रोशनी गंवा दी. डॉक्टरों ने उन्हें धूल मिट्टी और अत्यधिक परिश्रम से दूर रहने की सलाह दी थी, लेकिन वृक्षारोपण का जुनून इस कदर सवार था कि उन्होंने डॉक्टरों की सलाह की कोई परवाह नहीं की और आखिरकार साल 2007 में आई हेम्रेज होने के कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई. 

कैसी बदली सकलानी घाटी की तस्वीर
विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद सकलानी घाटी की पूरी तस्वीर बदल दी. दरअसल करीब 60- 70 साल पहले इस पूरे इलाके में अधिकतर इलाका वृक्षविहीन था. धीरे-धीरे उन्होंने बांज, बुरांश, सेमल, भीमल और देवदार के पौधे को लगाना शुरू किए. शुरुआत में ग्रामीणों ने इसका काफी विरोध किया, यहां तक कि उन्हें कई बार मारा भी गया. लेकिन धरती मां के इस हीरो ने अपना जुनून नहीं छोड़ा. जब ग्रामीणों को अपने पशुओं के चारा और सूखते जलस्रोतों में जलधाराएं फूटने लगी तो ग्रामीण भी इस मुहिम में विश्वेश्वर दत्त के साथ जुड़ गए और आज स्थिति ये है कि करीब 1200 हेक्टियर से भी अधिक क्षेत्रफल में उनके द्वारा तैयार किया जंगल खड़ा है. 

50 लाख पेड़ों को लगाकर बनाया इतिहास
2004 में वन विभाग और निजी संस्था ने विश्वेश्वर दत्त सकलानी द्वारा लगाए गए वृक्षों का आंकलन किया, तो करीब 50 लाख से ज्यादा पेड़ सामने आए. साथ ही और इस वन संपदा का आंकलन करीब साढ़े चार हजार करोड़ आंका गया. ग्रामीण आज हरे भरे जंगल देखकर खुश हैं.  लेकिन अब वो इस बात से आक्रोशित हैं कि 85 सालों की तपस्या से खड़ा किया गया जंगल, संरक्षम के अभाव में नष्ट हो रहा है. 

बारातियों से कराया वृक्षारोपण
विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने अपना पूरा जीवन पहाड़ के लिए दे दिया है. पुजार गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि साल 1985 में विश्वेश्वर दत्त सकलानी की बेटी मंजू कोठारी का विवाह हो रहा था और कन्यादान होने जा रहा था. लेकिन बेटी की विवाह से बढ़कर उनके लिए वृक्षारोपण था, कन्यादान से कुछ समय पहले वो जंगल में वृक्षारोपण करने चले गए. जब काफी खोजबीन की गई, तो पता लगा कि वे कुछ पेड़ों को लेकर गांव के ऊपर जंगल में चले गए. जंगल से उन्हें वापस लाया गया और बेटी का कन्यादान किया. उन्होंने शांति से विवाह संपन्न किया और उसके बाद 
सभी बारातियों से भी वृक्षारोपण कराया. मैती आंदोलन के संस्थापक कल्याण सिंह रावत कहते है कि विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने धरातल पर रहकर काम किया. उन्होंने पूरा जीवन पर्यावरण को समर्पित कर दिया. 

राह में आईं कई मुश्किलें
ऐसा नहीं है कि विश्वेश्वर दत्त सकलानी की राह में मुश्किलें नहीं आई. पहले गांव वालों का विरोध झेला और फिर 1987 में वन विभाग ने उनके विरुद्व जंगल में बिना अनुमति के पेड़ लगाने पर मुकदमा भी दर्ज किया. कई सालों तक कानून लड़ाई लड़ी और फिर उनकी मेहनत और जज्बे की जीत हुई. कोर्ट ने फैसला सुनाया कि वन कानून की धारा 16 के तहत पेड़ लगाना अपराध नहीं है.

चिपको आंदोलन में भी दिया साथ
विश्वेश्वर दत्त सकलानी के साथ पद्श्री सुन्दरलाल बहुगुणा, धूम सिंह नेगी, कुंवर प्रसून और विजय जड़धारी साथ रहे. बीज बचाओ आंदोलन के संस्थापक विजय जड़धारी कहते है कि साल 1980 में चिपको आंदोलन के दौरान वे कई बार विश्वेश्वर दत्त सकलानी के साथ वृक्षारोपण के सिलसिले में मिलते थे. विजय जड़धारी कहते है उन्हीं की कोशिशों से सकलानी घाटी से निकलने वाली सौंग नदी फिर से पुनर्जीवित हुई और चिपको आंदोलन के बाद भारत सरकार ने हिमालय में 1 हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर हरे वृक्षों के कटान पर रोक लगा दी.