टिकना और बिकना है तो दिखना भी ज़रूरी है

गॉडफादर जब धनबाद में शिफ्ट होते हैं और वासेपुर के गैंग्स को चलाने का जिम्मा उठाने का दावा करने के साथ ही जब बिहारी अंदाज़ में कहते हैं कि ‘वो कह के लूंगा’ तो ठेठ देसी अंदाज पसंद करने वाली पीढ़ी इस जुमले का रस तो लेती ही है, बाहर कान समारोह में भी यह फिल्म उन समीक्षकों एवं आलोचकों को चौंका देती है जो हिंदी फिल्मों को एक सीमित परिपाटी में बांध कर देखते आए हैं।

आलोक कुमार राव

गॉडफादर जब धनबाद में शिफ्ट होते हैं और वासेपुर के गैंग्स को चलाने का जिम्मा उठाने का दावा करने के साथ ही जब बिहारी अंदाज़ में कहते हैं कि ‘वो कह के लूंगा’ तो ठेठ देसी अंदाज पसंद करने वाली पीढ़ी इस जुमले का रस तो लेती ही है, बाहर कान समारोह में भी यह फिल्म उन समीक्षकों एवं आलोचकों को चौंका देती है जो हिंदी फिल्मों को एक सीमित परिपाटी में बांध कर देखते आए हैं।

या जब अभय देओल साउथ इंडियन अंदाज़ में आईएएस अफसर का रुतबा पर्दे पर दिखाते हैं या दांतो में डेंचर लगाए हुए इमरान हाशमी अपनी छवि तोड़ते हुए भारत माता की जय कर रहे होते हैं तो यह धारणा मजबूत होती है हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता एवं सफलता की गारंटी केवल लटके-झटके और अंतरंग दृश्य नहीं हैं।
दर्शकों के सामने जब दुबला पतला पान सिंह तोमर दौड़ते हुए चार मिनट में अपने से सीनियर अधिकारी के धर आइसक्रीम पहुंचाता है और नर्वस पत्रकार उसका साक्षात्कार ले रहा होता है तो इन दृश्यों में दर्शकों की तल्लीनता यह साबित करती है कि हिंदी फिल्में इस दौर में पारम्परिक सिनेमा से अलग न होते हुए भी उस खाली जगह को भर रही हैं जिसे मेलोड्रामा के कंधे पर सवार फिल्मों ने छोड़ दिया था।
हिंदी सिनेमा अगले साल सौ साल का होने वाला है इन सौ सालों में इसने कई करवटें ली और अब ऐसा लगने लगा है जैसे ये अंगड़ाई ले कर उठने को बेकरार हो रहा है।
सिनेमा की यह खेप दिबाकर बनर्जी, अनुराग कश्यप, तिग्मांशु धूलिया, निशिकांत कामत (मुंबई मेरी जान), नीरज पांडे (ए वेडनेस्डे). अभिषेक शर्मा (तेरे बिन लादेन) और सुभाष कपूर (फंस गये रे ओबामा), किरण राव जैसे निर्देशक तैयार कर रहे हैं।
यह वह पीढ़ी है जिसने सिनेमा को हर स्वरूप में देखा है जिसने प्यासा के छटपटाते कवि को देखा, जिसने हुक्म चलाने वाले मुगल-ए-आज़म, समाज से कुढ़े हुए एंग्री यंग मैन और अर्ध सत्य के ईमानदार पुलिस अफसर को भी देखा है।
इस पीढ़ी ने अस्सी का वह दौर भी देखा है जब सिनेमा का मतलब चंद जबर्दस्ती ठुंसे हुए गाने, डिस्को करते हुए हीरो-हीरोइन, मिलना-बिछड़ना आदि होता था। इस दौर की फार्मूला फिल्में किसी तरह का संतोष नहीं देती, खीझ अलग से पैदा करती हैं। दर्शकों को बेवकूफ बनाकर पैसा बनाना इस दौर के निर्माता-निर्देशकों के चलन में था।
नायक फिल्म का नायक जब खलनायक से यह बोलता है कि तुम्हें तीस साल का अनुभव है और तु्म्हारे साथ एक साल लड़ते हुए मुझे 31वर्ष का अनुभव हो गया है तो दरअसल यह संवाद इसी नए पनपते सिनेमा की आवाज़ है जिसे इस पीढ़ी के निर्देशकों जैसे फिल्मकारों ने रचा है।
कहानी, पान सिंह तोमर, देव डी जैसी फिल्में यथार्थ को बनाए रखते हुए समानांतर सिनेमा के पाले में अपने को खड़ा नहीं करतीं लेकिन मनोरंजन का तत्व ये व्यावसायिक सिनेमा से उठाती हैं।
इन फिल्मों ने व्यावसायिक सिनेमा के प्लॉट को अपनी तरह से इस्तेमाल करते हुए भी उनसे अपने को अलग रखा है। या यों कहें कि ये उन फिल्मों को जवाब है जहां नायक-नायिका नाचते-गाते स्विटज़रलैंड के वादियों में पहुंच जाते हैं।
इस तरह की फिल्में यह बताना चाहती हैं कि हिंदी सिनेमा का मतलब लार्जर दैन लाइफ ही नहीं बल्कि वह रिएलिटी सिनेमा भी है जो दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ ही उसे अपने परिवेश से जोड़ता है। ये फिल्में वास्तविकता के ज्यादा करीब और भारत की कमोबेश वह तस्वीर उभारती हैं जो ज्यादातर पारम्परिक फिल्मों में नदारद थी।
दरअसल यह सिनेमा समानांतर सिनेमा और कमर्शियल सिनेमा की बीच खुदी खाई को भरने की कोशिश करने में जुटा है। इसे प्रयोगात्मक सिनेमा कहा जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि सिनेमा में इससे पहले प्रयोग नहीं हुए बल्कि ये कहना चाहिए कि सिनेमा की शुरुआत ही एक प्रयोग था। गुरुदत्त का क्राइस्ट की तरह खड़े होकर, जिसके पीछे से रोशनी आ रही है ‘ये महलों ये तख्तों ये ताजो की दुनिया’ गाना या कागज़ के फूल में कैमरे की ट्रेकिंग का प्रयोग करना अपने आप में प्रयोगधर्मी है।
हिंदी सिनेमा के शो मैन जहां आवारा बनते हैं तो वहीं वह जागते रहो भी बना देते हैं। एक रात की कहानी पर बनी फिल्म जिसमें आखरी तक हीरो कुछ नहीं बोलता है, उसे दर्शकों के सामने रखने का रिस्क उठाते हैं। राजकपूर ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के माध्यम से संदेश देते हैं तो ‘मेरा नाम जोकर’ के ज़रिए जीवन का फलसफा भी बताते हैं।
अहम बात यह है कि गुरुदत्त हों, शैलेन्द्र हों या ऐसे कई दिग्गज निर्देशक जिनके लिए फिल्में धनार्जन का ज़रिया न होकर कलार्जन का माध्यम थीं। इन क्लासिक फिल्मों की सराहना तो खूब हुई लेकिन ये व्यावसायिक रूप से सफल न हो पाईं।
गुरुदत्त ने ‘कागज़ के फूल’ में मात खाई, राजकपूर ‘जागते रहो’ और ‘मेरा नाम जोकर’ में हारे तो शैलेन्द्र ‘तीसरी कसम’ जैसा सिनेमा गढ़ कर दर्शकों के जवाब से इतने आहत हुए कि दुनिया छोड़ गए।

सत्तर के दशक में सिनेमा जब कला से ज्यादा पैसा बनाने की दिशा में अग्रसर हुआ तो उस दौर में श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, गौतम घोष, कुंदन शाह, बासु चटर्जी, केतन मेहता जैसे सिनेमा समर्पितों ने इनके विरोध में समानांतर राह पकड़ी और समानांतर सिनेमा को जन्म दिया। यह वह सिनेमा था जिसे सराहना तो बहुत मिली लेकिन यह दर्शकों की बाट जोहता रहा।
इन दोनों तरह के अनुभवों का लाभ इस नई पीढ़ी के निर्देशकों ने उठाया है। ये फिल्मकार अपने सिनेमा में देसीपन तो रखते ही हैं, समानांतर सिनेमा की राह पर भी चलते दिखते हैं। इन्हें यह अच्छी तरह पता है कि टिकना और बिकना है तो दिखना भी ज़रूरी है।