ऐसा मंदिर जहां प्रभु के समक्ष लिखने से हो जाती है हर मुराद पूरी

सबके विघ्न हरने वाले भगवान गणेश जी (Ganesha Ji) की लीला अपरम्पार है. मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर (Siddhivinayak Mandir) में भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है.

ऐसा मंदिर जहां प्रभु के समक्ष लिखने से हो जाती है हर मुराद पूरी
सिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई

नई दिल्ली: सबके विघ्न हरने वाले भगवान गणेश जी (Ganesha Ji) की लीला अपरम्पार है. अपने भक्तों के कष्टों को हरने के कारण ही इन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है. ये प्रभु बप्पा, एकदंत और गजानन नाम से भी पूजे जाते हैं. किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत प्रभु गणेश जी की आरती से ही की जाती है क्योंकि इन्हें सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय देवता का दर्जा दिया गया है.

गणेश जी का खास मंदिर
देशभर में प्रभु गणेश के अनेक मंदिर स्थापित हैं. इन्हीं में से एक प्रसिद्ध मंदिर है मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर (Siddhivinayak Mandir). यह मंदिर महाराष्ट्र में मुंबई शहर के प्रभादेवी इलाके में स्थित है. प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण नवंबर, 1801 में किया गया था. इस मंदिर में केवल हिंदू धर्म के लोग ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों के लोग भी दर्शन हेतु आते हैं.

सिद्धिविनायक मंदिर की खासियत
इसकी कुछ खास खूबियों के कारण इसे सिद्धिविनायक मंदिर कहा जाता है. वास्तव में यह गणेश जी का सबसे लोकप्रिय रूप है. इसमें गणेश जी की सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई होती है जो सिद्धपीठ से जुड़ी मानी जाती है और विनायक गणेश जी का एक अन्य नाम है. इसीलिए इस प्रकार की प्रतिमा वाले मंदिर सिद्धिविनायक मंदिर कहलाते हैं. मान्यता है कि ऐसे मंदिरों में मांगी गई मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है. ऐसे गणेश जी जल्दी प्रसन्न होने वाले और जल्द ही क्रोधित होने वाले भी होते हैं. सिद्धिविनायक एक चतुर्भुजी विग्रह होता है. इस प्रतिमा में प्रभु के ऊपर वाले दाएं हाथ में कमल और बाएं हाथ में अंकुश होता है और नीचे वाले दाएं हाथ में मोतियों की माला और बाएं हाथ में मोदक (लड्डुओं) से भरा कटोरा है. गजानन के दोनों ओर उनकी पत्नियां ऋद्धि और सिद्धि स्थापित हैं. इन्हें धन, ऐश्वर्य, सफलता और सभी मुरादों को पूरा करने का प्रतीक माना जाता है. पवित्र प्रतिमा में इनके मस्तक पर जनक शिव के समान तीसरा नेत्र और गर्दन पर एक सांप लिपटा हुआ है.

मनोकामनाएं होती हैं पूरी
बप्पा के दरबार में वैसे तो सभी मनोकामनाएं सिद्ध होती हैं लेकिन कुछ खास तरह से मांगी गई मुराद जरूर पूरी होती है. कहते हैं कि इनके मंदिर में भगवान के सामने बैठकर मनोकामना लिखने से जल्द पूरी होती है. इसके अतिरिक्त यह भी मान्यता है कि प्रभु एकदंत के कान में अपनी इच्छा बताई जाए तो वह शीघ्र पूरी होती है.

मंदिर से जुड़ा रोचक प्रसंग
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि लक्ष्मण विथु पाटिल नामक एक स्थानीय ठेकेदार ने सर्वप्रथम निर्माण प्रारंभ किया था. इसके निर्माण में लगने वाली धनराशि एक महिला ने दी थी, जो कि कृषक थी. किवदंती के अनुसार, उस महिला की कोई संतान नहीं थी. वह अपने निस्संतान होने के कारण बहुत दुखी थी. उस महिला की इच्छा थी कि मंदिर में आकर भगवान के आशीर्वाद से कोई भी महिला निस्संतान न रहे, सबको संतान सुख की प्राप्ति हो सके. इसीलिए सिद्धिविनायक को नवसाचा गणपति या नवसाला पावणारा गणपति भी कहा जाता है. यह मराठी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है - बप्पा.

बनावट है बेहद आकर्षक
इस मंदिर में प्रवेश करते ही मन एक अद्भुत शांति व उत्साह का अनुभव करता है. इस मंदिर के प्रांगण में व्यथित मन को सुकून का एहसास होता है. इसका प्रांगण यानी सभामंडप कुछ इस तरह से बनाया गया है कि काफी संख्या में मौजूद भक्त प्रभु के दर्शन कर सकें. पहली मंजिल से भी भक्तगण आसानी से दर्शन कर सकते हैं. यहां स्थित अष्टभुजी गर्भगृह लगभग 10 फीट चौड़ा और 13 फीट ऊंचा है. इस गर्भगृह के चबूतरे पर सोने के शिखर वाला चांदी का खूबसूरत मंडप निर्मित है. इसी पर गणपति सुशोभित हैं. गर्भगृह में तीन कपाट हैं- जिन पर अष्टविनायक, अष्टलक्ष्मी और दशावतार के चित्र बनाए गए हैं. मंदिर के अंदर की छत पर सोने का लेप किया गया है.

प्रभु के लिए मंगल है खास
अन्य दिनों की अपेक्षा मंगलवार को भक्तगण बड़ी संख्या में यहां दर्शन के लिए आते हैं. गणेश चतुर्थी यहां बहुत धूमधाम से मनाई जाती है. भाद्रपद की चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक एक खास समारोह का आयोजन किया जाता है. वैसे तो सिद्धिविनायक मंदिर में हर दिन दर्शनार्थियों की भीड़ रहती है किंतु मंगलवार को भारी संख्या में भक्तगण गणपति बप्पा के दर्शन कर अपनी इच्छाएं पूरी करते हैं. इस मंदिर में आकर जो एक बार विघ्नहर्ता के दर्शन कर लेता है, वह बार-बार स्वयं को यहां आने से नहीं रोक पाता है. असीम आनंद का केंद्र है यह सिद्धिविनायक गणपति मंदिर. आप भी एक बार दर्शन के लिए जाइए और कहिए गणपति बप्पा मोरया.

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