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हवा में प्रदूषण हर घंटे ले रहा है 800 लोगों की जान, एक साल में होती हैं इतनी लाख मौतें

संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण एवं मानवाधिकारों के जानकार ने कहा है कि घर के अंदर और बाहर होने वाले वायु प्रदूषण के कारण हर साल करीब 70 लाख लोगों की मौत समय से पहले हो जाती है जिनमें छह लाख बच्चे शामिल हैं .

हवा में प्रदूषण हर घंटे ले रहा है 800 लोगों की जान, एक साल में होती हैं इतनी लाख मौतें
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ डेविड बोयड ने कहा कि करीब छह अरब लोग नियमित रूप से इतनी प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं

जिनेवा : संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण एवं मानवाधिकारों के जानकार ने कहा है कि घर के अंदर और बाहर होने वाले वायु प्रदूषण के कारण हर साल करीब 70 लाख लोगों की मौत समय से पहले हो जाती है जिनमें छह लाख बच्चे शामिल हैं .

6 अरब लोग ले रहे प्रदूषित हवा में सांस
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ डेविड बोयड ने कहा कि करीब छह अरब लोग नियमित रूप से इतनी प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं कि इससे उनका जीवन और स्वास्थ्य जोखिम में घिरा रहता है. पर्यावरण एवं मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक ने सोमवार को मानवाधिकार परिषद से कहा, “इसके बावजूद इस महामारी पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है क्योंकि ये मौतें अन्य आपदाओं या महामारियों से होने वाली मौतों की तरह नाटकीय नहीं हैं.” 

हर घंटे मरते हैं 800 लोग 
बोयड ने कहा, “हर घंटे 800 लोग मर रहे हैं जिनमें से कई तकलीफ झेलने के कई साल बाद मर रहे हैं, कैंसर से, सांस संबंधी बीमारी से या दिल की बीमारी से जो प्रत्यक्ष तौर पर प्रदूषित हवा में सांस लेने के कारण होती है.” कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर बोयड ने कहा कि स्वच्छ हवा सुनिश्चित नहीं कर पाना स्वस्थ पर्यावरण के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. उन्होंने कहा कि यह वे अधिकार हैं जिन्हें 155 देशों ने कानूनी मान्यता दी है और इसे वैश्विक मान्यता प्राप्त होनी चाहिए. 

उन्होंने सात अहम कदमों की पहचान की जिसे स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए देशों को उठाना चाहिए. इनमें वायु गुणवत्ता एवं मानव स्वास्थ्य पर उसके प्रभावों की निगरानी, वायु प्रदूषण के स्रोतों का आकलन और जन स्वास्थ्य परामर्शों समेत अन्य सूचनाओं को सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराना शामिल है. बोयड ने कहा, ‘‘अच्छे चलन के कई उदाहरण हैं जैसे भारत एवं इंडोनेशिया के कार्यक्रम जिन्होंने कई गरीब परिवारों को खाना पकाने की स्वच्छ तकनीकों की तरफ मोड़ा है और ऐसे देश जो कोयले से चलने वाले ऊर्जा संयंत्रों के इस्तेमाल को खत्म कर रहे हैं.”

(इनपुटः भाषा)