बदली जाए तारीख बाल दिवस की, मांग की मनोज तिवारी ने

जायज़ लगती है मनोज तिवारी की मांग, नेहरू के जन्म दिवस का बाल दिवस से क्या लेना-देना. गुरूगोविन्द सिंह के दोनो छोटे बच्चों ने धर्म की रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति दी थी, उनके बलिदान दिवस को बाल दिवस के रूप में प्रतिष्ठित किया जाना चाहिये...  

बदली जाए तारीख बाल दिवस की, मांग की मनोज तिवारी ने

नई दिल्ली, दिल्ली चुनाव सर पर हैं पर दिल्ली बीजेपी प्रमुख मनोज तिवारी की ये मांग की बाल दिवस की तारीख बदली जाए, का चुनाव से कुछ नहीं लेना-देना भी हो सकता है. हालांकि 14 नवंबर तो बीत गया है और दिसम्बर खत्म हो कर नया साल लगने जा रहा है ऐसे में तो नेहरू के जन्म दिवस से हटा कर बाल दिवस की नई तारीख तो साफ़ बताती है कि ये उनका कांग्रेस पर हमला भी हो सकता है. 

लिखा प्रधानमंत्री को पत्र 

सांसद और दिल्ली बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने इस आशय का पत्र पीएम मोदी को लिखा है जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि बाल दिवस और जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस का आपसे में कोई संबंध नहीं है. जैसा कि सब जानते हैं जवाहल लाल नेहरू का जन्म दिवस 14 नवंबर को पड़ता है. मनोज तिवारी ने बाल दिवस की तारीख 14 नवंबर से बदल कर इसकी  जगह साहिबजादा फतेह सिंह की शहादत के दिन को दिन बाल दिवस के तौर पर मनाने की अपील की.

जवाहर लाल नेहरू को चाचा कहने के पीछे चालाकी थी 

मनोज तिवारी ने अपने पत्र में लिखा कि 1956  से कांग्रेस ने देश में बाल दिवस 14 नवंबर से मनाने की परम्परा डाली हुई है जबकि जवाहर लाल नेहरू का बच्चों के लिए कुछ विशेष योगदान भी ऐसा नहीं है कि उसके साथ ही बाल दिवस सदा के लिए चस्पा कर दिया जाए. चाचा नेहरू कहने के पीछे जवाहर लाल नेहरू को देश के हर बच्चे से अर्थात देश के हर घर से जोड़ देने की चालाक सोच थी. कांग्रेस ने जानबूझ कर इस रणनीति के तहत प्रचार किया था कि चाचा' नेहरू को बच्चे बहुत प्रिय थे. 

गुरुगोविंद सिंह के बलिदानी बच्चों के नाम पर होना चाहिए बालदिवस  

बहुत सुंदर बात कही मनोज तिवारी ने. ऐसा कह कर उन्होंने सिख गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि का भाव अर्पित किया. मनोज ने लिखा कि हमारे देश के बच्चों ने अनेक बलिदान दिए हैं. इन बलिदानों में भी सर्वोत्कृष्ट बलिदान सिखों के दसवें गुरु श्री गुरुगोबिंद सिंह जी के छोटे बच्चों जोराबर सिंह जी और फतेह सिंह जी का है. इन दोनों छोटे प्यारे बच्चों ने पंजाब के सरहिंद में 1705 में फतेहगढ़ साहिब के बुर्ज पर असीम साहस का परिचय देते हुए धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया था. 

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