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पासवान खानदान के 'चिराग' ने संभाली एलजेपी की कमान, जानिए अब तक का सफर

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट होने लगी है और इसी के साथ राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं. इस बार बिहार के विधानसभा चुनाव में युवा रंग का तड़का देखने को मिलेगा. जहां एलजेपी ने अपना अध्यक्ष चिराग पासवान को चुना है तो वहीं बिहार प्रदेश की कमान सांसद प्रिंस राज को सौंपी गई है.

पासवान खानदान के 'चिराग' ने संभाली एलजेपी की कमान, जानिए अब तक का सफर
वंशवादी राजनीति का एक और उदाहरण

नई दिल्लीः साल 2018 और सर्द दिसंबर का दूसरा दिन था. एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में 37 साल का युवक मौजूद था और खुद से जुड़े हुए तमाम सवालों के जवाब दे रहा था. सवाल कुछ राजनीति से जुड़े थे, कुछ सामाजिक दायरे के थे और सबसे अहम फिल्मी दुनिया से जुड़े सवाल भी थे. फिर पूछा गया कि आप फिल्मों में कैसे गए, और गए तो यह लाइन छोड़ी क्यों ? यह युवक था चिराग पासवान जो कि लोकजनशक्ति पार्टी के मुखिया रामविलास पासवान के बेटे हैं और अब पिता से पार्टी की कमान मिलने के बाद चर्चा में हैं.

बात करते हैं उनके जिंदगी से जुड़े कुछ पहलुओं की-

बिहारी अस्मिता के लिए छोड़ी फिल्मी दुनिया
इस इंटरव्यू में चिराग ने बेहद संजीदा अंदाज में अपना जवाब दिया. उन्होंने प्रश्न के दोनों हिस्सों के उत्तर बारीकी और बेबाकी से रखे. कहा कि फिल्मों में शौकिया चला गया था. कॉलेज में था तो यार-दोस्तों ने इस ओर जाने के लिए पंप कर दिया. फिर युवाओं की ओर मुखातिब होकर बोले कि यहां भी तमाम यंगस्टर्स हैं, जो इस बात को समझेंगे. हालांकि मुझे समझ में आ गया कि यह मेरे लिए नहीं है. फिर उन्होंने बताया कि फिल्म लाइन से अलग होने की वजह बिहारी अस्मिता भी रही.

बताया कि एक्टिंग के लिए दिल्ली में रहा, मुंबई में रहा और बिहारियों के लिए एक भेदभाव वाला नजरिया महसूस किया, हालांकि मेरे साथ व्यक्तिगत तौर पर ऐसा नहीं हुआ कभी, लेकिन यह भी ख्याल आया कि आखिर बिहार के लोगों को ही अपना घर-बार-गांव क्यों छोड़ना पड़ता है. इसके बाद अब मैं अपने लोगों और जनता के बीच हूं.

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हालांकि फ्लॉप रही थी फिल्म
2011 में चिराग पासवान की फिल्म आई थी, मिले न मिले हम. इस फिल्म में उनके साथ सितारों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त थीं. इनमें खास तौर पर कंगना रनौत, सागरिका घाटगे, कबीर बेदी, पूनम ढिल्लन और दिलीप ताहिल शामिल थे. प्रेम कहानी वाली इस फिल्म ने समीक्षकों को बुरी तरह निराश किया था और बॉक्स ऑफिस पर फिल्म नोटिस ही नहीं की गई थी. हालांकि बुरी तरह फ्लॉप रही फिल्म के एक गाने नजर से नजर मिले को पसंद किया गया था. शायद राहत फतेह अली खान की आवाज का असर रहा होगा.

इसके बाद शुरू हुआ चुनावी सफर
2014 में लोकसभा चुनाव का माहौल छा चुका था और चिराग भी मुंबई से बिहार लौट आए थे. मोदी लहर थी. पिता राम विलास पासवान ने लोक जन शक्ति की ओर से चिराग को बिहार की जमुई संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया. पासवान खानदान के इस चिराग ने तब तक राजनीति की नब्ज पकड़ ली थी. उन्होंने इस सीट से आरजेडी के सुधांशु शेखर चौधरी और जेडीयू के उदय नारायण चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोला और करारी शिकस्त दी. इस तरह फिल्मी दुनिया से निकले छोरे ने राजनीति में पहला सफल कदम रखा.

2019 में भी चिराग ने यहां से जीत हासिल की. उनका मुकाबला रालोसपा (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी) के भूदेव चौधरी से था. उन्हें 241049 वोट मिले और जीत हासिल हुई.

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अब पार्टी ने जताया है भरोसा
लगातार दो बार सफलता का स्वाद चख चुके चिराग अब राजनीति का ककहरा जानते हैं, सबसे बड़ी बात उन्होंने क्षेत्र की जनता के साथ-साथ अपने पिता का भरोसा हासिल किया है. मंगलवार को लोकजनशक्ति पार्टी (LJP) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में चिराग पासवान को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया है. अभी तक इस पदवी को उनके पिता रामविलास पासवान ही संभाल रहे थे. कार्यकारिणी की दिल्ली बैठक में दलित सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष और हाजीपुर सांसद पशुपति कुमार पारस ने चिराग पासवान को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे पूर्ण समर्थन से पारित कर दिया गया.

चिराग पासवान को एलजेपी के अध्यक्ष बनाने जाने के बाद पार्टी का भार अब पूरी तरह से युवा कंधों पर है. बिहार प्रदेश की कमान पहले ही पूर्व सांसद स्व. रामचन्द्र पासवान के बेटे नवनिर्वाचित सांसद प्रिंस राज को सौंपी जा चुकी है. ऐसे में चिराग और प्रिंस की जोड़ी क्या सियासी गुल खिलाती है यह तो वक्त के अंधेरे में है, लेकिन फिलहाल इस निर्णय को पार्टी कार्यकर्ताओं का पूरा साथ मिल रहा है. वह इसे बदलते वक्त के साथ जरूरी बदलाव बता रहे हैं.