नहीं सामने आ रहा Corona से अनाथ हुए बच्चों का सही आंकड़ा, कैसे मिलेगा योजनाओं का लाभ ?

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि कोरोना महामारी ने 1742 बच्चों को अनाथ कर दिया है जबकि 7464 बच्चों ने अपने माता-पिता में से कम से कम एक को खो दिया है. 

Written by - Vikas Porwal | Last Updated : Jun 18, 2021, 07:58 AM IST
  • कोरोना से कितने बच्चे हुए अनाथ, अभी तक नहीं है सही आंकड़ा
  • राज्यों ने योजनाएं बनाईं, लेकिन लाभ देने का कोई ब्लू प्रिंट नहीं
नहीं सामने आ रहा Corona से अनाथ हुए बच्चों का सही आंकड़ा, कैसे मिलेगा योजनाओं का लाभ ?

नई दिल्लीः children orphaned due to corona: कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी ईदगाह बातों-बातों में एक खास बात बता जाती है. कहानी के किरदार हामिद का परिचय देने के लिए प्रेमचंद बताते हैं कि बाप हैजे की महामारी (Pandemic) से मर गया और महीने भर में मां भी पीली होते-होते चल बसी. यानी एक कहानी में एक बच्चा ऐसे अनाथ (orphan child) हो गया.

फिल्म बूट पॉलिश की कहानी

अनाथ बच्चों  (orphan child) की दास्तानें सुनें तो राजकपूर की फिल्म बूट पॉलिश अपनी ओर ध्यान खींचती है. फिल्म में दो बच्चे हैं. वे कौन हैं, इसकी जानकारी उनकी उंगलियों में फंसी एक चिट्ठी से मिलती है. इनके बाप को काले पानी की सजा हो गई और मां गांव में फैले हैजे से मर गई.

बच्चों को कोई सेवा समिति वाला उनकी चाची के दरवाजे छोड़ कर भाग निकला है. चाची की कारस्तानी देखिए कि वह उन्हें भीख मांगने के लिए चौराहे पर बिठा देती है. इसके ठीक बाद बिना किसी साज-म्यूजिक के एक गाना है 'धेला ही दिला दे बाबू-धेला ही दिला दे'  पुराने जमाने में धेला बतौर मुद्रा चलन में थी. 

जारी है मौत का सिलसिला

ईदगाह और बूट पॉलिश, दोनों की ही कहानी यह बताने-जताने के लिए काफी है कि अनाथ (orphan child) हो जाने वाले बच्चों का क्या और कैसा हाल होता है. ये कहानियां इतने सालों बाद इसलिए भी मौजूं हैं क्योंकि हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहां समय की हर टिक-टिक अपने साथ मौत (Corona Death) का पैगाम लेकर आ रही है. सिलसिला अभी भी जा रही है. 

बहुत बड़ा है कोरोना से अनाथ हुए बच्चों का आंकड़ा

बीते दो महीनो में कोरोना (Corona Death) से होने वाली मौतों के हाहाकार में हम शायद ध्यान से न सुन पाएं होंगे, लेकिन हजारों-लाखों चीखों के बीच उन बच्चों के रोने का शोर उठ नहीं पाया, जिन्होंने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया.

मौत और त्रासदी का ये आंकड़ा कितना बड़ा है इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि सिर्फ राजधानी दिल्ली (Delhi) में ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पं. बंगाल, महाराष्ट्र, केरल-कर्नाटक और आंध्र प्रदेश तक के बच्चों पर इस महामारी से पहाड़ टूट पड़ा है. हालात यह हैं कि इन बच्चों के सामने रोटी-कपड़ा-मकान जैसा संकट तो है ही, बाल सुलभ जरूरी प्यार-दुलार, सुरक्षा-संरक्षण का भी अकाल पड़ गया है. 

अनाथ बच्चों के संरक्षण के लिए क्या है प्लान? 

यह ठीक है कि बीते दिनों में एक-एक करके राज्यों ने अपने यहां अनाथ बच्चों के हित में सरकारी योजनाओं की शुरुआत की है. लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की कही एक बात असल चिंता को रेखांकित करती है.

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सवाल किया कि अनाथ हो गए बच्चों की पहचान, उन तक योजनाओं का पहुंचना और सही मायने में लाभार्थी का हित तय करना इन तीनों के लिए केंद्र व सरकारों के पास क्या प्लान है? 

सुप्रीम कोर्ट ने पूछे थे सवाल

कोर्ट ने यह भी कहा कि अनाथ बच्चों (orphan children) के लिए बनाई जाने वाली योजना का विवरण और इसकी निगरानी की जानकारी दीजिए, जिनके लिए पीएम केयर्स फंड से पैसा दिए जाने की बात कही गई है.

इन सभी सवालों पर केंद्र ने बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से कहा कि उसे पीएम केयर्स फंड के तहत कोविड-19 के कारण अनाथ हुए बच्चों की राहत योजना की रूपरेखा तय करने के लिए और समय चाहिए. जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की विशेष पीठ को यह बताते हुए केंद्र ने कहा कि इस संबंध में योजना का प्रारूप तैयार करने की कवायद जारी है. 

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नहीं इकट्ठा हो सका है असल आंकड़ा

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के सवाल और केंद्र के जवाब के बीच असल चिंता यही है कि अब तक अनाथ हुए बच्चों (orphan children) का सही-सही आंकड़ा इकट्ठा ही नहीं किया जा सका है. फिर योजनाएं कैसी और उनके सही जगह तक पहुंचने का सवाल ही कहां? जरूरी है कि पहले पहला कदम उठाने का काम तो ठीक से हो. 

दिल्ली-पं. बंगाल ने बताए आंकड़े

इस पूरे प्रकरण में देखिए राज्य क्या कर रहे हैं? राज्यों ने योजनाओं की घोषणा तो बहुत जल्दी कर दी, लेकिन आंकड़ों की बात में शातिर रुख अख्तियार कर लिया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली और बंगाल हैं. 10 जून को आई एक खबर के मुताबिक, दिल्ली और पं. बंगाल की सरकार ने कोरोना से अनाथ बच्चों का डेटा और सही जानकारी बाल स्वराज पोर्टल पर दर्ज नहीं कराई.

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस मुद्दे पर ट्वीट किया था वहीं भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने भी दोनों राज्य की सरकारों की आलोचना की थी. 

1742 बच्चे हुए अनाथः NCPCR

किन राज्यों में कितने बच्चे अनाथ (orphan children) हो गए तो इसकी जानकारी राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के एक हलफनामे से मिलती है जो उसने सुप्रीम कोर्ट में दिया है. आयोग की दी गई सूचना के अनुसार, कोरोना महामारी ने 1742 बच्चों को अनाथ कर दिया है जबकि 7464 बच्चों ने अपने माता-पिता में से कम से कम एक को खो दिया है. 

बेसहारा हुए बच्चों की संख्या भी कम नहीं

ऐसे कई बच्चे हैं जो बेसहारा हो गए हैं. मार्च 2020 से 29 मई 2021 तक 140 बच्चे बेसहारा हैं. आयोग के आंकड़े कहते हैं कि अनाथ और बेसहारा बच्चों की अधिकतम संख्या में अव्वल राज्य मध्य प्रदेश है. यहां 318 बच्चे अनाथ हुए और 104 बच्चों को बेसहारा छोड़ दिया गया था. उत्तर प्रदेश में ऐसे 1830 बच्चे हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता में से किसी एक अभिभावक को खो दिया. 

कैसे सामने आएगी अनाथ बच्चों की बिल्कुल सही संख्या

हालांकि राज्यों की ओर से दिया गया आंकड़ा, असल आंकड़ों से बहुत अलग हो सकता है. माता-पिता की कोरोना से हुई मौत तभी सत्यापित है जबकि उनका कोरोना टेस्ट (Corona Test) हुआ हो और रिपोर्ट पॉजिटिव आई हो. लेकिन असलियत यह भी है कि ऐसे कई केस हैं, जिनमें कोरोना (Corona) रिपोर्ट हुआ ही नहीं, लक्षण उभरे, इलाज शुरू हुआ और टेस्ट होने से पहले ही मौत हो गई.

ऐसी स्थिति में अनाथ हुए बच्चों की संख्या कितनी है और किस तरह से वह सरकारी योजनाओं का लाभ ले पाएंगे, इसका कोई ब्लू प्रिंट न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारों की ओर से दिया गया है. 

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ऐसे में सरकारी योजनाओं का क्या लाभ?

लिहाजा, पं. बंगाल और दिल्ली जिस तरह से अनाथ बच्चों  (orphan children) की संख्या बताने में हीला-हवाली दिखा चुके हैं, उसे छोड़ अन्य राज्यों को भी राजनीति से परे जाकर जरूरतमंद बच्चों की असली और सही संख्या तलाश करने की दिशा में कदम उठाना ही चाहिए.

अगर ऐसा नहीं होता है तो वे बच्चे मुफ्त शिक्षा, मुफ्त स्वास्थ्य बीमा और केंद्र सरकार द्वारा घोषित 10 लाख रुपये के अनुदान जैसा जरूरी लाभ नहीं ले पाएंगे. 

इस विषय में राजनीति न हो तो ही अच्छा

यह बच्चों का मामला है, उनके भविष्य की बात है इसलिए यह प्रकरण जितना हो सके झोल से दूर ही रहे, नहीं तो क्या सरकारें या आप और हम ऐसा चाहेंगे कि 'धेला ही दिला दे बाबू-धेला ही दिला दे'  गाना रील से निकलकर रियल वाली वास्तविकता बन जाए. नहीं न

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