कैमरे के जादूगर उद्धव ठाकरे के हाथों में महाराष्ट्र की सियासी तकदीर

महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद का फैसला अब  उद्धव ठाकरे के हाथों में है. उनके नाम पर कांग्रेस और एनसीपी ने सहमति जता दी है. लेकिन उद्धव मुख्यमंत्री पद स्वीकार करने में हिचकिचा रहे हैं. लेकिन नए मुख्यमंत्री का नाम उन्हें ही तय करना है. आईए देखते हैं उद्धव ठाकरे का सफर  

कैमरे के जादूगर उद्धव ठाकरे के हाथों में महाराष्ट्र की सियासी तकदीर
कुछ इस तरह उद्धव के हाथों आई महाराष्ट्र की किस्मत

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर हलचल तेज है. सीएम की कुर्सी के लिए उद्धव ठाकरे के नाम ने तूल पकड़ लिया है. खुद एनसीपी प्रमुख ने इसके संकेत दिए. ऐसे में बताया जा रहा है कि शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के बीच साझा न्यूनतम कार्यक्रम को लेकर सहमति बन गई है. इसके साथ ही मुंबई में शुक्रवार शाम कांग्रेस-NCP-शिवसेना की बैठक के बाद शरद पवार ने कहा कि लीडरशिप को लेकर उद्धव ठाकरे के नाम पर सहमति बनी है.

क्या परंपरा तोड़ कर उद्धव बनेंगे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री?
महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे परिवार की अपनी अलग ही पहचान है. सूबे की सियासत में इसकी बराबरी में कोई दूसरा परिवार खड़ा नहीं हो सका है. अबतक ये परिवार सत्ता से दूर रहा है लेकिन सत्ता उसके आसपास ही मंडराती रही है. अब जब उद्धव ठाकरे का नाम मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सुर्खियों में है. तो उनके बारे में आपको जानना चाहिए.

आज की तारीख में मातोश्री के मुखिया उद्धव ठाकरे उस हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी शिवसेना के भी मुखिया हैं जिसकी नींव साल 1966 में उनके पिता बाला साहेब ठाकरे ने रखी थी. जबतक बालासाहेब शिवसेना के कर्ताधर्ता रहे, सूबे के सियासी हलके में उद्धव का दखल कम ही रहा. वो बस अपने पिता के पीछे ही खड़े रहे और शिवसेना के अखबार सामना का काम उसके संपादक के तौर पर देखते रहे. हालांकि बाद में बाल ठाकरे की बढ़ती उम्र और खराब सेहत के चलते साल 2000 के बाद उद्धव ने पार्टी के कामकाज को देखना शुरू कर दिया और वो पार्टी की चुनावी गतिविधियों में शामिल होने लगे.

कैमरा चलाकर सियासत में उतरे थे उद्धव


आप जिस तस्वीर को ऊपर देख रहे हैं वो 21 साल पुरानी है, जब साल 1998 में लोकसभा चुनाव के दौरान मुंबई में शिवसेना और भाजपा की महारैली हुई थी. उस वक्त उद्धव ठाकरे अपने हाथ में कैमरा लेकर शिवसेना और भाजपा की साझा रैली की तस्वीरें उतारते थे. वो रैली में उमड़ी भीड़ को कैमरे के पैमाने से नापते नजर आए थे. उद्धव ने भाजपा और शिवसेना की दोस्ती की साझा ताकत को कैमरे में कैद किया था. लेकिन आज वक्त बदल गया है. कैमरे में तस्वीरों को कैद करने वाले उद्धव सीएम की कुर्सी को लेकर सुर्खियों में बने हुए हैं.

इस जीत के बाद बढ़ा उद्धव का रथ
27 जुलाई 1960 को जन्मे उद्धव का सियासी कद साल 2002 में बीएमसी के चुनावों में शिवसेना को मिली जोरदार कामयाबी से बढ़ा. इस जीत का श्रेय उन्हें दिया गया और उद्धव जनवरी 2003 में पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष बना दिए गए. 2004 में उन्हें शिवसेना का अध्यक्ष घोषित किया गया. उद्धव को उत्तराधिकारी चुने से नाराज उनके चचेरे भाई राज ठाकरे ने साल 2006 में पार्टी छोड़ दी और एक नई पार्टी का गठन किया. इधर उद्धव साल 2004 से ही शिवसेना से जुड़े हर छोटे बड़े फैसले लेते रहे हैं.

महाराष्ट्र की सियासत में उद्धव की भूमिका
बाल ठाकरे के दौर में ही शिवसेना का महाराष्ट्र की एक मजबूत पार्टी के तौर पर दबदबा कायम हो चुका था. समान विचारधारा होने के चलते शिवसेना बीजेपी के साथ गठबंधन में रही और साल 2014 में नरेंद्र मोदी के केंद्र में आने से पहले शिवसेना इस गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में रहती थी. लेकिन, साल 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी वहां बड़े भाई की भूमिका में आ गई. हालांकि शिवसेना बाद में सरकार में शामिल हो गई लेकिन सीएम भारतीय जनता पार्टी का ही बना.

2019 के विधानसभा चुनाव को शिवसेना ने बीजेपी के साथ गठबंधन में लड़ा. लेकिन, इसबार भी उसे 56 सीटों से ही संतोष करना पड़ा. 50-50 फॉर्मूले के तहत ढाई-ढाई साल के सीएम पर अड़ी शिवसेना ने आखिरकार भाजपा की अगुवाई वाली NDA को गुडबाय कह दिया और सरकार बनाने के लिए एनसीपी और शिवसेना से हाथ मिला लिया.

बहरहाल उद्धव ठाकरे के परिवार में पत्नी रश्मी ठाकरे के अलावा 2 बेटे आदित्य और तेजस हैं.... उनका बड़ा बेटा आदित्य दादा और पिता की तरह राजनीति में सक्रिय है और शिवसेना की युवा संगठन युवा सेना का राष्ट्रीय अध्यक्ष है.