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केजरीवाल अकेले नहीं, पहले भी कई मुख्यमंत्रियों को नहीं मिली विदेश जाने की मंजूरी

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को डेनमार्क के एक कार्यक्रम के लिए राजनीतिक मंजूरी नहीं मिली. इसके लिए उन्होंने केंद्र सरकार को दोषी ठहराया. हालांकि, इससे पहले भी कई मुख्यमंत्रियों को इस तरह की मंजूरी नहीं मिली है.

केजरीवाल अकेले नहीं, पहले भी कई मुख्यमंत्रियों को नहीं मिली विदेश जाने की मंजूरी
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (File Photo)

नई दिल्ली: हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को डेनमार्क जाने की अनुमति नहीं मिली. इसके बाद उन्हें वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सम्मेलन को संबोधित करना पड़ा. मंजूरी ना मिलने से नाराज केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर मंजूरी नहीं देने का आरोप लगाया. लेकिन सच यह नहीं है. किसी भी राजनीतिक मंजूरी के लिए विदेश मंत्रालय द्वारा तमाम जांच पड़ताल की जाती है, उसके बाद राजनीतिक मंजूरी मिलती है. आखिर क्या है यह अनुमति, जिसे किसी भी राजनीतिक मंजूरी के लिए लेना जरूरी है. 

क्या है यह मंजूरी

दरअसल, किसी भी विदेश यात्रा के लिए लोक सेवकों को विदेश मंत्रालय से राजनीतिक मंजूरी की आवश्यकता होती है. अरविंद केजरीवाल की यात्रा के विवाद के बीच विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा था कि हमें हर महीने मंत्रालयों, सचिवों और नौकरशाहों से राजनीतिक मंजूरी के लिए सैकड़ों अनुरोध मिलते हैं. किसी भी निर्णय को कई इनपुट के आधार पर लिया जाता है. यह निर्णय कार्यक्रम की प्रकृति को ध्यान में रख किया जाता है. निर्णय में अन्य देशों की भागीदारी के स्तर और निमंत्रण को  भी ध्यान में रखा जाता है. 2016 से विदेश मंत्रालय द्वारा खोले गए एक पोर्टल पर राजनीतिक मंजूरी के लिए आवेदन ऑनलाइन किए जाते हैं. विभिन्न मंत्रालय के प्रभागों के बीच समन्वय के माध्यम से इन्हें जारी किया जाता है.

पहले भी कई मुख्यमंत्रियों ने इंकार किया गया है

ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी मुख्यमंत्री को विदेश में किसी कार्यक्रम में जाने की मंजूरी नहीं मिली है. दरअसल पूर्ववर्ती यूपीए शासन के दौरान भी विदेश मंत्रालय द्वारा असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को अमेरिका और इजराइल जाने के लिए  अनुमति नहीं दी थी. इसी प्रकार झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को भी थाईलैंड के लिए राजनीतिक मंजूरी नहीं मिली थी. गोगोई 2 अप्रैल, 2012 को एक उच्च स्तरीय बैठक के लिए न्यूयॉर्क जाना चाहते थे. इस पर विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया था कि एक राज्य सरकार का किसी राजनयिक मिशन पर जाना पूरी तरह अनुचित है. इजराइल में जल और पर्यावरण प्रौद्योगिकी पर एक कार्यक्रम के लिए गोगोई की प्रस्तावित यात्रा पर विदेश मंत्रालय ने कहा था, संबंधित एजेंसियां के द्वारा असम के मुख्यमंत्री को पर्याप्त और प्रोटोकॉल दोनों स्तर पर सहायता करना मुश्किल होगा.

प्रोटोकॉल पर बहस

14 जून 2014 को, तत्कालीन नागरिक उड्डयन सचिव अशोक लवासा (वर्तमान में चुनाव आयुक्त) ने तत्कालीन कैबिनेट सचिव अजीत सेठ को लिखा था कि अधिकारियों द्वारा की जाने वाली विदेश यात्रा के सभी प्रस्तावों को मंजूरी देने वाले विदेश मंत्रालय की “मेहनती प्रणाली” को बदला जाना चाहिए. सेठ ने इस पत्र को मंत्रालय को पत्र भेजा था. इसके बाद इस पत्र का जवाब देते हुए तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह ने 13 अगस्त 2014 ने लिखा था कि यह मंत्रालय की प्राथमिकता है कि वह विदेश के किसी कार्यक्रम में भारतीय अधिकारियों की भागीदारी की उपयुक्तता और कार्यक्रम में भाग लेने के स्तर पर निर्णय ले. 

कैसे मिलती हैं अन्य मंजूरियां

जहां सभी लोक सेवकों को विदेश यात्राओं के लिए राजनीतिक मंजूरी की आवश्यकता होती है, वहीं विभिन्न अधिकारियों को अलग-अलग अतिरिक्त मंजूरी की आवश्यकता होती है. मुख्यमंत्रियों, राज्य मंत्रियों और अन्य राज्य अधिकारियों को भी आर्थिक मामलों के विभाग से मंजूरी की आवश्यकता होती है. केंद्रीय मंत्रियों के लिए विदेश मंत्रालय से राजनीतिक मंजूरी मिलने के बाद, प्रधानमंत्री से अतिरिक्त मंजूरी की आवश्यकता होती है. चाहे यह यात्रा आधिकारिक है या व्यक्तिगत. लोकसभा सांसदों को अध्यक्ष से मंजूरी और राज्यसभा सदस्यों को अध्यक्ष (भारत के उपराष्ट्रपति) से मंजूरी की आवश्यकता होती है. संयुक्त सचिव स्तर  के विभिन्न मंत्रालय के अधिकारियों के लिए, राजनीतिक मंजूरी के बाद, संबंधित मंत्री द्वारा मंजूरी दी जाती है. इससे ऊपर के अधिकारियों लिए, सचिवों की एक स्क्रीनिंग कमेटी की मंजूरी चाहिए होती है. वहीं यात्रा की अवधि, देश का दौरा करने की अवधि और प्रतिनिधिमंडल में सदस्यों की संख्या के अनुसार संबंधित नियम लागू होते हैं. यदि विदेश यात्रा में संयुक्त राष्ट्र के अलावा अन्य संगठनों का आतिथ्य शामिल है, तब गृह मंत्रालय से एफसीआरए मंजूरी की आवश्यकता है.