'मरते हैं आरज़ू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती' मिर्ज़ा ग़ालिब के बेहतरीन शेर

Mirza Ghalib Death Anniversary: 1850 में शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय ने मिर्ज़ा ग़ालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला के ख़िताब से नवाज़ा. गालिब एक समय में मुग़ल दरबार के शाही इतिहासकार भी थे. गालिब ने 15 फरवरी 1869 को वफात पाई.

'मरते हैं आरज़ू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती' मिर्ज़ा ग़ालिब के बेहतरीन शेर
Image Credit: मिर्जा गालिब

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