100 Years Of Jamia: देखिए जामिया की वो तस्वीरें जो शायद आपने पहले कभी न देखी हों

जामिया मिल्लिया इस्लामिया ब्रिटिश हुकूमत के दौरान वजूद में आई थी और इस यूनिवर्सिटी की स्थापना को अग्रेंजों की एजुकेशन पॉलिसी के खिलाफ बग़ावत माना गया था जो अपना औपनिवेशिक शासन चलाने के लिए सिर्फ 'बाबुओं' को बनाने तक सीमित थी.

नई दिल्ली: 29 अक्टूबर 2020 वो तारीख़ है जब दिल्ली में मौजूद जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी को बने हुए 100 साल मुकम्मल होने जा रहे हैं. जामिया का सौ साल का सफर काफी उतार चढ़ाव वाला रहा लेकिन इस यूनिवर्सिटी ने कभी भी अपने रास्ते को भटकने नहीं दिया.

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आज़ादी की लड़ाई के दौरान वजूद में आई यह यूनिवर्सिटी अपने आंदोलन के इतिहास के चलते भी खूब सुर्खियों में रही है. महात्मा गांधी से लेकर जाकिर हुसैन तक, कई बड़े नाम यूनिवर्सिटी से जुड़े और अपनी खिदमत देते रहे.

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आज़ादी की लड़ाई के दौरान वजूद में आई यह यूनिवर्सिटी अपने आंदोलन के इतिहास के चलते भी खूब सुर्खियों में रही है. महात्मा गांधी से लेकर जाकिर हुसैन तक, कई बड़े नाम यूनिवर्सिटी से जुड़े और अपनी खिदमत देते रहे.

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जामिया मिल्लिया इस्लामिया ब्रिटिश हुकूमत के दौरान वजूद में आई थी और इस यूनिवर्सिटी की स्थापना को अग्रेंजों की एजुकेशन पॉलिसी के खिलाफ बग़ावत माना गया था जो अपना औपनिवेशिक शासन चलाने के लिए सिर्फ 'बाबुओं' को बनाने तक सीमित थी.

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मुल्क 1947 में आजाद हुआ और आज़ादी के बाद से आज तक यह यूनिवर्सिटी सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए मुल्क की दस टॉप यूनिवर्सिटियों  में शामिल है. हाल ही में सेंट्रेल एजुकेशन मिनिस्ट्री ने इसे देश के 40 यूनिवर्सिटियों में 'बेस्ट यूनिवर्सिटी' के दर्जे से सम्मानित किया है.

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महात्मा गांधी ने अगस्त 1920 में असहयोग आंदोलन का ऐलान करते हुए भारत वासियों से ब्रिटिश शैक्षणिक व्यवस्था और संस्थानों का बहिष्कार करने का आह्वान किया था. गांधी जी के आह्वान पर उस वक्त अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुछ टीचर्स और स्टूडेंट्स ने 29 अक्तूबर 1920 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया की बुनियाद रखी. 

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इसको बनाने में मुहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान, जाकिर हुसैन, मुख्तार अहमद अंसारी, अब्दुल मजीद ख्वाजा और महमूद हसन देवबंदी आदि का प्रमुख योगदान रहा. बाद में जामिया, अलीगढ़ से दिल्ली ट्रांसफर हो गया. जामिया के टीचर और स्टूडेंट्स पढ़ाई के साथ ही आज़ादी की लड़ाई के हर आंदोलन में हिस्सा लेने लगे. इसके चलते उन्हें अक्सर जेल जाना पड़ता था.

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ब्रिटिश शिक्षा और व्यवस्था के विरोध में बनी जामिया मिल्लिया इस्लामिया को पैसे और संसाधनों की बहुत कमी रहती थी. रजवाड़े और पैसे वाले लोग, अंग्रेज़ी हुकूमत के डर से इसकी आर्थिक मदद करने से कतराते थे. इसके चलते 1925 के बाद से ही यह बड़ी आर्थिक तंगी में घिर गया.

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ऐसा लगने लगा था कि यह बंद हो जाएगी लेकिन गांधी जी ने कहा कि कितनी भी मुश्किल आए, स्वदेशी शिक्षा के पैरोकार, जामिया को किसी कीमत पर बंद नहीं होना चाहिए.उन्होंने कहा, 'जामिया के लिए अगर मुझे भीख भी मांगनी पड़े तो मैं भीख मांगूगा'

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गांधी जी ने जमनालाल बजाज, घनश्याम दास बिड़ला और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय समेत कई लोगों से जामिया की आर्थिक मदद करने को कहा और इन लोगों की मदद से जामिया बंद होने के बच गया. इसीलिए, जामिया के कुलपति ऑफिस कंपाउंड में स्थित फाइनेंस दफ्तर की इमारत 'जमनालाल बजाज बिल्डिंग ' के नाम पर है.

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बेटे देवदास ने जामिया में एक शिक्षक के तौर में काम किया. गांधी जी के पोते रसिकलाल ने भी जामिया में पढ़ाई की. महान साहित्यकार, मुंशी प्रेमचंद का भी जामिया के साथ ख़ास रिश्ता रहा. 

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मुंशी प्रेमचंद अक्सर यहां आकर ठहरा करते थे. उनके गहरे दोस्त, डा ज़ाकिर हुसैन ने उनसे आग्रह किया कि क्यों नहीं वह जामिया में रहते हुए एक कहानी लिखें. मुंशी प्रेमचंद ने रात भर जग कर अपनी कालजयी कहानी 'कफ़न' यहीं लिखी. जिसे पहली बार जामिया पत्रिका में प्रकाशित किया गया.

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साल 2004 में जामिया में 'मुंशी प्रेमचंद अभिलेखागार और साहित्य केंद्र' की स्थापना की गई. इसमें प्रेमचंद की प्रकाशित, अप्रकाशित और अधूरी कहानियों समेत अखबारों-पत्रिकाओं में छपे उनके लेखों का संग्रह है. प्रेमचंद के अलावा अन्य भारतीय सहित्यकारों के दुर्लभ काम भी यहां उपलब्ध हैं.

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स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा रहे जामिया ने आज़ादी के बाद देश की ज़रूरतों के मुताबिक आधुनिक शिक्षा पर ख़ास ध्यान देना शुरू किया. जामिया देश का अकेली ऐसी यूनिवर्सिटी है जो भारत की तीनों सेनाओं, थल सेना, वायु सेना और नौसेना के जवानों और अधिकारियों के लिए आगे की पढ़ाई का मौका कराती है. सेना के जवान कम उम्र में भर्ती होते हैं और अन्य सर्विसेज़ की तुलना में कम उम्र में ही रिटायर हो जाते हैं. ऐसे में सेना में रहते हुए आगे की पढ़ाई करके अवकाश प्राप्ति के बाद उन्हें अच्छे रोज़गार पाने के मौके मिल जाते हैं.