डियर जिंदगी : नए का ‘शोर’ है लेकिन नया है कहां…

नया जानना अलग बात है और उसे अपनाकर नया होना अलग बात है. नए को भीतर आने देना और उसे अपनाना अगर इतना ही आसान होता तो हमारे सोच-विचार के तौर-तरीकों में कुछ तो फर्क आता.

डियर जिंदगी : नए का ‘शोर’  है लेकिन नया है कहां…

क्‍या नया इतना आसान है! जितना हम समझते हैं. नए की यात्रा हमारी समझ से कहीं अधिक मुश्किल है. हर ओर नए का शोर है लेकिन भीतर झांकते ही साफ हो जाता है कि नए के नाम पर केवल हल्‍ला है. जैसे कंपनियां अक्‍सर पुराने को ‘डस्‍टबिन’ में डालकर नया अपनाने को हमें ललचाती हैं, ठीक वैसे ही हमारा मन अक्‍सर नए की बातें, सपने देखा करता है लेकिन जैसे ही वह नए के ‘मैकेनिज्‍म’ से मिलता है, वह तुरंत उससे भागने लगता है.

नया जानना अलग बात है और उसे अपनाकर नया होना अलग बात है. अमेरिका-यूरोप से लेकर भारत तक लोग पूरे जनवरी माह में नए बरस की खुमारी में डूबे रहते हैं. हर कोई नए की बधाई दे रहा है, नए के आने की खुशी में इठलाता और उल्‍लास में मदहोश हुआ जा रहा है. लेकिन सोचिए जरा कि अगर वह हर नए बरस में थोड़ा भी नया होता, तो आज सचमुच उसमें कुछ भी पुराना बाकी न होता.

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नए को भीतर आने देना और उसे अपनाना अगर इतना ही आसान होता तो हमारे सोच-विचार के तौर-तरीकों में कुछ तो फर्क आता. भारत में सदियों से स्‍त्री-पुरुष में जो असमानता है, जातियों का दुराग्रह है और ऊंच-नीच की भयानक खाई है, वह यह बताने के लिए पर्याप्‍त है कि हम कपड़े बदलने को ही अक्‍सर नया मान लेते हैं. हमारे विचार और नई ऊर्जा जब मन के दरवाजे ही पार नहीं कर पाते तो वह आत्‍मा तक कैसे दस्‍तक देगें.

सदियों पुरानी जड़ हो चुकी व्‍यवस्‍था, सोचने-समझने के हमारे सारे तरीके ‘पुराने’ हो चुके हैं. विज्ञान बदल रहा, तकनीक बदल रही है. सामाजिक आर्थिक समीकरण बदल रहे हैं, लेकिन हम अपने विचार बदलने को तैयार नहीं हैं. भारत में ‘नए’ के शोर के बीच यह समझना बहुत जरूरी है, कि यह गहरी रचनात्‍मकता, संवेदनशीलता और साहस से आता है. मेरे नए के नायकों में राजा राममोहन राय, ईश्‍वरचंद विद्यासागर, ज्‍योतिबा फुले और आंबेडकर के नाम प्रमुख हैं.  

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परंपरा के नाम पर ‘पुराने और सड़े-गले’ विचार अमरबेल की तरह हमसे लिपटे हैं और हम उन्‍हें फूल समझकर अपने भीतर समेटे रहते हैं. नए का शोर तो बहुत है लेकिन नया है कहां! यहां तो थोड़ा इस पर सोचने की फुर्सत भी किसी को नहीं. हमारे रिश्‍तों में बासीपन, जिंदगी में उदासी और आत्‍महत्‍या का बढ़ता संकट यह बताने के लिए पर्याप्‍त है कि हमारा समाज बढ़ते शहरीकरण, टूटते परिवार और नए उमड़ते-घुमड़ते, आकार लेते रिश्‍तों की डोर संभालने में असफल रहा है.

हमारा शहर बदलता है. नौकरी बदलती है, साथ काम करने वाले लोग बदलते हैं लेकिन हम खुद कितना बदलते हैं. हमारे भीतर कितना बदलाव आता है. हम बाहर-बाहर दुनिया बदलने के पैंतरे लिए घूमते रहते हैं लेकिन हम खुद नए को स्‍वीकार करने में कितना पिछड़ते जाते हैं, इस ओर हमारा ध्‍यान शायद ही कभी जाता है.

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तो बात बस इतनी है कि अगर आपकी बातों को विरोध का सामना नहीं कर पड़ता. कोई आपका विरोधी नहीं. किसी को आपसे आपत्ति नहीं. सब आपके शुभचिंतक हैं तो यकीन मानिए कि आपकी विचार, चिंतन और जीवन प्रक्रिया में जरूर कोई खामी है.

इसके मायने यह भी हैं कि आप भी उन करोड़ों बहुसंख्‍यकों की तरह हैं, जो अपने चिंतन, विचार प्रक्रिया में दूसरों की तरह ही हैं. क्‍योंकि विरोध की पहली शर्त ही नवीनता है. उसका ही सब जगह विरोध होता है, जो कुछ नया सोचे और करे. जिसकी विचार प्रक्रिया में नवीनता और विद्रोह है ही नहीं, भला कौन उसका विरोध करेगा.इसलिए मेरा अनुरोध बस इतना है कि आगे से नए के शोर के बीच इतना जरूर सोचें कि आप अपने भीतर कितने नए बीज रोप रहे हैं. इससे कुछ और नहीं तो कम से कम जिंदगी को अपने मायने तलाशने में जरूर मदद मिलेगी.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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