हज सब्सिडी की समाप्ति : तुष्टीकरण से सशक्तिकरण की ओर एक कदम

सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकारों द्वारा मुस्लिम समाज से जुड़ा हुआ कोई भी निर्णय केवल सेक्युलर/कम्युनल के चश्मे से ही देखा जाता है और इसके प्रशासनिक दृष्टिकोण को हमेशा नजरअंदाज कर दिया जाता है.

हज सब्सिडी की समाप्ति : तुष्टीकरण से सशक्तिकरण की ओर एक कदम

मोदी सरकार ने हज यात्रा के ऊपर मिलने वाली सब्सिडी को हटा कर निश्चित रूप से सराहनीय निर्णय लिया है. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने इस निर्णय की घोषणा करते हुए कहा कि इस सब्सिडी का पैसा अल्पसंख्यकों की शिक्षा, विशेष तौर पर लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के लिए खर्च किया जाएगा. दुनिया भर से लाखों मुसलमान हर साल हज यात्रा पर सऊदी अरब के मक्का जाते हैं. हाल ही में सऊदी अरब ने भारत के हज कोटे में 5,000 सीटों की वृद्धि की. पिछले साल भी सऊदी अरब ने भारत के हज कोटे में 35,000 की वृद्धि की थी. इस साल 1.75 लाख मुसलमान हज यात्रा पर जाएंगे. गौरतलब है कि पिछले साल हज यात्रा के लिए 450 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई थी. हज यात्रा पर सरकारी सब्सिडी को लेकर लंबे समय से बहस और राजनीति होती रही है और इसको हटाने की मांग नई नहीं है. एक तरफ जहां कुछ लोग इसको मुस्लिम तुष्टीकरण का जरिया मानते हैं, वहीं दूसरी ओर इसे गरीब मुसलमानों के प्रति सरकार की जिम्मेदारी के तौर पर भी देखा जाता है. 1998 से 2004 तक केंद्र में रही वाजपेयी सरकार के दौरान संसदीय कमेटी ने हज सब्सिडी खत्म करने की सिफारिश की थी, लेकिन इसके बावजूद तत्कालीन भाजपा सरकार ने अपने आपको विपक्ष द्वारा ‘मुस्लिम-विरोधी’ कहलाए जाने के डर से सब्सिडी को बंद नहीं किया.

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2004 में कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी. गौरतलब है कि 2006 से ही विदेश मंत्रालय और परिवहन और पर्यटन पर बनी एक संसदीय समिति ने भी हज सब्सिडी को एक समयसीमा के भीतर खत्म करने का सुझाव दिया था. इसके बावजूद कांग्रेस सरकार ने भी हज सब्सिडी को जारी रखा. इसीलिए इसको समाप्त करने का असली श्रेय सर्वोच्च न्यायालय को मिलना चाहिए जिसने 2012 में भाजपा के पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रफुल्ल गोरादिया द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया था कि चरणबद्ध तरीके से दस सालों के अंदर (2022 तक) हज सब्सिडी को हटा दिया जाना चाहिए. वैसे भी इस सब्सिडी से मुस्लिम समाज को नहीं, बल्कि एयरलाइंस और टूर ऑपरेटर को ही फायदा होता है, जिनको सरकार हाजियों की सब्सिडी के नाम पर पैसे देती है. हालांकि यह मुद्दा आने वाले समय में गरमाने वाला है और निश्चित रूप से इसको लेकर राजनीति होगी. सवाल यह है कि क्या हज सब्सिडी सही में भारत सरकार की अल्पसंख्यकों के उत्थान के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करती है या यह वोट-बैंक की खातिर किया गया एक लोक-लुभावना तुष्टीकरण था, जैसा कि समय-समय पर इसके उपर आरोप लगता रहा है? सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकारों द्वारा मुस्लिम समाज से जुड़ा हुआ कोई भी निर्णय केवल सेक्युलर/कम्युनल के चश्मे से ही देखा जाता है और इसके प्रशासनिक दृष्टिकोण को हमेशा नजरअंदाज कर दिया जाता है. ट्रिपल तलाक जैसी महिला-विरोधी, संविधान-विरोधी कुप्रथा के ऊपर प्रतिबंध लगाने को लेकर भी इस देश में लंबे समय तक जो सियासत हुई और अभी भी हो रही है. उससे यह तो पता चलता है कि मुसलमानों को लेकर जो राजनीतिक-संभाषण बना हुआ है, उसमें प्रतीकात्मक और सांकेतिक कार्य वास्तविक सशक्तिकरण के ऊपर बहुत हावी हैं. इससे बड़ी क्या विडंबना हो सकती है कि स्वयं को 'मुस्लिम-हितैषी' बताने दल भी सत्ता में रह कर उनके लिए कुछ नहीं करते और भाजपा को सत्ता से रोकने के नाम के नाम पर उनसे वोट मांगते हैं. 

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मुस्लिम हितों के बौद्धिक ठेकेदार बनने वाले वामपंथी भी स्वयं मुस्लिम-उत्थान के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं, इसका जवाब मुस्लिम कल्याण के लिए 2005 में बनी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट बखूबी देती है. रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल में तीन दशक के वामपंथी शासन में मुसलमानों की हालत देश के अन्य राज्यों की तुलना में बहुत ही खराब हो गई. कमेटी ने तय किए गए लगभग सभी पैमानों में पश्चिम बंगाल को 'सबसे-खराब प्रदर्शन' करने वाले राज्यों की सूची में डाला. 25 प्रतिशत से भी अधिक संख्या होने के बावजूद सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की भागीदारी महज 4.2 प्रतिशत है और बंगाल सरकार के अंतर्गत आने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में से किसी में भी कोई मुस्लिम महत्वपूर्ण पद पर नहीं है. कमेटी के अनुसार बच्चों के स्कूल न जा पाने और स्कूल ड्रॉप-आउट की दर भी पश्चिम बंगाल में उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद सबसे अधिक थी. इस रिपोर्ट से वामपंथियों के तथाकथित 'मुस्लिम-प्रेम' में कथनी और करनी का बड़ा विरोधाभास सामने आता है और इतना तो साफ हो जाता है कि धर्म को 'जनता की अफीम' मानने वाले वामपंथी भी आम मुस्लिमों के उत्थान के नाम पर मुस्लिम इस्लामिक कट्टरपंथियों के तुष्टीकरण का कोई अवसर नहीं छोड़ते. इन सब के बीच मुस्लिम समाज के अंदर से उठने वाले सुधार और परिवर्तन के स्वर को जबरदस्ती डरा-धमका कर, फतवा आदि जारी कर दबा दिया जाता है. ट्रिपल तलाक के खिलाफ याचिका दायर करने वाली इशरत जहां को स्वयं उन्हीं के परिवार और मोहल्ले वालों के द्वारा किए गए सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है. 

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तुष्टीकरण और सशक्तिकरण में अंतर समझे बिना हम मुस्लिम समाज का भला कर ही नहीं सकते और उसके लिए स्वयं मुस्लिम समुदाय से आने वाले बुद्धिजीवियों को मुखर होना पड़ेगा. मुस्लिम समाज को अपने नेतृत्व के लिए देश के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद, कांग्रेसी नेता और ट्रिपल तलाक के विरुद्ध मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही सर्वप्रथम आवाज उठाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान और हाल ही में संसद में ट्रिपल तलाक को प्रतिबंधित करने वाले विधेयक के समर्थन में जोरदार भाषण देने वाले विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर सरीखे प्रगतिशील नेताओं की आवश्यकता है. वैसे सत्ताधारी भाजपा को भी चाहिए कि वो अपने उन नेताओं के ऊपर कड़ा नियंत्रण रखे जो समय-समय पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपनी बयानबाजी से नए-नए विवाद पैदा कर देते हैं और विपक्ष एवं मीडिया को यह आरोप लगाने का अवसर दे देते हैं कि भाजपा द्वारा देश में मुसलमानों के लिए भय का वातावरण तैयार किया जा रहा है. ऐसे लोग प्रधानमंत्री मोदी के 'सबका साथ, सबका विकास' के एजेंडे को ठेस पहुंचा सकते हैं, जो देश के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में शोधार्थी हैं.)
 

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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