Pavan Chaurasia

नेहरू को वंदना और आलोचना की नहीं, जानने की जरूरत है

नेहरू को वंदना और आलोचना की नहीं, जानने की जरूरत है

“हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,  जिस को भी देखना हो कई बार देखना.”

जरूरत है हिंदी को ‘हिंदीवादियों’ से सुरक्षित रखने की...

जरूरत है हिंदी को ‘हिंदीवादियों’ से सुरक्षित रखने की...

भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन द्वारा 2003 में लिखी गई पुस्तक ‘सेविंग कैपिटलिज्म फ्रॉम द कैपिटलिस्टस’ वैश्विक पूंजीवाद के विरोधाभासों को समझने के लिए एक शानदार किताब है.

JNU Elections : लाल के मुकाबले नीला और भगवा

JNU Elections : लाल के मुकाबले नीला और भगवा

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में इस साल 14 सितंबर को छात्र-संघ (जेएनयूएसयू- जवाहरलाल यूनिवर्सिटी स्टूडे

जो मृत्यु के सामने भी ‘अटल’ रहा, जिसकी “मौत से ठन गई”

जो मृत्यु के सामने भी ‘अटल’ रहा, जिसकी “मौत से ठन गई”

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की लम्बी बीमारी के चलते हुई मृत्यु के समाचार से पूरा देश गहरे शोक एवं सदमे में है.

मार्क्स @200: कितना प्रासंगिक है मार्क्सवाद?

मार्क्स @200: कितना प्रासंगिक है मार्क्सवाद?

कुछ दिन पहले जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, लेखक एवं इतिहासकार कार्ल मार्क्स की 200वीं सालगिरह थी.

दलितों के साथ भोजन करने से नहीं होगा सशक्तिकरण

दलितों के साथ भोजन करने से नहीं होगा सशक्तिकरण

भारत में जाति-व्यवस्था ने जितना देश की एकता को नुकसान पहुंचाया है उतना शायद ही किसी अन्य चीज ने पहुंचाया होगा.

आंबेडकर को मात्र ‘दलित-नेता’ कहना उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय

आंबेडकर को मात्र ‘दलित-नेता’ कहना उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय

14 अप्रैल भारत के लिए किसी भी राष्ट्रीय पर्व से कम नहीं है.

Opinion : 2019 के मोदी को है 2014 वाले मोदी की ज़रूरत...!

Opinion : 2019 के मोदी को है 2014 वाले मोदी की ज़रूरत...!

2019 के लोकसभा चुनावों में अब लगभग एक साल का ही समय रह गया है.

 फूलपुर, गोरखपुर उपचुनाव ने तय कर दी है 2019 लोकसभा चुनाव की दिशा

फूलपुर, गोरखपुर उपचुनाव ने तय कर दी है 2019 लोकसभा चुनाव की दिशा

राजनीति अनिश्चिताओं का खेल है जिसमे किसी भी चीज़ को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त रहना ठीक नहीं होता है.

Book Review : जीवन के गणित की 'प्रमेय' समझातीं रचनाएं

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एक नज़र में देखें तो कविता लेखन की वह विद्या-शैली है जो संभवत: सबसे जटिल प्रतीत होती है, और दूसरी ओर शायद सबसे सरल और स्वाभाविक भी जान पड़ती है.

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