महंगाई की एक और नई किस्त

केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा आम बजट 2015-16 में प्रस्तावित सेवा कर में वृद्धि कल यानी एक जून 2015 से लागू हो रही है। इसके साथ ही वर्तमान में 12.36 फीसदी सेवा कर की दर बढ़कर 14 फीसदी हो जाएगी। महंगाई की इस नई किस्त से रोजाना की तमाम सेवाओं के लिए आपकी जेब और ज्यादा ढीली होगी। कहने का मतलब यह कि मोदी सरकार की अर्थनीति के चलते आम आदमी की जिंदगी में मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।

सेवा कर की नई दरें लागू होने से घर खरीदना महंगा हो जाएगा। इसका असर निर्माणाधीन घरों पर भी पड़ेगा। प्रॉपर्टी की कीमतें बढ़ने के साथ नए खरीददारों को घर खरीदने के लिए अधिक कीमत चुकानी होगी। एक जून से एक करोड़ से कम कीमत की प्रॉपर्टी पर सर्विस टैक्स 3.50 फीसदी की दर से या प्रॉपर्टी की आधार मूल्य के 25 फीसदी पर 12.36 फीसदी सर्विस टैक्स चुकाना होगा। वहीं, एक करोड़ से अधिक की प्रॉपर्टी पर सर्विस टैक्स 4.2 फीसदी की दर से या प्रॉपर्टी के आधार मूल्य के 30 फीसदी पर 14 फीसदी की दर से सर्विस टैक्स चुकाना होगा। इसके अलावा दूसरे शुल्क भी बढ़ जाएंगे जैसे लीगल फीस, होम इंश्योरेंस व रजिस्ट्री फीस आदि।
 
रेस्टोरेंट में खाना, होटल में ठहरना, मनोरंजन, हवाई यात्रा, ट्रेनों के एसी क्लास के टिकट, माल ढुलाई, ईवेंट मैनेजमेंट, केटरिंग, सैलून, शराब, बीमा प्रीमियम, टिकट बुकिंग आदि महंगे हो जाएंगे। प्रथम श्रेणी और एसी श्रेणी के टिकटों पर अभी यात्रियों को 3.078 फीसदी की दर से सेवा कर देना होता है। एक जून से यह दर बढ़कर 4.2 फीसदी हो जाएगी। यानी इन यात्रियों को 0.5 फीसदी की दर से अधिक सेवा कर चुकाना होगा। जीवन बीमा के पहले वर्ष के प्रीमियम पर सेवा कर की दर 3 फीसदी से बढ़कर 3.5 फीसदी हो जाएगी। इसके आगे के प्रीमियम पर अभी 1.5 फीसदी का सेवा कर लग रहा है। एक जून से इसकी दर 1.75 फीसदी हो जाएगी। नई सेवा कर की दरें लागू होने से घरेलू उड़ानों में सेवा कर की दरें 0.6 फीसदी से बढ़कर 0.7 फीसदी जबकि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए सेवा कर की दरें 1.2 फीसदी से बढ़कर 1.4 फीसदी हो जाएंगी।

अभी हाल में उद्योग संगठन भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (एसोचैम) के एक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि महानगरों और बड़े शहरों में अधिकाधिक लोग घर में खाना बनाने की बजाय बाजार में बिकने वाले 'रेडी टू ईट' खाद्य पदार्थों का सहारा ले रहे हैं। इस सर्वेक्षण में 78 प्रतिशत महिलाओं का कहना है कि रसोई के बजट को नियंत्रित करने की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं। सर्वेक्षण के अनुसार बेमौसम बरसात की वजह से पैदावार घटने से पर्याप्त आपूर्ति नहीं होने और बिचौलियों की बढ़ती भूमिका के कारण बाजार में इस वर्ष आम, केला, अंगूर और सेब जैसे फलों की कीमतों में भी पिछले वर्ष के इसी सीजन की तुलना में 45 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। इस कारण मौसमी फल भी आम जनता की पहुंच से दूर हो गए हैं। सब्जियों के साथ-साथ फलों के दाम भी आसमान छू रहे हैं जिससे आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा पौष्टिक आहार से वंचित हो गया है। सभी महानगरों और प्रमुख नगरों में सब्जियों और फलों के दाम आम आदमी की पहुंच से दूर हो गए हैं। दाल पहले ही थाली से दूर हो चुकी है। 

बहरहाल, दुनिया के कई दिग्गज अर्थशास्त्रियों का भले ही यह मानना हो कि महंगाई 'मात्र' मौद्रिक घटना है, लेकिन अगर आप इसका व्यवहारिक अध्ययन करें तो पाएंगे कि महंगाई हमेशा 'गंभीर राजनीतिक और सामाजिक विघटन' से जुड़ी घटना का प्रतिफल होता है। यह बात हम इसलिए कह रहे हैं कि महंगाई राजनीतिक दलों क्रिएटिव बना देती है। जो भाजपा महंगाई को लेकर मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ भारत बंद किया करती थी, वह आजकल भारत की सरकार चला रही है। इसके बाद भी उन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का कुछ भी नहीं बिगाड़ पा पा रही है जिनसे राष्ट्रीय परिस्थितियों में महंगाई को बल मिलता है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि जो बातें मनमोहन सिंह बोला करते थे, वही बातें आज मोदी सरकार भी कहने लगी है। 

अगर आपको याद हो तो साल 2011 में प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि महंगाई दूर करने के लिए सरकार के पास कोई जादू की छड़ी नहीं जिसे घुमाते ही महंगाई छू-मंतर हो जाए। साल 2014 के जून में इस जादू की छड़ी का नाम इलेक्ट्रॉनिक स्विच हो गया। सवाल यह उठता है कि इस देश में कोई राजनेता है, जो ऐसी तुकबंदियों से आगे जाकर महंगाई के कारणों और उसे दूर करने में हमारी मजबूरियों या शक्तियों के बारे में विश्वसनीय तरीके से बता सके। दरअसल इस महंगाई के पीछे असली खेल जमाखोरों का होता है। राष्ट्रीय परिस्थिति में यही वह जमाखोर हैं, जिनके पकड़े जाते ही महंगाई कम होने के संकेत मिलने लगते हैं। हिन्दुस्तान की सभी सरकारें समय-समय पर जनता को दिलासा दिलाने के लिए इन जमाखोरों को खोजती है, एक दूसरे को निर्देश देती है कि तुम पकड़ो तो तुम पकड़ो। इससे पहले कि ये पकड़े जाएं, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों से आग्रह कर डाला कि वे जमाखोरी के मामलों के लिए स्पेशल कोर्ट का प्रबंध करें।

सच बात तो यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था इन सटोरियों, बिचौलियों और जमाखोरों के हाथों में ही खेलती है। अपना खून-पसीना एक करके उत्पादन करने वाले किसानों की जिंदगी कर्ज के बोझ तले दबकर खत्म हो जाती है। खुदरा बाजार में खाद्य पदार्थों के दाम चाहे कितना ही क्यों न बढ़ जाएं, किसान वर्ग को इसका फायदा कतई नहीं मिलता। इतना ही नहीं, धीरे-धीरे उनके हाथ से उनकी जमीन भी छिनती जा रही है।  इसीलिए तो यह कहना पड़ता है कि देश के 68 प्रतिशत किसान शासकीय नीति से उपेक्षित हैं। इसीलिए कहना पड़ता है कि महंगाई हमेशा 'गंभीर राजनीतिक और सामाजिक विघटन' से जुड़ी घटना का प्रतिफल होता है। हाल के कुछ वर्षों के दौरान देश का किसान और अधिक गरीब हुआ है जबकि उसके द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों के दामों में भारी इजाफा दर्ज किया गया। यह समूचा मुनाफा अमीरों की जेबों में चला जाता है। देश के अमीरों की अमीरी ने अद्भुत तेजी के साथ छलांगें लगाईं हैं। मंत्रियों और प्रशासकों के वेतन में जबरदस्त वृद्धि हो गई। दूसरी ओर साधारण किसानों में गरीबी का आलम है। आम आदमी की रोटी-दाल किसानों ने नहीं, वरन बड़ी तिजोरियों के मालिकों ने दूभर कर दी है। 

असलियत में देश के आर्थिक-सामाजिक हालात में सुधार का नाम ही वास्तविक विकास है। एक वर्ग के अमीर बनते चले जाने और किसान-मजदूरों के दरिद्र बनते जाने का नाम विकास नहीं बल्कि देश का विनाश है। निरंतर गति से बढ़ती महंगाई और शोषण के बीच चोली-दामन का संबंध है। महंगाई वास्तव में ताकतवर अमीरों द्वारा गरीबों को लूटने का एक अस्त्र है। इस खतरनाक साजिश में सरकारें भी अमीरों के साथ शामिल हैं। वास्तव में सरकार ने बाजार की ताकतों को इतना प्रश्रय और समर्थन दे दिया है कि घरेलू बाजार व्यवस्था सरकारी नियंत्रण से बाहर होकर बेकाबू हो चुकी है। सटोरिए, दलाल और बिचौलिए इसमें सबसे अहम किरदार हो गए हैं। और तय मानिए ये अहम किरदार बिना सरकार की शह के अपनी भूमिका नहीं निभा सकते। जाहिर है जब तक ये किरदार सरकार पर हावी रहेंगे, महंगाई की नई-नई किस्तें देश की जनता के नाम जारी होती रहेंगी।