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जाति निभाती है बिहार की राजनीति में अहम किरदार, क्या कम हुआ है सवर्णों का वर्चस्व!

 चुनाव के अंतिम दिन विकास पर जाति का समीकरण भारी पड़ता है. इसलिए राजनीतिक दल इसी जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवार उतारते हैं. 

जाति निभाती है बिहार की राजनीति में अहम किरदार, क्या कम हुआ है सवर्णों का वर्चस्व!
1977 के बाद बिहार की राजनीति से सवर्ण समुदाय का वर्चस्व खत्म होने लगा.

पटना: बिहार की राजनीति हमेशा से अलग रही है. यहां की राजनीति में जाति का गणित काफी अहम है और एक कड़वी सच्चाई है कि चुनाव के अंतिम दिन विकास पर जाति का समीकरण भारी पड़ता है. इसलिए राजनीतिक दल इसी जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवार उतारते हैं. बिहार की राजनीति का विशलेषण करने वालों के मुताबिक हर दशक में अलग-अलग जातियां चुनावी दिशा को तय करती हैं.1977 तक बिहार की सियासत में सवर्णों  का बोलबाला रहा लेकिन बात के बरसों में सवर्णों की जगह दलित और पिछड़ी जातियों ने ले ली और अब राजनीति भी दलित और पिछड़ों के इर्द-गिर्द तक सिमट कर रह गई है. 

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ किकभी राजनीति के शीर्ष में अहम भूमिका निभाने वाला सवर्ण समुदाय अब राजनीति में सिर्फ रस्म अदायगी भर की होकर गई है. श्रीकृष्ण सिंह, दीप नारायण सिंह, बिनोदानंद झा, केदार पांडेय, बिन्देश्वरी दूबे,भागवत झा आजाद,ज गन्नाथ मिश्र वो नाम हैं जिन्होंने बिहार में मुख्यमंत्री पद के तौर पर राज किया और ये सभी सवर्ण समुदाय से हैं. 

 

अप्रैल 1946 से 1977 तक बिहार में (कुछ समयों को छोड़कर) सवर्ण जाति के मुख्यमंत्री रहे. इसी से समझा जा सकता है कि बिहार की राजनीति में सवर्ण तबका कितना प्रभावशाली था और कैसे सत्ता का चक्र इनके इशारों पर चलता रहा. 1977 के बाद बिहार की राजनीति से सवर्ण समुदाय का वर्चस्व खत्म होने लगा और मंडल कमीशन के बाद सवर्ण समुदाय की भूमिका काफी सीमित हो गई. जगन्नाथ मिश्रा बिहार के सवर्ण जाति से अंतिम मुख्यमंत्री थे. 

1990 में लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने और तब से लेकर अब तक बिहार में पिछड़ी या ओबीसी समुदाय से मुख्यमंत्री हैं. जहां लालू प्रसाद यादव की पहचान सामाजिक न्याय के मसीह के तौर पर होती है वहीं नीतीश कुमार की पहचान बिहार को विकास की नई पहचान देने वाले सीएम के तौर पर होती है. राष्ट्रीय जनता दल में सवर्ण चेहरा माने जाने वाले शिवानंद तिवारी का कहना है कि ऐसा नहीं है कि बिहार में सवर्ण कोई फैक्टर नहीं हैं और उदारीकरण के दौर के जातियों का बंधन टूटा. 

सवर्ण जातियों को छोड़कर दूसरी जातियों में ये बात घर करने लगी है कि जिसकी जितने भागेदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी. शिवानंद तिवारी के मुताबिक, मध्यम वर्ग में अधिकतम संख्या सवर्ण समुदाय की होती है और जैसे-जैसे उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण का प्रभुत्व बढ़ता गया सवर्ण समुदाय ने खुद को ड्राइंग रूम की राजनीति में समेट लिया. बिहार में फिलहाल जनता दल यूनाइटेड, एलजेपी और भारतीय जनता पार्टी की संयुक्त सरकार है.

जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन के मुताबिक, बिहार में जातिगत राजनीति जितना लालू यादव ने किया है उतना किसी ने नहीं किया. उन्होंने कहा कि, नीतीश कुमार सामाजिक न्याय के साथ विकास की बात करते हैं. दूसरी ओर आंकड़ें बताते हैं कि सवर्ण समुदाय का परंपरागत रूझान कांग्रेस से शिफ्ट होकर बीजेपी की तरफ हो गया है और ये आज की तारीख में बीजेपी का बड़ा राजनीतिक आधार है. हालांकि बीजेपी प्रवक्ता अजीत चौधरी के मुताबिक, पार्टी जातिगत राजनीति में भरोसा नहीं करती है.

बिहार में बड़े समाजशास्त्री और प्रोफेसर अजय कुमार के मुताबिक, राजनीति में सवर्णों की भूमिका कम होने के कई कारण हैं. अजय कुमार के मुताबिक,बिहार में लंबे समय तक जब पढ़े लिखे लोगों को काम नहीं मिलने लगा तो ये लोग भारत के दूसरे शहरों में शिफ्ट हो गया और वे वहीं जाकर बस गए. नतीजतन गांव का गांव खाली हो गया. राजनीति में वोट की ताकत का महत्व है और जब सवर्ण समुदाय का बड़ा हिस्सा देश के दूसरे शहरों में बस गया तो सियासी दलों ने भी उनकी पूछ कम कर दी.

अजय कुमार मानते हैं कि मंडल आंदोलन ने बिहार में सवर्ण राजनीति की कमर तोड़ दी. पिछड़ी जातियों में ये संदेश भेजा गया कि जब जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी सवर्णों से कहीं ज्यादा है तो मुख्यमंत्री भी पिछड़ी, दलित या फिर ओबीसी समुदाय से ही क्यों न हो. इन तमाम चीजों के बीच बिहार में भागलपुर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, बक्सर, आरा, गोपालगंज, बाल्मीकिनगर, पश्चिमी चंपारण, पटना साहिब जैसी लोकसभा सीटों पर सवर्ण निर्णायक हैं.

बिहार में सवर्णों का प्रतिशत 11.60 फीसदी है. 2014 के एक अनुमान के मुताबिक, भारत में लोकसभा की 125 सीटें ऐसी हैं जहां सवर्ण तबका वोट के लिहाज से मायने रखता है. इस बार भी लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने अधिकतम सीटें पिछड़े समुदाय को दी है. बिहार बीजेपी में भी कुछ दिनों पहले सवर्णों की कथित उपेक्षा पर कुछ सवर्ण नेताओं ने बगावत कर दी थी. जिसे बाद में ये कहकर समाप्त किया गया कि विधानपरिषद और राज्यसभा में प्राथमिकता के आधार पर सवर्णों को भेजा जाएगा.

ऐसा नहीं कि बिहार सरकार में सवर्ण समुदाय से मंत्री ,लोकसभा या विधानसभा और राज्यसभा के सांसद नहीं हैं लेकिन ये सच्चाई है कि कभी राजनीति में जिस सवर्ण समुदाय का सिक्का चलता था आज वो हाशिये पर है.क्योंकि राजनीति में हर वोट अहम रखता है लिहाजा राजनीतिक दल भी इसी हिसाब से जातियों को उनकी संख्या के आधार पर टिकट बांटते हैं.