DNA ANALYSIS: High Beam Headlights का खतरा, जानिए कैसे ये बन रही हादसे की बड़ी वजह

नियम कहता है कि शहर की सड़कों पर High Beam Headlights में गाड़ी चलाना गैर क़ानूनी है. Indian Motor Vehicle Act 2019 के सेक्शन 177 के तहत इसका उल्लंघन करने पर पहली बार 500 रुपये का जुर्माना है.

DNA ANALYSIS: High Beam Headlights का खतरा, जानिए कैसे ये बन रही हादसे की बड़ी वजह

नई दिल्ली: आज DNA में आपको गाड़ियों की High Beam Headlights के ख़तरों के बारे में बताना चाहते हैं. जब हमने विस्तार से गाड़ियों की High Beam Headlights पर रिसर्च की तो हमें पता चला कि ये हेडलाइट्स असल में संक्रमण का रूप ले चुकी हैं और ये संक्रमण तेजी से हमारे देश के लोगों की जान ले रहा है, लेकिन इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है.

33 प्रतिशत दुर्घटनाओं का कारण

एक नई स्टडी के मुताबिक़, भारत में रात के समय होने वाली 33 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाओं का कारण गाड़ियों की High Beam Headlights होती हैं.

बड़ी बात ये है कि इसके इस्तेमाल को लेकर कई तरह के नियम हैं, जुर्माने का प्रवाधान है और सड़क परिवहन मंत्रालय इस पर चिंता भी जता चुका लेकिन इसके बावजूद ये विषय कहीं भी प्राथमिकता में नहीं है.

आप ख़ुद सोचिए जान बचाने से ज़्यादा ज़रूरी क्या हो सकता है? और इसीलिए आज हम इस विषय पर आपके साथ चर्चा करना चाहते हैं.

High Beam और Low Beam Headlights क्या हैं?

High Beam और Low Beam Headlights क्या होती हैं. पहले आप ये समझिए-

High Beam Headlights का मतलब होता है जब हेडलाइट्स की रेंज काफी ज्यादा होती है और ये नीचे पॉइंट करने की जगह रोशनी सीधे फेंकती हैं, लेकिन Low Beam में ऐसा नहीं होता. Low Beam में हेडलाइट्स की रोशनी नीचे की तरफ होती है.

यहां एक क़ीमती जानकारी आपके लिए ये है कि लेफ्ट हैंड ड्राइविंग देशों में जैसे भारत, ब्रिटेन और पाकिस्तान में Low Beam Headlight की रोशनी लेफ्ट की तरफ नीचे पड़ती है, जबकि राइट हैंड ड्राइविंग वाले देशों में Low Beam Light दाई तरफ़ नीचे पड़ती है. ऐसा इसलिए होता है ताकि सामने से आने वाले व्यक्ति की आंखों में इसकी रोशनी न पड़े और सड़क दुर्घटना न हो.

जब Headlights High Beam में होती है तब इसकी रोशनी 100 मीटर के क्षेत्र को कवर करती है। इस दौरान गाड़ी से 70 मीटर की दूरी पर अगर तीन लोग खड़े हों तो ये तीनों लोग आंखों में इसकी रोशनी पड़ने से कुछ साफ़ नहीं देख सकते, जबकि Low Beam में Headlights की रोशनी 40 मीटर तक ही पड़ती है. इसमें ज़्यादा ख़तरा नहीं होता क्योंकि, रोशनी नीचे की तरफ़ पड़ती है.

कई मामलों में ऐसा भी होता है, जब High Beam में Headlights की रोशनी 150 मीटर तक के क्षेत्र पर पड़ती है और Low Beam में ये 30 मीटर तक प्रभावी होती है और 60 मीटर तक इसका प्रकाश रहता है.

High Beam Headlights में गाड़ी चलाना गैर क़ानूनी

नियम कहता है कि शहर की सड़कों पर High Beam Headlights में गाड़ी चलाना गैर क़ानूनी है.

Indian Motor Vehicle Act 2019 के सेक्शन 177 के तहत इसका उल्लंघन करने पर पहली बार 500 रुपये का जुर्माना है, दूसरी बार 1500 रुपये का जुर्माना और बार बार इस नियम का उल्लंघन करने पर ड्राइविंग लाइसेंस भी रद्द हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद लोग हेडलाइट्स को High Beam पर चलाते हैं. इससे होता ये है कि सामने से आ रही दूसरी गाड़ी में बैठे लोगों को कुछ नहीं दिखता.

एक अध्ययन में कहा गया है कि जब आपकी आंखों पर High Beam Headlights की रोशनी पड़ती है तो इससे आपके विज़न पर असर पड़ता है. हिन्दी में विज़न को दृष्टि कहते हैं और ये अध्ययन कहता है कि ऐसी स्थिति में आपके विज़न को रिकवर होने में 20 से 60 सेकेंड लगते हैं. ये ठीक वैसा ही है, जैसे गाड़ी चलाते समय आपकी आंखों में कोई धूल झोंक दे और आप कुछ देख ही न पाए.

हालांकि आज कल High Beam पर गाड़ी चलाने का एक ट्रेंड सा बन गया है. लोग LED Bulbs और लाइट्स का भी इस्तेमाल करते हैं. इसके अलाव आज कल जितनी भी नई गाड़ियों आ रही हैं, उनकी हेडलाइट्स की रोशनी बहुत तेज़ होती है. आप इसका इस्तेमाल करते हैं और इसके कारण कई सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और लोग अपनी जान गंवा देते हैं.

कब गाड़ी की हेडलाइट्स को High Beam में रख सकते हैं?

ये एक ऐसी समस्या है, जिससे हर व्यक्ति कभी ना कभी गुज़रा है और अधिकतर लोग तो इसका हर दिन सामना करते हैं. लेकिन क्या आपको पता है आप कब गाड़ी की हेडलाइट्स को High Beam में रख सकते हैं. इसे आप तीन पॉइंट्स से समझिए.

पहला Point- अगर आप शहर से बाहर गए हैं, हाइवे पर गाड़ी चला रहे हैं और ट्रैफिक कम है, तब आप ऐसी स्थिति में हेडलाइट्स को High Beam पर रख सकते हैं.

दूसरा Point- अगर सड़क पर अंधेरा है, स्ट्रीट लाइट्स बंद हैं या धीमी हैं, तो ऐसी स्थिति में भी आप अपनी गाड़ी की हेडलाइट्स को High Beam पर रख सकते हैं.

और तीसरा Point- अगर आपकी गाड़ी के 200 मीटर के दायरे में कोई और दूसरा वाहन नहीं है तो भी आप हेडलाइट्स को High Beam पर रख सकते हैं.

कब नहीं रख सकते

अब आपको ये बताते हैं कि आप कब अपनी गाड़ी की हेडलाइट्स को High Beam पर नहीं रख सकते हैं.

धुंध और कोहरे के समय आप गाड़ी की हेडलाइट्स को High Beam पर नहीं रख सकते.

बारिश के समय में भी आप ऐसा नहीं कर सकते.

अगर आसपास कोई मोड़ है तब भी आप ऐसा नहीं कर सकते.

ट्रैफिक सिग्नल पर भी आप गाड़ी की हेडलाइट्स को High Beam पर नहीं रख सकते.

और अगर किसी सड़क पर ट्रैफिक है तो तब भी आप ऐसा नहीं कर सकते.

हालांकि बहुत से कम लोग हैं, जिन्हें ये बातें पता होती हैं. 2016 में Arrive Safe नाम के एक NGO ने ढाई हज़ार किलोमीटर का एक सफ़र करके इस विषय को लेकर कुछ जानकारियां जुटाई थी और ये एक तरह का सर्वे था.

तब इसमें पता चला था था कि सिर्फ़ 26.15 प्रतिशत लोग ही High Beam Lights का सही इस्तेमाल करते हैं, जबकि 73.83 प्रतिशत लोग High Beam Lights का ऐसी जगह इस्तेमाल करते हैं, जो गैर क़ानूनी है.

ऐसा नहीं है कि पुलिस ने इसे लेकर कभी कोई कार्रवाई नहीं है. अलग अलग राज्यों में इसे लेकर बड़े स्तर पर पुलिस जागरूकता अभियान चला चुकी है इसके बावजूद लोग इस विषय को लेकर गंभीरता नहीं दिखाते और ऐसा सोचते हैं कि इससे कुछ नहीं होता.

-वर्ष 2018 में दिल्ली पुलिस ने High Beam Headlights में गाड़ी चलाने के लिए 5 हज़ार 710 चालान किए थे.

-वर्ष 2019 में ऐसे चालान की संख्या 3 हज़ार 427 रही थी, जबकि वर्ष 2020 में सिर्फ़ 427 लोगों का चालान किया.

-2020 में कम चालान इसलिए हुए क्योंकि, इस दौरान कोरोना वायरस आ चुका था और पूरा देश लॉकडाउन में था.

-यही नहीं कोरोना वायरस के आने के बाद से रात में सड़कों पर वाहनों की संख्या घटी है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि लोग जागरूक हो गए हैं या जिम्मेदार बन गए हैं.

नियमों का उल्लंघन 

इसी साल जनवरी और फरवरी महीने में दिल्ली पुलिस ने 82 चालान High Beam से संबंधित नियमों का उल्लंघन करने पर किए. आज स्थिति ये है कि हर दूसरी गाड़ी ट्रैफिक के बीच High Beam पर चलती है और ये बीमारी संक्रमण की तरह फैल चुकी है. लोग न ही इसकी गम्भीरता समझना चाहते हैं और न ही इसे लेकर जागरूक हैं. हमने आज इस पर कुछ लोगों से बात की, जिन्हें ये पता ही नहीं था कि वो आज तक High Beam पर गाड़ी चला रहे थे. सोचिए अधिकतर लोगों को पता ही नहीं है इसके बारे में.

-वर्ष 2019 में भारत में 4 लाख 37 हज़ार 396 सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं.

-तब इन दुर्घटनाओं में 1 लाख 51 हज़ार 113 लोग मारे गए थे.

-यानी हमारे देश में सड़क दुर्घटनाओं से हर दिन 414 लोगों की मौत होती हैं और हर घंटे 17 जानें इन दुर्घटनाओं की वजह से जाती हैं.

हर घंटे 17 लोग गंवा देते हैं अपनी जान 

लेकिन इसके बावजूद हम इसे बड़ा विषय नहीं मानते. सोचिए क्या आपने कभी गाड़ी तेज़ चलाते समय ये सोचा था कि सड़क दुर्घटनाओं में हर घंटे 17 लोग अपनी जान गंवा देते हैं और ये तो एक ऐसी बीमारी है, जिसकी लहर भी कभी नीचे नहीं आती. कहने का मतलब ये है कि सड़क दुर्घटनाओं का संक्रमण कोरोना के संक्रमण से भी खतरनाक है.

1920 के दशक में आई High और Low Beam Headlights

आपको शायद पता नहीं होगा 1980 के दशक में वाहनों की हेडलाइट्स के हाफ पोर्शन को काले रंग से पेंट किया जाता था. तब ऐसा इसलिए होता था क्योंकि, पुरानी गाड़ियों की हेडलाइट्स में बीम एडजस्टर नहीं होते थे और इस वजह से कई सड़क दुर्घटनाएं होती थीं. उस समय ये विषय गंभीरता से लिया गया और लोगों की जान बचाने के लिए ये नियम बनाया गया.

Central Motor Vehicles Rules 1989 के तहत तब ये अनिवार्य था. तब लोगों को अपनी गाड़ी की हेडलाइट के आधे हिस्से को काल रंग से पेंट करना होता था, लेकिन बाद में दौर बदला और गाड़ियों में बीम एडस्टर आने लगे.

बीम असल में हेडलाइट्स से निकलने वाली प्रकाश ऊर्जा को कहते हैं. अब पहले होता ये था कि हेडलाइट से निकलने वाली प्रकाश ऊर्जा अपने आकार के हिसाब से फैल जाती थी. इसे तब एडजस्ट नहीं किया जा सकता था.

एक दिलचस्प जानकारी ये है कि गाड़ियों में High और Low Beam Headlights 1920 के दशक में आई थीं. तब इसे चालू करना का बटन गाड़ी के बाहर होता था. यानी उस समय हेडलाइट का फोकस बदलने के लिए लोगों को गाड़ी रोकनी पड़ती थी और बाहर आना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब वाहनों के हैंडल के साथ ही ये विकल्प कंपनियां देती हैं और अब वाहनों में बीम एडजस्टर भी होता है.

यानी तकनीक आ गई, लोगों को सुविधा भी मिल गई लेकिन वो इस सुविधा का सही इस्तेमाल नहीं कर पाए.

आपको शायद पता नहीं होगा कि वाहनों पर हेडलाइट्स का चलन बहुत पुराना है. इन हेडलाइट्स को वाहनों की आंखें माना गया है. 19वीं शताब्दी में जब घोड़ी गाड़ी चलती थी, तब भी इन पर केरोसिन से जलने वाली लाइट्स इस्तेमाल होती थीं. वर्ष 1908 में ब्रिटेन के बर्मिंघम में पहली बार गाड़ी पर इलेक्ट्रिक लाइट्स लगाई गई थीं.

हालांकि 1920 तक आते आते इनमें High Beam और Low Beam की सुविधा आ गई. फिर 1970 और 1980 के दशक में कार कंपनियों ने ऐसी गाड़ियां बनाई, जिनमें हेडलाइट्स छिपी होती थीं और बटन दबाने पर ये हेडलाइट बाहर आती थीं. ये दौर भी बदला और 1990 के दशक में पहली बार BMW कपंनी ने गाड़ियों में HID यानी High Intensity Discharge System को लॉन्च किया. इसमें हेडलाइट्स काफ़ी ब्राइट होती थीं और लोग आसानी से देख पाते थे.

जागरूकता की कमी

आज लगभग सभी गाड़ियों में अच्छी और फैन्सी हेडलाइट्स आने लगी हैं, लेकिन इसको लेकर जागरूकता की कमी ने आज हेडलाइट्स को संक्रमण की श्रेणी में ला दिया है.

 

एक लाइन में कहें तो पहले सड़क पर चलते समय एक कहावत बोली जाती थी कि नज़र हटी, दुर्घटना घटी, लेकिन हेडलाइट्स की तेज़ रोशनी ने अब इस कहावत को भी बदल दिया है. अब अगर हाई बीम पर कोई गाड़ी आ रही है और आपकी नजर रास्ते पर ही है तब भी दुर्घटना घट सकती है.

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