बंगाल के चाय बागान श्रमिक क्‍यों हैं बड़ा चुनावी मुद्दा? पढ़ें Ground Report
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बंगाल के चाय बागान श्रमिक क्‍यों हैं बड़ा चुनावी मुद्दा? पढ़ें Ground Report

West Bengal Assembly Election 2021: पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में आपको दूर-दूर तक चाय के खूबसूरत बागान नजर आएंगे. लेकिन इन हरी पत्तियों को देखकर ये मत समझिएगा कि यहां हरियाली की खुशहाली है. दरअसल, यहां के बागानों की हालत बहुत खराब है और इसका सबसे ज्‍यादा असर यहां काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ा है.

बंगाल के चाय बागान श्रमिक क्‍यों हैं बड़ा चुनावी मुद्दा? पढ़ें Ground Report

नई दिल्‍ली: चाय की पत्तियां आपको सुबह-सुबह तरोताजा करती हैं. घर में कोई मेहमान आ जाए तो आदर सत्कार में लोग चाय के लिए पूछते हैं. लेकिन इस पर हमारी कभी ध्यान नहीं जाता कि इन चाय के बागानों में काम करने वाले मजदूर की क्‍या स्थिति है. आज हम आपको पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों के बारे में बताएंगे, जिन्‍हें दो वक्‍त की रोटी भी नसीब नहीं हो पा रही. 

श्रमिकों को महीनों से नहीं मिली मजदूरी 

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में आपको दूर-दूर तक चाय के खूबसूरत बागान नजर आएंगे. लेकिन इन हरी पत्तियों को देखकर ये मत समझिएगा कि यहां हरियाली की खुशहाली है. यहां के बागानों की हालत खराब है. इन बागानों में काम करने वाले श्रमिकों को पैसा मिला तो मिला, नहीं तो नहीं. बागान बहुत दिनों से बंद हैं और अब इनके पास खाने-पीने के पैसे भी नहीं. 

सबसे ज्यादा चायपत्ती निर्यात करता है भारत

ये हालत तब है, जब  भारत पूरी दुनिया को सबसे ज्यादा चायपत्ती निर्यात करता है. आपको जानकर गर्व होगा कि चीन के बाद भारत वो देश है जो सबसे ज्यादा चायपत्ती का निर्यात करता है. भारत में उगाई जाने वाली 18 प्रतिशत चायपत्ती विदेशों में भेजी जाती है.

tea garden

भारतीय चाय उद्योग ने साल 2017-18 में विदेशी निर्यात से 3,955 करोड़ रुपये और साल 2018-19 में 4,321 करोड़ रुपये की कमाई की थी.

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2018 के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय चाय उद्योग का घरेलू और विदेशी व्यापार 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का था. 

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लेकिन ये बड़े-बड़े आंकड़े और करोड़ों में हो रही बात तब सही नहीं लगती है, जब इन बागानों में काम करने वाले मजदूरों की रोज मिलने वाली मजदूरी का जिक्र होता है. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि ये मजदूरी कई बार एक कप चाय की कीमत से भी कम होती है. 

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ऐसे होती है चाय की पत्‍ती की बिक्री

दरअसल, चाय की पत्ती की बिक्री ऑक्शन के जरिए होती है. इसका हफ्ते में पेमेंट होता है, 600-700 रुपये.  लेकिन 3 महीने से कोई पैसा नहीं मिला है. यहां काम करने वाले लोगों को बागान से कोई पैसा नहीं मिलता. लोगों ने बताया कि उनके पास नमक खरीदने के लिए भी पैसा नहीं है. इनमें कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो बुजुर्ग हैं और इसलिए काम करने बाहर भी नहीं जा सकते. ये जैसे-तैसे तकलीफ से अपना घर चला रहे हैं. 

कारोबारियों को फायदा, लेकिन मजदूरों की परवाह नहीं

जलपाईगुड़ी के मजदूरों की हालत खराब हो गई है. बागान बंद हैं, मजदूरी का रेट नहीं मिल रहा है. असल में काम करने वाले मजदूरों  को आप किसान कह सकते हैं, भले ही जमीन न हो. चाय की खेती में इन्हीं मजदूरों का हाथ होता है. चाय के कारोबारियों को, मालिकों को तो चाय के बागानों से बहुत लाभ होता है. लेकिन मजदूरों की परवाह किसी को नहीं होती.

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भारत में चायपत्ती के 1 हजार 585 बड़े बागान हैं. ये बागान पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु में हैं. चाय के कुल व्यापार में 52 प्रतिशत हिस्सेदारी इन बड़े चाय बागानों की ही है, जबकि 48 प्रतिशत हिस्सेदारी साधारण किसानों की है.

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रेलवे और सेना के बाद चाय बगान तीसरा सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र

देश में इस वक्त रेलवे और सेना के बाद चाय बगान तीसरा सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र है. चाय उद्योग में प्रत्यक्ष तौर पर 15 लाख और अप्रत्यक्ष रूप से 45 लाख लोग काम करते हैं. पश्चिम बंगाल में ही चाय उद्योग से 3 लाख 37 हजार 316 किसान मजदूर और दूसरे कर्मचारी काम करते हैं. 

इन सबके बावजूद चाय बागान के मजदूरों की हालत में कोई सुधार नहीं है न ही उनके बारे में कोई कुछ सोच रहा है.

बागानों से चलता है 3 से 4 लाख मजदूरों का परिवार

यहां पर 200 के करीब बागान हैं. बहुत सारे बंद पड़े हैं. हालात बहुत खराब हैं. साढ़े 3 से 4 लाख मजदूरों का परिवार चलता है. बागान का मजदूर का मेहनताना सबसे कम है. पहले जो सुविधा मिलती थी, वो भी नहीं मिलती है. धीरे धीरे सबकुछ कम होता जा रहा है. यहां मूल मुद्दा ये है कि बागान बंद हो जाने सेखाने-पीने की समस्‍या हो गई है. चाय बागान की सरकारी मजदूरी 165 दिहाड़ी है, लेकिन मजदूरी मिलती है 600 रुपये हफ्ता, पश्चिम बंगाल सरकार इसके लिए कुछ नहीं करती.

अभी तो चाय की फसल तैयार नहीं है. इसलिए यहां मजदूर खेतों में नहीं दिख रहे हैं. मार्च से मई के बीच फसल तैयार होती है और इसी दौरान पत्तियां इकट्ठा का काम भी शुरू रहता है, जो नवंबर महीने तक चलता है. अलग-अलग महीने में तोड़ी गई पत्तियों का स्वाद और रंगत भी अलग होती है. पर मजदूरों के खाने का स्वाद और जिंदगी की रंगत नहीं बदलती. 

सरकार से नहीं मिल रही मदद 

बगान मजदूरों ने बताया कि कुछ मजदूरों की ज़मीन है, जिस पर दूसरी फसल की खेती करते हैं. बागान बंद हो गए है, ऑफ सीज़न है. पत्ती होने से लोग बेचते हैं और यह अलग अलग कीमत में बिकती है. उससे लेबर का पेमेंट होता है. पेमेंट हर हफ्ते के हिसाब से की जाती है. पश्चिम बंगाल सरकार इन बागानों के लिए कुछ नहीं कर रही.  

बागान मालिकों की होनी वाली कमाई को कृषि से होने वाली कमाई माना जाता है.  इस वजह से उस कमाई पर कोई टैक्स नहीं लगता. दरअसल, चाय के बागानों से दो तरह से कमाई होती है. पहला है, चाय पत्ती को सीधे बाजार में नीलामी करके बेच दिया जाना. दूसरा है, फैक्ट्री से प्रोसेस्ड चायपत्ती बाजार में बेचना. 

चायपत्ती को सीधे बाजार में बेचने से होने वाली कमाई टैक्स फ्री होती है, जबकि प्रोसेस्‍ड चायपत्ती बेचने पर बागान मालिकों की कुल कमाई के 40 फीसदी हिस्से पर ही टैक्स लगता है. 

यानी दोनों ही तरीके से बागान मालिकों को फायदा ही होता है. लेकिन बागानों में काम करने वाले मजदूरों को उनकी मजदूरी भी पूरी नहीं मिलती. 

देश में बंद पड़े 11 बड़े चाय के बागानों में से 8 यहीं पर

पश्चिम बंगाल के चाय बागानों के मजदूरों के हालात इसलिए ज्यादा खराब है क्योंकि, देश में इस वक्त बंद पड़े 11 बड़े चाय के बागानों में से 8 यहीं हैं. बंद पड़े बागानों के अलावा चाय उद्योग से जुड़ी फैक्ट्रियां भी बंद हैं, जिससे यहां भी रोजगार के अवसर खत्म हो गए हैं. हमारी इस रिपोर्ट में हमें दो तरह के किसान नजर आए. एक वो जो चाय बागान के मालिक हैं. जिनकी कमाई का जरिया कृषि है मगर वो खेती नहीं करते और दूसरे वो जो चाय के बागानों में खेती करते हैं, लेकिन किसान नहीं मजदूर कहलाए जाते हैं. 

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