ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग: यहां भगवान शिव और माता पार्वती खेलते हैं चौपड़! ये मांधाता के नाम की कहानी
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ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग: यहां भगवान शिव और माता पार्वती खेलते हैं चौपड़! ये मांधाता के नाम की कहानी

नर्मदा किनारे महादेव की निराकर रूप में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है. मान्यता है कि भगवान भोले नाथ यहां खुद विराजित हुए हैं. आज हम बता रहे है यहां कि इतिहास और पौराणिक महत्व के बारे में...

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग: यहां भगवान शिव और माता पार्वती खेलते हैं चौपड़! ये मांधाता के नाम की कहानी

प्रमोद सिन्हा/खंडवा: 14 जुलाई 2022, दिन गुरुवार से श्रावण (सावन) महीने की शुरुआत हो रही है. इस महीने में भगवान शिव के भक्त उनकी आराधना में डूब जाते हैं. इस माह में देश के 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है. इन्हीं 12 में एक ज्योतिर्लिंग है खंडवा में है, जिसे ओंकारेश्वर  महादेव के नाम से जाना जाता है. कोरोना संकट के बाद इस साल बाबा भक्तों को बिना प्रतिबंध के दर्शन देंगे. इसकी तैयारी में मंदिर समिति जुट गई है.

सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं में ओम की आकृति
ओंकारेश्वर तीर्थ क्षेत्र पवित्र नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ है. सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं में यहां पर ओम आकार की आकृति बनती है और इसी ओम के बीचो बीच भगवान भोलेनाथ का निराकार शिवलिंग स्थापित है. पवित्र नर्मदा नदी में स्नान करने के बाद श्रद्धालु इसी जल से भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं. शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि नर्मदा नदी भगवान भोलेनाथ की नासिका से निकली है, इसलिए उनके दर्शन मात्र से पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है.

राजा मांधाता की तपस्या से खुश भगवान ने दिया था वर
पुराणों के अनुसार, ॐ या ओम आकार के पर्वत पर विराजमान ओमकारेश्वर महादेव स्वयंभू है. ऐसा माना जाता है कि राजा मांधाता की तपस्या से खुश होकर भोलेनाथ ने उन्हें आशीर्वाद स्वरुप दो वर मांगने को कहा था. तब राजा मांधाता ने कहा कि आप इसी पर्वत पर विराजमान हो जाइए और आपके साथ मेरा नाम भी हमेशा के लिए जुड़ जाए. तभी से भगवान भोलेनाथ ओंकार पर्वत के गर्भ में स्वयं निराकार स्थापित हुए और इस क्षेत्र का नाम मांधाता पड़ गया.

शयन आरती के बाद बिछाई जाती है चौपड़
ओमकारेश्वर मंदिर में तीन समय की आरती होती है. सुबह 5:00 बजे, दोपहर 12:00 बजे और रात्रि में 8:30 बजे. रात्रि आरती को शयन आरती कहा जाता है. इस आरती के बाद मंदिर के गर्भगृह में चांदी का झूला लगाया जाता है और इस झूले पर आज भी चौपड़ बिछाई जाती है. ऐसा माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती रात्रि के समय इस मंदिर में आते हैं और चौपड़ खेलते हैं. बरसों से यह परंपरा आज भी निभाई जा रही है.

दोनों घाट पर विराजित हैं भोलेनाथ
यहां नर्मदा नदी के दोनों किनारों पर भोलेनाथ स्थापित है. एक तरफ ओम्कारेश्वर महादेव है तो दूसरी तरफ ममलेश्वर महादेव है. ममलेश्वर मंदिर में पार्थिव शिवलिंग की पूजा का विशेष महत्व है. ऐसा माना जाता है कि पवित्र नदी की मिट्टी से बने छोटे-छोटे शिवलिंग की पूजा करने से भक्तों को भोलेनाथ का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है.

ममलेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने की थी. आज भी मंदिर में की व्यवस्था अहिल्याबाई होल्कर ट्रस्ट देखता है. अहिल्याबाई ने ही यहां मिट्टी के शिवलिंग की पूजा करने की परंपारा शुरू की थी. बताया जता है उन्हें यह परंपरा शुरू करने की प्रेरणा रामेश्वर में भगवान राम के द्वारा मिट्टी से बनाए गए पार्थिव शिवलिंग से मिली थी.

सावन में हर सोमवार निकलती है शाही सवारी
सावन के महीने में प्रति सोमवार भगवान ओमकारेश्वर और ममलेश्वर की शाही सवारी निकलती है और यह सवारी नगर भ्रमण करती है. दोनों ही मंदिरों से भगवान के भक्त भगवान का श्रृंगार करके नाव के द्वारा नर्मदा नदी के बीच मिलन करवाते हैं. फिर दोनों ही सवारियां नगर भ्रमण पर निकलती है. ढोल धमाकों अबीर गुलाल के बीच नाचते गाते यह शाही सवारी नगर भ्रमण करने के बाद अपने अपने मंदिरों में पहुंचाई जाती है.

कैसे पहुंचे ओंकारेश्वर
ओंकारेश्वर रेल और बस के द्वारा पहुंचा जा सकता है. रेल सेवा खंडवा और इंदौर तक है. यहां से बस के द्वारा ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग तक पहुंचा जाता है. यहां के लिए पहले मीटर गेज रेल सेवा थी, लेकिन ब्रॉडगेज में कन्वर्ट होने की वजह से फिलहाल यह रेल सेवा बंद है. खंडवा और इंदौर के बीच में ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग है. दोनों ही तरफ से यहां की दूरी 80 किलोमीटर है. यहां रहने के लिए कई होटल और धर्मशालाएं हैं.

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