MP में बाल अधिकार जागृति अभियान में सोशल मीडिया बनेगा बड़ा हथियार

बाल अधिकारों का साझेदार युवाओं को बनाने की मुहिम शुरू की गई है. इसी के तहत राजधानी से लगभग 60 किलोमीटर दूर सीहोर जिले के जमुइया टैक गांव में 21 और 22 अक्टूबर को 'यूथ फॉर चिल्ड्रन' शिविर का आयोजन किया गया.

MP में बाल अधिकार जागृति अभियान में सोशल मीडिया बनेगा बड़ा हथियार
फाइल फोटो

भोपाल: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में बाल अधिकारों ( Child Rights) के हनन की घटनाएं सामने आती रहती हैं, और इन्हें रोकने के लिए सोशल मीडिया (Social Media) को एक कारगर हथियार के तौर पर उपयोग में लाने की कोशिशें हो रही हैं. इस कोशिश में युवा वर्ग को जोड़कर बाल अधिकारों के प्रति समाज में जागरूकता लाने के भी प्रयास शुरू हो रहे हैं.

राज्य में बालश्रम, बाल विवाह, पोषण आज भी समस्या बना हुआ है. बच्चों को अपने हक से दूर रहना पड़ रहा है. यह सब हो रहा है समाज के बड़े वर्ग को अधिकारों की जानकारी न होने के कारण. बाल अधिकारों का साझेदार युवाओं को बनाने की मुहिम शुरू की गई है. इसी के तहत राजधानी से लगभग 60 किलोमीटर दूर सीहोर जिले के जमुइया टैक गांव में 21 और 22 अक्टूबर को 'यूथ फॉर चिल्ड्रन' शिविर का आयोजन किया गया. इस शिविर का मकसद युवाओं को बाल अधिकार जागरूकता मुहिम का हिस्सा बनाना था.

बच्चों के लिए काम करने वाले संस्था यूनिसेफ के राज्य प्रमुख माइकल जुमा का मानना है, "बाल अधिकारों के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर के 30 वर्षों के दौरान हमने बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन अभी भी बाल विवाह, बच्चों के खिलाफ हिंसा और पोषण के खिलाफ लड़ाई जैसी चुनौतियां शेष हैं. लिहाजा अब यूथ फॉर चिल्ड्रन की रणनीति पर काम किया जा रहा है, क्योंकि बाल अधिकारों को आगे बढ़ाने में युवा महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है."

बाल अधिकारों को जागरूक करने के लिए युवा सोशल मीडिया का किस तरह उपयोग करें, जिससे बाल अधिकारों का संदेश जन-जन तक पहुंचे और इसके प्रति जागृति आए. इस पर यूथ फॉर चिल्ड्रन शिविर में मंथन किया गया और एक कार्यक्रम भी बनाया गया है. तय किया गया है कि 14 से 20 नवंबर तक आयोजित होने वाले बाल अधिकार सप्ताह के दौरान सोशल मीडिया पर वीडियो कहानियां, ब्लॉग, फोटो आदि का उपयोग किया जाएगा, जिसमें बाल अधिकारों और बाल अधिकार सम्मेलन (सीआरसी) के 30 साल, बाल विवाह, पोषण, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मुद्दे पर बात की जाएगी.

यूनिसेफ के संचार विशेषज्ञ अनिल गुलाटी का मानना है, "सभी बच्चों को अपने अधिकारों को जानना जरूरी है. ऐसा होने पर ही वे अपने भविष्य के बारे में फैसला करने के साथ सरकारी योजनाओं का लाभ हासिल कर सकते हैं. इससे युवाओं के जुड़ने से समाज में जागृति लाने का प्रयास ज्यादा तेज हो सकता है, इसीलिए सोशल मीडिया के सहारे युवाओं के जरिए बाल अधिकारों का जागरूकता अभियान चलाने जा रहे हैं. ऐसा करके ही बाल अधिकार, उनके प्रावधान, भागीदारी और अधिकारों का संरक्षण किया जा सकता है."

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गैर सरकारी संगठन स्काई सोशल की सृष्टि प्रगट ने लैंगिंक चुनौतियों की चर्चा करते हुए बताया, "वर्तमान समय में बच्चों और उनके अधिकारों को पहचानना महत्वपूर्ण है. इसलिए जरूरी है कि समाज के युवाओं की इसमें भागीदारी बढ़े."

यूनिसेफ के पोषण विशेषज्ञ डॉ़ समीर पवार ने बताया कि बच्चे के जीवन में पहले 1000 दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं.

बाल अधिकारों के प्रति जागृति लाने के लिए सोशल मीडिया की मुहिम से जिन युवाओं को जोड़ा गया है, उन्हें विशेष नवजात देखभाल इकाई और पोषण पुनर्वास इकाई का दौरा कराया गया, ताकि वे बच्चों की देखभाल के प्रयासों को जान सकें. इतना ही नहीं उन्हें बाल अधिकारों के विभिन्न हितधारकों जैसे आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा, शिक्षक, सरपंच, ग्रामीणों के साथ बच्चों से भी उनकी समस्याओं पर संवाद कराया गया. इस दौरान लिंग, बाल स्वास्थ्य, पोषण, स्कूली शिक्षा आदि पर खुलकर संवाद किया गया.