लखपति बन रहे हैं ओडिशा के 68 गांवों के आदिवासी किसान, अपना रहे ये खास तरीका

हरिचंदनपुर प्रखंड के 68 गांवों में 6,500 परिवारों में से करीब 1,000 परिवार प्रति वर्ष न्यूनतम एक लाख रुपये कमा रहे हैं

लखपति बन रहे हैं ओडिशा के 68 गांवों के आदिवासी किसान, अपना रहे ये खास तरीका
फोटो साभारः DNA

क्योंझर (ओडिशा): ओडिशा के क्योंझर जिले में भले ही अब तक पक्की सड़क या बिजली नहीं पहुंच पायी है लेकिन बूंद-बूंद सिंचाई को अपनाकर यहां के छोटे एवं सीमांत किसान लखपति बन रहे हैं .  इस सिंचाई प्रणाली से स्थानीय किसान पूरे साल भर फसल उगा पाते हैं जिनसे उनकी आमदनी बढ़ी है. हरिचंदनपुर प्रखंड के 68 गांवों के आदिवासी किसान अब बूंद-बूंद सिंचाई का लाभ उठा रहे हैं और नकदी फसल उगा रहे हैं. इससे पहले ये किसान पूरी तरह से मानसून पर निर्भर थे और साल में बमुश्किल एक फसल उगा पाते थे.

सिंचाई की यह प्रणाली नियंत्रित तरीका है. इसमें पौधों की जड़ों तक धीरे-धीरे पानी पहुंचाया जाता है .  इससे पानी के साथ ही उर्वरक की भी बचत होती है. आमतौर पर स्थानीय हाटों में कम कीमत पर फसल बेचने वाले अधिकांश आदिवासी किसान अब नजदीकी मंडियों में अधिक कीमत पा रहे हैं.

इससे उन्हें आर्थिक तौर पर समृद्ध होने में मदद मिल रही है. टंगरियापाल गांव के बाबला हसदा ने पीटीआई-भाषा से बताया, "मेरे पास चार एकड़ जमीन है. मैंने आधे एकड़ से भी कम जमीन में बूंद-बूंद सिंचाई की मदद से मिर्च की खेती और शेष जमीन में पारंपरिक तरीके से धान की खेती की. मिर्च की फसल से मुझे बेहतर लाभ मिल रहा है."

हसदा अब तक 3,000 रुपये प्रति क्विंटल की औसत दर से करीब 35 क्विंटल मिर्च बेच चुके हैं. इससे उन्हें करीब 1,05,000 रुपये मिले हैं. उन्होंने कहा, "मैंने फसल की लागत, कर्ज की किस्तें और अन्य खर्चों के बाद इस कमाई में से 25,000 रुपये की बचत की है. मेरे पास मिर्च की खेती से नकदी आयी है.’’

हसदा के लिए पहली बार नजदीकी मंडी जाना चौंकाने वाला अनुभव साबित हुआ. उन्हें मंडी जाकर कृषि-उपज को एक डिजिटल तौल मशीन पर सटीक रूप से तौले जाने और तुरंत अच्छी कीमत पर बेचे जाने का अनुभव मिला. उन्होंने कहा, "पहले हम अधिक फसल उगाने से डरते थे क्योंकि हमें मंडी का पता नहीं होता था.

लगभग 11 किसानों ने पहली बार तीन एकड़ भूमि में बूंद-बूंद सिंचाई का इस्तेमाल करते हुए मिर्च उगाई है. हमें इसकी बेहतर कीमत मिल रही है. " टंगरियापाल ग्राम संघ की सचिव सुमित्रा कुडू के अनुसार, टाटा ट्रस्ट के संगठन सीआईएनआई के प्रशिक्षण और समर्थन के कारण गाँव में युगांतकारी परिवर्तन संभव हुआ है.

प्रशिक्षण की वजह से गांव के कोटगति टोले (53 घरों को मिलाकर) में 11 किसानों ने तीन एकड़ खेत में बूंद-बूंद सिंचाई अपनाया. कुडू ने कहा कि एक एकड़ के लिए बूंद-बूंद सिंचाई की लागत एक लाख रुपये थी, जिसमें से सीआईएनआई ने 50 प्रतिशत पैसा दिया, जबकि बाकी किसानों ने खर्च किया.

गादौन और निपनिया गांव के किसान भी बूंद-बूंद सिंचाई का फायदा उठा रहे हैं. सीआई नआई के प्रवक्ता गणेश नीलम ने कहा, "हमने प्रत्येक परिवार में एक महिला को सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित किया क्योंकि हमने महसूस किया कि वे घर और खेत दोनों जगहों पर सबसे ज्यादा काम करती हैं.

एक बार जब महिलाएं प्रशिक्षित हो जायें, तो वे अपने परिवार में बदलाव लाएंगी. "उन्होंने कहा कि चूंकि 68 गांवों में बिजली नहीं थी, इसलिए बूंद-बूंद सिंचाई मशीन को चलाने के लिए डीजल और सौर ऊर्जा आधारित प्रणाली का इस्तेमाल किया गया और इसके लिए आंशिक धन भी मुहैया कराया गया.

नीलम ने कहा, "हरिचंदनपुर प्रखंड के 68 गांवों में 6,500 परिवारों में से करीब 1,000 परिवार प्रति वर्ष न्यूनतम एक लाख रुपये कमा रहे हैं." इससे पहले, इन किसानों की औसत आय सालाना 35,000-40,000 रुपये थी. 

इनपुट भाषा से भी