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35 साल से मुकदमे की सुनवाई का सामना करना अपने आप में सजा है: सुप्रीम कोर्ट

SC ने एक मामले में अभियोजन के गवाह से पूछताछ की अनुमति देने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखने संबंधी कलकत्ता HC के निर्णय के खिलाफ याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की.

 (फाइल फोटो)
(फाइल फोटो)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने 1983 के एक मामले में निचली अदालत में गवाह पेश करने में विफल रहने पर केन्द्रीय जांच ब्यूरो को शुक्रवार को आड़े हाथ लिया और कहा कि किसी व्यक्ति के लिए तीन दशक से भी अधिक समय से मुकदमे का सामना करना अपने आप में एक सजा है.

शीर्ष अदालत ने एक मामले में अभियोजन के गवाह से पूछताछ की अनुमति देने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखने संबंधी कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की.  न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति एस अब्दुल ने कहा,‘भारत में एक व्यक्ति के लिए 35 साल तक मुकदमे का सामना करना अपने आप में सजा है.’

पीठ ने जांच एजेन्सी के वकील से कहा, ‘यह 1983 का मामला है और हम अब 2019 में हैं. यह 35 साल पुराना मामला है. आप (सीबीआई) अदालत में यह गवाह पेश नहीं कर सके. आप सीबीआई हैं.’ जांच एजेन्सी के वकील ने कहा कि अभियोजन का यह गवाह हस्तलिपि विशेषज्ञ है और इस मामले में महत्वपूर्ण है.

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धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश, फर्जी दस्तावेज का उपयोग करने जैसे आरोपों में अगस्त 1983 में भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों तथा भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत यह मामला दर्ज किया गया था.

कोलकाता की निचली अदालत ने दिसंबर, 2014 मे हस्तलिपि विशेषज्ञ की अभियोजन के गवाह के रूप में पूछताछ की अनुमति दी थी जिसे आरोपी ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी. 

(इनपुट - भाषा)

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