बुजुर्ग हो रहे किरोड़ीलाल मीणा की बढ़ रही युवा ताकत, Rajasthan के सबसे सक्रिय नेताओं में शामिल

आमागढ़ प्रकरण को बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद किरोड़ीलाल मीणा (MP Kirori Lal Meena) ने जिस तरीके से संभाला है ये राजस्थान की सियासत को कई तरह के संदेश देता है. 

बुजुर्ग हो रहे किरोड़ीलाल मीणा की बढ़ रही युवा ताकत, Rajasthan के सबसे सक्रिय नेताओं में शामिल
मीणा समाज के सम्मान को कायम रखा.

Jaipur : आमागढ़ प्रकरण को बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद किरोड़ीलाल मीणा (MP Kirori Lal Meena) ने जिस तरीके से संभाला है ये राजस्थान की सियासत को कई तरह के संदेश देता है. राजस्थान असीम सियासी संभावनाओं से भरा हुआ प्रदेश है. यहां बीजेपी और कांग्रेस के अलावा कोई पार्टी खुद को स्थापित नहीं कर पाई है. राजपूत, जाट, गुर्जर, मीणा, आदिवासी, भील और मेघवाल जातियों का यहां बड़ा वोटबैंक है. इन जातियों को सीधा प्रतिनिधित्व देने वाली न तो पार्टियां है और न ही प्रदेश स्तर पर स्थापित नेता है.

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आमागढ़ प्रकरण में किरोड़ीलाल मीणा की कामयाबी को इन 5 बिंदुओं में समझा जा सकता है.

1. हिंदू एकता कायम रखने में कामयाब रहे
2. मीणा समाज के सम्मान को कायम रखा
3. मीणा समाज के निर्विवादित नेता के रूप में स्थापित
4. राजनीति में संघर्ष के मायने समझाए
5. नेतृत्व में युवाओं का भरोसा

हिंदू एकता कायम रखने में कामयाब
रामकेश मीणा (Ramkesh Meena) ने जब भगवा ध्वज फाड़कर मीणाओं को बाकी हिंदुओं से अलग करने जैसी कोशिशें की. जिस वक्त ये घटना हुई उस वक्त किरोड़ीलाल मीणा दिल्ली में थे. इस वक्त संसद का मानसून सत्र चल रहा है, लेकिन संघ और किरोड़ीलाल मीणा भली भांति जानते थे कि अगर मीणा और अन्य जातियों के बीच टकराव हुआ तो नुकसान दोनों का होगा. उन्होंने अपने भाषणों में हिंदू धर्म की अनेकताओं को समझाया और अनेकता में एकता का संदेश देते हुए सबसे एकजुट रहने का आश्वासन किया. उनकी एक तस्वीर काफी वायरल हुई जिसमें लिखा संदेश किरोड़ीलाल मीणा की आस्था और हिंदू एकता में उनके विश्वास को बयां कर रही थी. उनके हाथ में लिए पोस्टर पर लिखा था. हिंदू तन मन हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय.

मीणा समाज के सम्मान को कायम रखा
हिंदू एकता का संदेश देने और मीणा समाज का दूसरे समाजों के साथ तनाव खत्म करने के बाद किरोड़ीलाल मीणा की अगली रणनीति मीणा समाज के सम्मान को भी बनाए रखने की थी. वो जानते थे कि ये मुद्दा समाज की भावनाओं से जुड़ा है. लिहाजा भगवा ध्वज के सम्मान को बनाए रखते हुए उन्होंने मीन भगवान का झंडा फहराने का ऐलान किया. ये किरोड़ीलाल मीणा के आह्वान की ही ताकत थी कि मीणा समाज ने भगवा ध्वज के खिलाफ बयानबाजी बंद कर दी और मीणा समाज के सफेद ध्वज का बाकी जातियों ने विरोध नहीं किया और एक सुर में सबने खुद को हिंदू बताना शुरू कर दिया. 70 साल की उम्र में 25 साल के युवाओं जैसा संघर्ष करते हुए उन्होंने किले में प्रवेश किया और मीन भगवान का झंडा फहराया.

मीणा समाज के निर्विवादित नेता के रूप में स्थापित
राजस्थान की राजनीति में पिछले लंबे समय से बीजेपी और कांग्रेस दोनों जातियों में कई नेता किरोड़ीलाल मीणा का विरोध कर खुद को मीणा समाज का सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे. शायद रामकेश मीणा की कोशिश भी उसी रणनीति का हिस्सा थी. इससे पहले कांग्रेस ने रमेश मीणा को स्थापित करने की कोशिश की. इससे पहले रमेश मीणा, ओपी हुड़ला जैसे नेता भी मीणा समाज का खुद को नेता बनाने के लिए कई तरीके की कोशिशें कर चुके है. बीजेपी के भीतर भी कई नेता खुद को समाज का नेता बनाने की कोशिशें करते रहते हैं, लेकिन किरोड़ीलाल मीणा ने एक बार फिर ये साबित कर दिया कि समाज के वही सर्वस्वीकार्य नेता है. इसी का ये परिणाम था कि रामकेश मीणा को भी आखिरकार किरोड़ीलाल मीणा के समर्थन में बयान जारी करना पड़ा.

राजनीति में संघर्ष के मायने समझाए
पिछले 6 महीने में पुजारी हत्याकांड से लेकर आमागढ़ किला प्रकरण तक ऐसे कई मौके आए हैं जब किरोड़ीलाल मीणा सड़क पर संघर्ष करते नजर आए. युवाओं का नेतृत्व करते नजर आए. 70 साल की उम्र में शायद ही कोई उनके जितनी सक्रीयता से सड़क पर सघर्ष कर पाता है. यही वजह है कि पुलिस प्रशासन भी उनको हल्के में नहीं लेता है. वो कई बार इंटेलीजेंस एजेंसियों से लेकर प्रशासन की रणनीति को धत्ता बता चुके हैं. इस बार भी बारिश के मौसम में कंटीली झाड़ियों से अटे पहाड़ी इलाके में रात के अंधेर में वो जिस तरह से आमागढ़ की पहाड़ी तक पहुंचे. जब वो पगाड़ी की चढ़ाई कर रहे थे तब तेज बारिश भी हो रही थी. ये संघर्ष उन नेताओं के लिए भी संदेश है जो केवल सोशल मीडिया पर बयानबाजी के सहारे सियासत चलाना चाहते हैं. ये संदेश उन नेताओं के लिए भी है जो किसी भी सरकार में मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाना चाहते हैं. ये संघर्ष संदेश है उन युवाओं के लिए भी जो राजनीति के रास्ते समाज सेवा करना चाहते हैं.

नेतृत्व में युवाओं का भरोसा
आज के दौर में युवा जितना जागरूक हुआ है. वैसे दौर में सबसे मुश्किल होता है. किसी भी नेता का जनता में भरोसा कायम करना. विशेष तौर से युवाओं को भरोसे में लेना सबसे मुश्किल होता है. किरोड़ी लाल मीणा ने आमागढ़ प्रकरण को जिस तरीके से संभाला है. इसकी कामयाबी का सबसे बड़ा आधार यही था कि जनता का उनके नेतृत्व में भरोसा, जिसके परिणामस्वरूप सफलता भी मिली और शांति भी बनी रही. उनके मैदान में आने के बाद ही दो गुटों में बंटा समाज एकजुट नजर आया और धरना प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों युवाओं ने शांति बनाए रखी. कहीं कोई हिंसक घटना नहीं हुई.

आज के दौर में दलित, आदिवासी, हिंदू, मुस्लिम की राजनीति करने वाले नेता टकराव के रास्ते खुद को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. दलित नेता उच्च जातियों के खिलाफ बयानबाजी करते हैं. तो हिंदू और मुस्लिम धर्म के नेता धार्मिक बयानबाजी करते हैं. एक वर्ग को दूसरे वर्ग के खिलाफ भड़काकर खुद को नेता के रूप में स्थापित किया जाता है, लेकिन ऐसे लोगों के लिए भी किरोड़ीलाल मीणा का नेतृत्व उदाहरण पेश करता है. जिन्होंने समाज को दो गुटों में बांटने की बजाय जोड़ने की सियासत की. जिन्होंने हिंदू धर्म की एकजुटता का संदेश दिया और मीणा समाज की भावनाओं के अनुरूप काम कर मीणा समाज को भी एकजुट किया, लेकिन इस एकजुटता में किसी दूसरे के खिलाफ बयानबाजी नहीं थी.

राजस्थान में मीणा वोटबैंक
राजस्थान में मीणा समाज अनुसूचित जनजाति वर्ग में आता है. राजस्थान में अनुसूचित जनजाति की आबादी करीब 12 प्रतिशत है, जिसमें से करीब 8 प्रतिशत मीणा जाति की आबादी है और 4 फीसदी भील और अन्य जातियां है. विधानसभा सीटों की बात करें तो 50 से ज्यादा सीटों पर मीणा वोटर प्रभावी रहता है. जिसमें 35 सीटों पर सीधे तौर पर मीणा वोटर जीत हार तय करते हैं तो वहीं, 25 के लगभग सीटों पर मीणा वोटर जीत-हार का गणित बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं.

राजस्थान में विधानसभा की 9 सीटें ऐसी हैं जहां पार्टी कोई भी हो, लेकिन उम्मीदवार मीणा समाज से ही होता है. मतलब मुकाबला मीणा बनाम मीणा का होता है. ये विधानसभा सीटें लालसोट, जमवारामगढ़, प्रतापगढ़, बामनवास, सलूंबर, टोडाभीम, सपोटरा, बस्सी और राजगढ़ है. जहां बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों के प्रत्याशी मीणा समाज के होते हैं.

मीणा समाज विशेष कर पूर्वी राजस्थान में दबदबा रखता है. जिसमें दौसा, भरतपुर, करौली, सवाईमाधोपुर, अलवर और धौलपुर जिले शामिल हैं. इसके अलावा जयपुर ग्रामीण की कई विधानसभा सीटों और कोटा संभाग की कई सीटों पर भी मीणा वोटर प्रभावी भूमिका में होता है. कुल मिलाकर मीणा वोटर को नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के सियासी स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं रहता. इसी वोटबैंक का नेता बनने की होड़ में जसकौर मीणा ने विवादित बयान दिया था.

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