रूह कंपा देते हैं Lockdown 2020 के ये दर्दनाक वाकये, दिल कहेगा- दोबारा न देख सकेंगे!

सिर पर गठरी और गोद में दो-दो बच्चों को लेकर चली जा रही औरतों की आंखों से आंसुओं के झरने ऐसे बह रहे थे कि राह चलते कोई पूछ लेता- कुछ मदद चाहिए, तो वहीं बैठकर फूट-फूटकर लोग रोने लगती. 

रूह कंपा देते हैं Lockdown 2020 के ये दर्दनाक वाकये, दिल कहेगा- दोबारा न देख सकेंगे!
लॉकडाउन हुआ तो हुआ पर लोगों की हिम्मत को नहीं तोड़ सका.

Jaipur: हाथ तो ऐसे कांप रहे थे कि मानो कोई 80 साल का बुजुर्ग हो...पैरों की लड़खड़ाती चाल कोई देखता तो शायद शराबी समझता पर नज़र जैसे ही उसके खोखले शरीर पर जाती, लोगों की आंखों से खुद-ब-खुद आंसुओं के झरने बहने लगते. बहुत उम्रदराज नहीं था वो, पर 10 दिन की भूख ने मानो उसके मांस को ही खा लिया था.

भूख-प्यास की तड़प ने उसकी हंसी भले ही छीन ली थी लेकिन जान बचाने की जद्दोजहद उसमें जिंदा थी. दुबले-पतले शरीर और कांपते हाथों के साथ उसकी उम्र केवल 40 की ही थी पर बेरहम वक्त ने समय से पहले उसे बेघर और बूढ़ा कर दिया था. मई की तपती दुपहरी में धीरे-धीरे जब वो कदम गांव की तरफ बढ़ा रहा था तो हर कदम के बाद शायद उसे उसका घर दिख रहा था. उसकी हालत देख मदद के लिए आए लोगों की भी आंखें नम हो गई थीं.

covid lockdown sad memories

ये कहानी सिर्फ एक शख्स की नहीं थी, ये उन तमाम हजारों प्रवासियों की थी, जो घर की जिम्मेदारी उठाने के लिए अपने गांव को छोड़कर बड़े शहरों में कमाने जाते हैं. साल 2020 में जब कोरोना की वजह से लॉकडाउन हुआ तो किसी ने नहीं सोचा था कि देश में आपातकालीन जैसे हालात बन जाएंगे.

15 दिन के बाद जब धीरे-धीरे लॉकडाउन बढ़ने लगा तो बेचारे गरीब मजदूरों और प्रवासियों के पास खाने को नहीं बचा. कमाई तो दूर, सब खत्म होने के बाद जीने की हर आस भी छूटने लगी थी. सरकार ने तो लॉकडाउन लगाकर अपनी फर्ज अदायगी कर दी थी पर जरा उनसे पूछिए, जिनके घर में बच्चे केवल पानी पीकर सोने थे. उनसे पूछिए, जिनके अपनों ने इलाज के पैसे न होते हुए अपनी आंखों के सामने उनका साथ छोड़कर जाते हुए देखा है.

मई 2020 में देश की सड़कों पर गरीब-मजदूर ऐसे अपने सामानों के साथ दिख रहे थे कि मानों कि बंटवारे के समय का किसी ने रिपीट टेलीकास्ट कर दिया हो. चारों ओर रोते-भागते लोग नज़र आते थे. किसी को कुछ खाने को मिल जाता, तो देने वाले को भगवान ही मान लेता. सभी तरह के वाहनों के आवागमन पर रोक लगी थी, ऐसे में जो जैसे भी हालत में था, एक-दो झोला और कुछ कपड़े रखकर पैदल ही गांव की ओर निकल पड़ता.

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मई की चिलचिलाती भरी दुपहरी में सब भागे चले जा रहे थे. सिर से लेकर पांव तक पसीने से तलपथ थे. सिर पर छांव और पैर में चप्पल तक नहीं थी तो कोई बात नहीं. घर की तरफ जाने वाला रास्ता मानों कह रहा था- बड़े बेरहम होते हैं ये शहरवाले. तुमने इनके लिए गगनचुंबियां खड़ी कर दी पर जब महामारी आई, तो लॉकडाउन लगाकर सब अपने आलीशान बंगलों में दुबक गए.

सिर पर गठरी और गोद में दो-दो बच्चों को लेकर चली जा रही औरतों की आंखों से आंसुओं के झरने ऐसे बह रहे थे कि राह चलते कोई पूछ लेता- कुछ मदद चाहिए, तो वहीं बैठकर फूट-फूटकर लोग रोने लगती. नन्हें-नन्हें मासूमों को माएं जबरन ठर-ठराकर खींचे लिए जा रही थी. तो कोई पारले जी के एक-एक बिस्कुट का लालच देकर उन मासूम छाले वाले कदमों को बस घर की ओर लिए जा रही थीं.

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कलेजा तो तब फट गया जब लोगों ने एक 12-13 के श्रवण जैसे बेटे को कमजोर मां-बाप को ठेले से खींचते देखा. न जाने कितने ही किलोमीटर से वह उनको उस ठेले पर बिठाकर आखिरकार घर ले गया. लोगों ने घर बैठकर वीडियो देखकर तारीफें तो जमकर कीं पर दो वक्त की रोटी के लिए पैसे दे देता, ये शायद ही किसी से हो सका था.

लॉकडाउन था कोई दो-चार दिन का सरकारी अवकाश नहीं, जैसे-जैसे लॉकडाउन बढ़ रहा था, प्रवासियों और गरीबों के दुख के दिन बढ़ रहे थे. कोई अपने 3-4 साल के बच्चों को साइकिल की केरियल या बाल्टी-झोलों में बिठाकर नंगे पांव चले जा रहा था तो कोई अपने ट्रॉली बैग पर मासूमों को खींचे लिए जा रहा था. कहीं दो पल बैठकर आराम करने लगते तो पुलिसवाले आ धमकते. कहीं रुकने नहीं देते. बेचारा मजदूर ऊपर की ओर देखता और कहता - वाह ऊपरवाले, इस बार फुरसत में गम के बादलों को भेजा है. रोजी-रोटी छीन ली...सिर से छत छीन ली...खाने को निवाला तक नहीं मिल रहा.

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लॉकडाउन हुआ तो हुआ पर लोगों की हिम्मत को नहीं तोड़ सका. लोग मुंबई, हैदराबाद, बैंग्लौर, राजस्थान, पुणे, दिल्ली से सैकड़ों-हजारों किलोमीटर का सफर तय करके अपने घरों की ओर कदम बढ़ाते रहे. कहीं से अगर किसी बस या ट्रक की मदद मिल जाती तो लोग जगह पाने के चक्कर में एक-दूसरे के ऊपर पैर रखने से तक न कतराते. किसी को घर के सिवा कुछ सूझ ही नहीं रहा था. उनका बस यहा कहना था कि यहां भूखों मरने से अच्छा है, गांव में खेती-बाड़ी कर बच्चों को दो वक्त की रोटी तो खिला सकेंगे.

एक शरीर और दो-दो जान
कहते हैं कि जब ऊपर वाला दर्द देता है, तो उसे झेलने की हिम्मत भी देता है. लॉकडाउन 2020 में न जानें कितनी ही ऐसी ही तस्वीरें सामने आईं, जिसने लोगों की आंखें भिगो दी. दो शरीर और एक जान, तो आपने सुना ही होगा पर लॉकडाउन में लोगों ने एक शरीर में दो-दो जानों को चलते देखा. दरअसल, लॉकडाउन में कई गर्भवती महिलाएं भी फंस गई थीं. कोई साधन न मिल पाने के चलते उन्होंने भी अपने अंदर पल रहे बच्चे के साथ सैकड़ो किलोमीटर की दूरियां तय कीं. ऐसे हाल में जिन्होंने भी देखा, उनके मुंह से एक ही बात निकली- मां, तो मां है.

दर्द जब कम नहीं हुआ, बढ़ता ही गया
रोजी-रोटी और सिर से छत छिनने के बाद जब प्रवासी मजदूर अपने-अपने राज्य की सीमा पर पहुंचे तो खुशी से उनकी आंखें भीग गई. उन्हें लगा कि मानो बस कुछ कदम और, आ गए अपने गांव. अब हम भूखे नहीं मरेंगे ये सोचना ही था कि अचानक सबको एक जगह पर बिठाकर उनपर बड़े-बड़े मशीनों से सैनिटाइजर का हवाला देकर तेज़ धार का छिड़काव किया गया. बेचारे मजदूरों को खुद नहीं समझ आ रहा कि वे इंसान हैं या जानवर? उनका कहना था कि पहली बार लगा कि कोरोना सिर्फ गरीब-मजदूरों से ही फैल रहा है क्या?

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खैर, एक बार फिर से देश में कोरोना महामारी अपने पैर पसारने में लग गई है. कई बड़े शहरों में वीकेंड लॉकडाउन की घोषणा हो चुकी है. बड़ी कंपनियों ने यथासंभव वर्क फ्रॉम होम चालू कर दिया है, तो कई राज्यों के श्मसान घरों के बाहर एक बार फिर कोरोना संक्रमित मृतकों की लंबी लाइनें नज़र आ रही हैं. अस्पतालों में मरीजों के लिए बेड तक कम पड़ने लगे हैं. एंबुलेंस तक नसीब नहीं हो पा रही है. ऐसे में बड़े शहरों के मजदूर एक बार फिर पलायन की कगार पर हैं. कई लोग तो अभी से घर वापसी करने लगे हैं.

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साल 2020 में कोरोना ने जहां लाखों लोगों की ज़िंदगियां छीनी, वहीं लॉकडाउन ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. हजारों किलोमीटर दूर से पैदल आ रहे सैकड़ों लोगों ने दम तोड़ दिया, तो कहीं लॉकडाउन में फंसे होने की वजह से डॉक्टर तक न पहुंच सके. कई लोगों के परिजनों ने पैसों की कमी के चलते दम तोड़ दिया.

ये दिल दहलाने वाले समय को एकबार दोबार फिर वापस आते देखा जा रहा है पर पूरे देश के गरीबों की निगाहें केंद्र और राज्य सरकारों से बस एक ही सवाल करती नज़र आ रही हैं कि 'साल 2020 में जब कोरोना आया तो कहा गया कि महामारी अचानक आई, तो इंतजामात नहीं थे पर इस साल तो हालातों से कोई अनजान नहीं था. सबको पता था कि वैक्सीन भी कामगर नहीं हो सकती, फिर सरकारों ने पहले से कोई व्यवस्था नहीं की? क्यों कोरोना मरीजों के लिए अस्पताल तैयार रखे गए? क्यों एंबुलेंस नहीं मिल पा रही हैं?' गरीब की जान ही सरकार के लिए सस्ती है?