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पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल, पीपल और शालिग्राम की हुई शादी, जमकर नाचें बाराती

दो पीपल का विवाह टोंक के बिहारीनाथ मंदिर व मदनगोपाल मंदिर के भगवान शालिग्राम से पारंपरिक विधि से रचाकर पेड़ों को बचाने का व्रत लिया गया.

पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल, पीपल और शालिग्राम की हुई शादी, जमकर नाचें बाराती
यह अनोखा विवाह चर्चा का विषय बना रहा. (फाइल फोटो)

पुरुषोतम जोशी, टोंक: वन और पर्यावरण में असंतुलन से चिंतित टोंक जिले के पीपलू कस्बे के लोगों ने पीपल और शालिग्राम के विवाह का आयोजन कर पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल की है. बिहारीनाथ मंदिर पीपलू के बाग स्थित दो पीपल का विवाह बिहारीनाथ मंदिर व मदनगोपाल मंदिर के भगवान शालिग्राम से पारंपरिक विधि से रचाकर पेड़ों को बचाने का व्रत लिया गया. यह विवाह हिन्दू रीति रिवाज के मुताबिक हुआ. पूरे जिले में यह अनोखा विवाह चर्चा का विषय बना रहा. 

इस दौरान जहां दुल्हन के रूप में पीपल के दो पेड़ थें. जिनसे विवाह रचाने के लिए शालिगराम महाराज खुद दूल्हा बने. इसके बाद विधि विधान से पंडित चिरंजीलाल दाधीच, महेंद्र दाधीच, रवि दाधीच ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विवाह की रस्में अदा करवाई. ठाकुर जी के तोरण की रस्म के साथ अग्निसाक्षी में विद्वान पंडितों की मौजूदगी में पीपल संग सात फेरे खाए. 

विवाह को लेकर निकाली वरयात्रा  
पाणिग्रहण की रस्म से पहले कस्बे में पीपल विवाह को लेकर बिहारीनाथ, मदनगोपाल महाराज की वरयात्रा (निकासी) बैंड बाजों के साथ निकाली गई. बारात में भगवान शालिगराम पालकी में विराजमान थे, जिनका कई स्थानों पर श्रद्धालुओं ने तिलक आरती तथा पुष्पवर्षा कर स्वागत किया. बैंडबाजे के साथ निकली निकासी में महिला, पुरुष, बच्चें नाचते गाते हुए चले, तो युवा उत्साह उमंग में सराबोर हो आतिशबाजी करते हुए चले. बारातियों को जगह-जगह ग्राम वासियों ने शर्बत, नाश्ते देते हुए अतिथि सत्कार किया. श्रीचारभुजानाथ मंदिर में दोनों मंदिरों के ठाकुर जी की बरात पहुंचने पर श्रीजी मंदिर महंत गोविंद नारायण पाराशर ने बारात का स्वागत करते हुए ठाकुर जी की विधि विधान से आरती की.

पीपल में देवताओं का वास
मान्यता है कि पीपल का वृक्ष ब्रह्मा विष्णु महेश के वास के रूप में जाना जाता है. पीपल में पितरों का वास माना गया है. इसमें सब तीर्थों का निवास भी होता है. इसीलिए मुंडन आदि संस्कार पीपल के पेड़ के नीचे करवाने का प्रचलन है. पीपल के वृक्ष की पूजा की जाती है. हिंदू पीपल के वृक्ष को बहुत शुभ और वरदायक मानते हैं.
पीपल की जड़ में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में भगवान हरि और फलों में सब देवताओं से युक्त अच्युत सदा निवास करते हैं. यह वृक्ष मूर्तिमान श्रीविष्णु स्वरूप है. महात्मा पुरुष इस वृक्ष के पुण्यमय मूल की सेवा करते हैं. इसका गुणों से युक्त और कामनादायक आश्रय मनुष्यों के हजारों पापों का नाश करने वाला है. पद्मपुराण के अनुसार पीपल को प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा करने से आयु लंबी होती है. जो व्यक्ति इस वृक्ष को पानी देता है. वह सभी पापों से छुटकारा पाकर स्वर्ग को जाता है.

 
वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्व
आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसे एक अनूठा वृक्ष भी कहा है जो 24 घंटे ऑक्सीजन देता है. शायद इसलिए इस वृक्ष को देव वृक्ष का दर्जा दिया जाता है. लोगों की मान्यता है कि पीपल की निरंतर पूजा अर्चना और परिक्रमा करके जल चढ़ाते रहने से पुण्य मिलता है. अदृश्य आत्माएं तृप्त होकर सहायक बन जाती है. यदि किसी की कोई कामना है तो उसकी पूर्ति के लिए पीपल के तने के चारों ओर कच्चा सूत लपेटने की भी परंपरा है. पीपल की जड़ में शनिवार को जल चढ़ाने व दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है, वहीं शनि की साढेसाती से छुटकारा मिलता है तो बृहस्पति मजबूत होता है.