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राजस्थान की लोकसभा सीटों पर सरकारी कर्मचारियों के लगभग 35 हजार वोट हुए खारिज

पढ़े-लिखे सर्विस वोटरों के भी करीब राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों पर 35 हजार 120 वोट विभिन्न तकनीकी खामियों की वजह से रिजेक्ट करने पड़े. 

राजस्थान की लोकसभा सीटों पर सरकारी कर्मचारियों के लगभग 35 हजार वोट हुए खारिज
तकनीकी गलतियां की वजह से उनका मत निरस्त करना पड़ा.

जयपुर: देश में आम चुनाव खत्म हो चुके है. मतदाताओं ने इस बार जमकर वोटिंग भी की लेकिन खबरों के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों को ही अपने मत का प्रयोग करना नहीं आता. इतनी ट्रेनिंग और प्रशासनिक मशक्कतों के बावजूद वे अब तक डाक मतपत्र का सही प्रयोग नहीं सीख पाए हैं. लोगों को मतदान के लिए जागरूक करने के लिए चुनाव आयोग की ओर से जागरूकता अभियान चलाया गया. इसके लिए हर चुनाव से पहले क्षेत्र में करोड़ों रुपए खर्च किए गए. अधिकारियों और कर्मचारियों ने लोगों को मतदान करने की शपथ दिलाई, लेकिन खुद मतदान नहीं किया. जिन्होंने किया भी उनमें से कई ऐसे थे, जिनके वोट निरस्त हो गए.

चुनाव में जनता से वोट डलवाने वाले कर्मचारी खुद ही वोट डालने में गलतियां करते है. इसकी बानकी लोकसभा चुनावों ड्यूटियां कर रहे कर रहे कर्मचारियों द्वारा डाले गए पोस्टल और ईटीबीपीएस इलेक्ट्रानिकली ट्रांसमिटेड पोस्टल बेलेट सिस्टम मतों में अमान्य हुए मतों से मिली. पढ़े-लिखे सर्विस वोटरों के भी करीब राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों पर 35 हजार 120 वोट विभिन्न तकनीकी खामियों की वजह से रिजेक्ट करने पड़े. सर्विस वोटरों ने पोस्टल बैलेट और ईटीपीबी के माध्यम से मतदान करते समय छोटी-छोटी तकनीकी गलतियां की थीं जिनकी वजह से उनका मत निरस्त करना पड़ा.

चुनावों से पहले ट्रेंनिग के दौरान कर्मचारियों को बेलेट मत डालने के बारे में कई बार समझाया गया था. ट्रेनिंग के बावजूद कर्मचारियों द्वारा मत डाले में गलती करने का प्रतिशत हैरत में डालता है. मतदान के अधिकार के तहत निर्वाचन आयोग ने जिन कर्मचारियों की चुनावों में ड्यूटियां लगती है उन्हें पोस्टल वोट देने का अधिकार दिया जाता है. डाक मतपत्र को लेकर दो सवाल है, पहला ये कि इतनी कम संख्या में क्यों डाक मतपत्र जारी किए गए और दूसरा ये कि इतने ज्यादा मतपत्र कैसे रिजेक्ट हो गए. 

इसका तो यहीं मतलब हुआ कि कर्मचारियों को डाक मतपत्र का प्रयोग करना नहीं आता. इस बात पर कई लोगों को भरोसा नहीं है. ऐसे में यह भी कहा जा रहा है कि कर्मचारी जानबूझकर अपने मतपत्र निरस्त करवा दे रहे हैं. यदि निर्वाचन विभाग के आंकडों पर गौर करें तो सबसे ज्यादा झुंझुनूं लोकसभा सीट पर 4 हजार 475 डाकमत पत्र खारिज हुए. वहीं सबसे कम डाकमत पत्र जालौर लोकसभा सीट पर सिर्फ 8 डाकमत पत्र खारिज हुए.

आजादी के बाद पहली बार राजस्थान में लगभग 66.07 प्रतिशत मतदान हुआ जो 2014 की तुलना में 3 प्रतिशत अधिक था लेकिन वोटिंग को बढ़ाने वाले अफसर और कर्मचारी जानकारी के अभाव में 824 वोट को रिजेक्ट करा बैठे. मतदाता जागरुकता के लिए 100 से अधिक कार्यक्रम कराने के बावजूद सरकारी कर्मचारियों के ज्यादा वोट रिजेक्ट होने पर जिला निर्वाचन कार्यालय सवालों के घेरे में है. जानकारों का कहना है कि चुनाव कराने वाले कर्मचारियों को वोट डालना नहीं आता है, इसलिए कई वोट रिजेक्ट होते हैं, यह गंभीर बात है.

दरअसल डाक मतदान का चलन देश में काफी समय से चल रहा है. इस व्यवस्था को उन मतदाताओं के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो विभिन्न कारणों से अपने क्षेत्र में वोट डालने के लिए प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित नहीं हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग इन मतदाताओं को डाक मतदान के माध्यम से वोट डालने की सुविधा देता है. इस व्यवस्था का उपयोग चुनाव ड्यूटी में सेवा देने वाले अधिकारी, भारत सरकार के सशस्त्र बलों के कर्मचारी, देश के बाहर कार्यरत सरकारी अधिकारी, सेना अधिनियम 1950 के तहत आने वाले सभी बल के द्वारा किया जाता है. इसके साथ ही हर चुनाव में जब मतपत्रों की गणना की जाती है तो सर्वप्रथम डाक मतपत्रों को ही गिना जाता है.

बहरहाल, आमतौर पर ऐसा माना जाता है ग्रामीण क्षेत्र के अनपढ लोग वोट देने में गलती करते हैं. जिसके कारण उनके वोट निरस्त हो जाते हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारियों की ओर से की गई गलती ने सबकों चौका दिया है. पढ़े-लिखे सरकारी कर्मचारी चुनाव में अनपढ़ मतदाताओं से भी गए-गुजरे साबित हुए. कई कर्मचारियों ने बैलेट पेपर के साथ लगाए घोषणा पत्र पर साइन ही नहीं किए, तो किसी ने राजपत्रित अधिकारी से प्रमाणित नहीं कराया. कुछ ने मतपत्र क्रम संख्या घोषणा पत्र पर लिखी ही नहीं. इनके अलावा कुछ पोस्टल बैलेट ऐसे थे जिनमें बैलेट पेपर पर एक से ज्यादा उम्मीदवारों के नाम के आगे कोई चिह्न लगाया था.