close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

कोटा: एमबीएस अस्पताल में दवा खरीद में घपला, सरकार को लगा 8 लाख का चूना

जी मीडिया के खुलासे के बाद अस्पताल प्रशासन मामले को दबाने में जुटा हुआ है.

कोटा: एमबीएस अस्पताल में दवा खरीद में घपला, सरकार को लगा 8 लाख का चूना
अस्पताल प्रशासन ने नियमों की अनदेखी की है. (फाइल फोटो)

मुकेश सोनी, कोटा: कोटा के एमबीएस अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली एक बार फिर सवालों की घेरे में है. अस्पताल प्रशासन ने निजी दवा सप्लायर फर्म से साठ-गांठ कर 5 लाख रुपये का सॉल्यूशन 13 लाख में खरीदा है. नियमों की अनदेखी कर महंगी दर पर सॉल्यूशन खरीदने से सरकार को सीधे 8 लाख रुपये का नुकसान हुआ है. जी मीडिया के खुलासे के बाद अस्पताल प्रशासन मामले को दबाने में जुटा हुआ है.

पुरानी आरसी से खरीद
नर्सिंग इंचार्ज मेडिसिन आईसीयू व प्रभारी अधिकारी सेंट्रल लेब (माइक्रो बायलॉजी) ने 22 दिसम्बर व 26 दिसम्बर 2018 को फ्यूमिगेशन की डिमांड की थी. इंफेक्शन कंट्रोल कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर एमबीएस अधीक्षक ने एमबीएस हॉस्पिटल की निविदा संख्या 05/2016-17 के आधार पर स्टेट फंड से दिसम्बर 2018 में ही 1725 रुपये प्रति लीटर की दर से 740 लीटर फ्यूमिगेशन "स्पॉरीसाईडॉल सॉल्यूशन" परचेज के ऑर्डर जारी किए. अस्पताल में माल सप्लाई हुआ तो फरवरी 2019 में प्रशासन ने सप्लायर फर्म को करीब 13 लाख रुपये का भुगतान कर दिया. यानि 2016-17 कि आरसी (रेट कॉन्ट्रेक्ट) पर सॉल्यूशन खरीद लिया. जबकि प्रिंसिपल कोटा मेडिकल कॉलेज कोटा (राजस्थान) द्वारा तीनों अस्पतालों के लिए निविदा संख्या 04 / 2017-18 ड्रग मेडिसिन टेंडर में डिसइंफेक्टेंट्स (फ्यूमिगेशन के काम मे आने वाला सॉल्यूशन) की आरसी( रेट कॉन्ट्रेक्ट) 675 रुपये प्रति लीटर है. इतना ही नहीं कॉलेज प्रशासन द्वारा जारी टेंडर में दवा सप्लाई के लिए पांच फर्मो से अनुबंध है. लेकिन एमबीएस अस्पताल प्रशासन ने टेंडर शर्तो के बाहर जाकर पांचों फर्मो को साइड लाइन करके अलग फर्म (मेसर्स प्रियांशु एंटरप्राइजेज) से सॉल्यूशन की खरीद कर ली. मेडिकल कॉलेज प्रशासन द्वारा की गई आरसी से इस सॉल्यूशन की खरीद होती तो फर्म को केवल 4 लाख 99 हजार 500 रु.का भुगतान करना पड़ता. अस्पताल अधीक्षक डॉ नवीन सक्सेना नए नए जवाब तलाश रहे है. उनका कहना है कि वर्क ऑर्डर, नई आरसी के पहले जारी हुआ है. 

एनएसी भी नहीं ली
नियमों के मुताबिक अस्पताल में लोकल स्तर पर ड्रग-मेडिसिन खरीद के लिए सरकारी ड्रग वेयर हाउस (एमसीडब्ल्यू) से एनएसी लेनी जरूरी होता है. एमबीएस प्रशासन ने फ्यूमिगेशन खरीदने के लिए एमसीडब्ल्यू से एनएसी भी नही ली. इस संबंध में एमसीडब्ल्यू के इंचार्ज नरेंद्र नागर ने बताया कि सरकारी ड्रग वेयर में पर्याप्त मात्रा में डिसइंफेक्टेंट्स है. एमबीएस कॉलेज प्रशासन की ओर से कोई डिमांड नहीं की गई, ना ही एनएसी मांगी गई, जब सप्लाई में माल पड़ा है तो एनएसी कैसे जारी कर सकते है. बिना एनएसी जारी हुए माल खरीदना तो गलत है.

उठ रहे हैं ये सवाल
1. मेडिकल कॉलेज प्रशासन द्वारा  04 / 2017-18 को टेंडर जारी कर तीनो अस्पतालों में ड्रग मेडिसिन खरीद के लिए नई आरसी (रेट कॉन्ट्रेक्ट)कर ली गई। तो एमबीएस प्रशासन ने पुरानी आरसी पर सॉल्यूशन क्यो खरीदा?
2. नई आरसी 04 / 2017-18 में जारी हुई, जबकि वर्क ऑर्डर दिसम्बर 2018 में जारी हुआ. तो अस्पताल अधीक्षक झूठ क्यो बोल रहे है कि नई आरसी के पहले वर्क ऑर्डर जारी किया गया.
3. टेंडर में पांच फर्मो से दवा सप्लाई का अनुबंध किया है तो अन्य फर्म से सोल्यूशन क्यो खरीदा गया?
4. मेडिकल कॉलेज द्वारा जारी आरसी में डिसइंफेक्टेंट्स की रेट 675 रुपये प्रति 1 लीटर तय की गई है तो एमबीएस प्रशासन ने 1725 रुपये प्रति लीटर में क्यो खरीद की ?
5 . डिसइंफेक्टेंट्स की लोकल खरीद के लिए आपने एमसीडब्ल्यू से एनएसी क्यो नही ली? निजी फर्म को फायदा पहुचाने के लिए सरकार को क्यों चुना लगाया? या कोई मजबूरी थीं. क्या ये सब कुछ कमीशन के लिए किया गया है? एमबीएस प्रशासन की नीयत पर ये तमाम सवाल उठते है. जिसका जवाब अब तक कॉलेज प्रशासन नहीं दे सका है.