लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी, शिवसेना की दोस्ती के पीछे की इनसाइड स्टोरी

साढ़े चार सालों में सत्ता में रहते हुए शिवसेना लगातार मोदी सरकार पर अपने मुखपत्र सामना के जरिए हमले बोलती रही है. 

लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी, शिवसेना की दोस्ती के पीछे की इनसाइड स्टोरी
सामना के अग्रलेख मे यह बार-बार कहां गया है की स्थितियां 2014 जैसी नहीं है. (फाइल फोटो)

मुंबई : काफी वक्त से एक दूसरे पर कटाक्ष करने में लगी हुई शिवसेना और बीजेपी ने एक बार फिर से हाथ मिला लिया है. साढ़े चार सालों में सत्ता में रहते हुए शिवसेना लगातार मोदी सरकार पर अपने मुखपत्र सामना के जरिए हमले बोलती रही है. ऐसे मे दोनों का चुनाव में एक साथ आना राजनैतिक हलकों के लिए आम बात तो है, लेकिन शिवसेना की आम जन में किरकिरी हो रही है. लोकसभा चुनावों से पहले आखिरकार शिवसेना ने क्यों दोबारा बीजेपी का हाथ थामा है, इसका खुलासा पार्टी ने सामना में एक अग्रलेख के जरिए किया है. 

नीतिश कुमार का किया गया जिक्र
सामना के अग्रलेख में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का एनडीए छोडना और फिर से दामन थाम लेने का उल्लेख है. साथ ही साथ यह भी कहा है की नीतिश की पार्टी जेडीयू, अकाली और शिवसेना एनडीए के आद्य साथी है. अगर कांग्रेस सत्ता पाने के लिए महागठबंधन कर सकती है, आंकड़े बैठा रही है, तो हम भी आंकड़ों को बैठाने का काम कर रहे हैं.

पहले से बेहतर हुई राहुल गांधी की छविः सामना
सामना के अग्रलेख मे यह बार-बार कहां गया है की स्थितियां 2014 जैसी नहीं है. यह भाजपा को ध्यान में आते ही उन्होंने एनडीए के सदस्यों को फिर से एक साथ लाने की कोशिश करना की है. पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की छवी अच्छी हुई है. प्रियंका के आने से कांग्रेस पार्टी मजबूत होगी. लेकिन फिर भी वह महागठबंधन का झंडा लेकर चल रहें है. तो एनडीए को भी दोबारा से एकजुट होना पड़ेगा.

सामना में लिखा है..
भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा पार करना आज आसान नहीं है, वह यह बात दो साल पहले ही जान गए थे और एनडीए के बेकार बर्तनों की कलई करना ही उन्हें ठीक लगा लेकिन शिवसेना उसमें का बर्तन नहीं है तथा सत्य, देशहित और हिंदुत्व के मुद्दे पर हमारे बर्तन उनके बर्तन से टकराकर बजते रहे और सिक्के खनखनाते रहे. दबाव और दमन के भूतों को शिवसेना ने कभी कंधे पर बैठने नहीं दिया. हमने अपनी शान बनाए रखी और रखेंगे भी शिवसेना सत्ता के लिए लाचार नहीं है.

साथ ही साथ शिवसेना लोकतंत्र में सत्ता स्थापित करने के लिए आंकड़ें जुटाने के मजबूरी को भी अपने फैसले के पीछे का एक महत्त्वपूर्ण कारण बतातें है. 

लोकतंत्र में विशेषत: तुम्हारे संसदीय लोकतंत्र में ‘आंकड़े’ को जितना महत्व नहीं मिलना चाहिए था उतना ही मिल गया है इसलिए जैसे दूसरे लोग ये आंकड़े बिठाते हैं, उसी प्रकार हमें भी बिठाना पड़ता है. युति के संयोजन में नई व्यवस्था बनी है. उसकी अपेक्षा राज्य की नई ‘व्यवस्था’ हुई तो हमें वो चाहिए. २०१४ के बाद तलवारें निकलीं और अगले चार वर्ष सब तलवार में धार लगाते रहे लेकिन शिवसेना की तलवार दुधारी है."

जाते जाते सामना के एडीटोरीयल में शिवसेना ने राज ठाकरे पर तंज कसा है, जो पिछले कई दिनों से भाजपा के साथ अपना टाका फिट करने के चक्कर में थे. लेकीन वह ना होता देख राज ठाकरे अब पिछले दरवाजें से शरद पवार की एनसीपी का दामन थाम रहें है.

शिवराय हों या शिवसेना प्रमुख. पीठ पर वार सहकर बहे हुए खून की कीमत देकर उन्होंने संगठन को आगे बढ़ाया. यह पलायन नहीं होता और न ही लाचारी होती है, जोड़तोड़ तो बिल्कुल नहीं होती. देश में हवा किस दिशा में बह रही है यह कल ही पता चलेगा लेकिन ‘हवा’ हमारी ओर घूम गई है. हवा आएगी इसलिए हमने पीठ नहीं दिखाई. इतिहास को इसे दर्ज करना होगा. फिलहाल इतना ही. तलवार की धार बरकरार है और शिवसेना की तलवार ‘म्यानबंद’ नहीं है. 

हवा शिवसेना की है या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा. लेकीन फिलहाल फिरसे सत्ता में आने और अपने प्लेट में जादा पाने का पुरा आनंद शिवसेना उठा रहीं है.