संविधान की ली शपथ लेकिन विपक्ष भूला अपना पथ, तुष्टीकरण ही बन गई नीति?
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संविधान की ली शपथ लेकिन विपक्ष भूला अपना पथ, तुष्टीकरण ही बन गई नीति?

जिस संविधान के निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका कांग्रेस की थी वो कैसे अब इसकी याद में मनाए जाने वाले दिन का सम्मान करना भी भूल गई? विपक्ष संविधान का सम्मान करने के लिए सदन में तो नहीं पहुंचा लेकिन सदन के बाहर से विपक्ष ने अपना एजेंडा जरूर जारी रखा.

संविधान की ली शपथ लेकिन विपक्ष भूला अपना पथ, तुष्टीकरण ही बन गई नीति?

नई दिल्ली: 71 वर्ष पहले 26 नवंबर 1949 को भारत के लोगों ने ये तय किया था कि ये देश संविधान के हिसाब से चलेगा. किसी आसमानी, धार्मिक किताब या किसी व्यक्ति की इच्छा के अनुसार नहीं. पर क्या ये देश पूरी तरह से संविधान की भावना के अनुरूप चल रहा है. संविधान ही भारत के लोकतंत्र की आत्मा होगा ये परिकल्पना करने वाले किसी एक पार्टी के लोग नहीं थे बल्कि जिस संविधान सभा ने आज ही के दिन भारत के नए संविधान को स्वीकार किया था, उसमें 6 अलग-अलग पार्टियों के लोग थे, जिनमें कांग्रेस भी थी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया भी थी, अकाली दल भी था, शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन और यूनियनिस्ट पार्टी भी शामिल थी. इन सब लोगों ने तय किया कि ये देश किसी एक व्यक्ति या परिवार के विचारों पर नहीं बल्कि संविधान के मुताबिक चलेगा.

डॉ बीआर आंबेडकर ने कही थी ये बात

संविधान सभा द्वारा भारत का संविधान स्वीकार किए जाने से एक दिन पहले यानी 25 नवंबर 1949 को डॉक्टर भीम राव आंबेडकर ने इस सभा में अपना आखिरी भाषण देते हुए कहा था- कि संविधान कितना भी अच्छा हो, मगर इसका इस्तेमाल करने वाले लोग बुरे होंगे तो यह बुरा साबित होगा और अगर संविधान बुरा है, पर उसका इस्तेमाल करने वाले अच्छे लोग होंगे तो संविधान भी अच्छा सिद्ध होगा. लेकिन 71 साल बाद हमारा देश एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है जहां संविधान की प्रति हाथ में लेकर लोकतंत्र बचाने की कसम खाने वाले नेता संसद भवन में होने वाले संविधान दिवस कार्यक्रम में ही हिस्सा लेने से मना कर देते हैं. 

'हम' शब्द का क्या अर्थ?

शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का विरोध करने के नाम पर देश की ज्यादातर विपक्षी पार्टियों ने संसद भवन में होने वाले संविधान दिवस कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया. ये नेता भूल गए कि भारत में विपक्ष को जो शक्ति हासिल है वो भी इसी संविधान की देन है, ये लोग भूल गए कि संविधान सभा में शामिल नेताओं के भी विचार आपस में मेल नहीं खाते थे, लेकिन इसके बावजूद उन नेताओं ने देश के लिए एक ऐसा संविधान तैयार किया जिसमें हर समस्या का हल छिपा है. भारत के संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत ही होती है- हम भारत के लोग से. यहां 'हम' शब्द पर ध्यान दीजिए जिसका मतलब है हम सब, जिसमें सभी जातियों, सभी धर्मों, सभी रंगों और सभी विचारों के लोग शामिल हैं संविधान की प्रस्तावना में- मैं या वो जैसे शब्द नहीं लिखे हैं लेकिन फिर भी विपक्ष को लगता है कि संविधान दिवस मनाने वाली सरकार संविधान का पालन नहीं कर रही. इसी को आधार बनाकर विपक्ष ने संविधान दिवस कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया. लेकिन हमें लगता है कि ये बहिष्कार असल में भारत के संविधान का अपमान है क्योंकि ये कार्यक्रम संसद के सेंट्रल हॉल में हो रहा था, ये बीजेपी की कोई राजनैतिक रैली नहीं थी.

आज संविधान लिखा जाता तो क्या होता?

जब इस मौके पर देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और लोक सभा स्पीकर भाषण दे रहे थे, तब वहां या तो सिर्फ बीजेपी के या बीजेपी के मित्र दलों के सांसद मौजूद थे. विपक्ष का ये रवैया देखकर ही  प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि अगर आज संविधान लिखा जाता तो सबका आपस में इतना विरोध होता कि एक पन्ना भी लिखना मुश्किल हो जाता. इसके अलावा भी प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंच से बिना नाम लिए विपक्ष पर निशाना साधा और परिवारवाद से लेकर भ्रष्टाचार तक की बात की. उन्होंने ये भी कहा कि संविधान दिवस कार्यक्रम किसी सरकार, दल या प्रधानमंत्री का कार्यक्रम नहीं है, ये सदन का कार्यक्रम है और सदन के सदस्यों को डॉक्टर बी आर आंबेडकर द्वारा कही गई बातों की गरिमा बनाकर रखनी चाहिए. 

संविधान को याद करने के दिन भी राजनीति

जिस संविधान के निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका कांग्रेस की थी वो कैसे अब इसकी याद में मनाए जाने वाले दिन का सम्मान करना भी भूल गई है. विपक्ष संविधान का सम्मान करने के लिए सदन में तो नहीं पहुंचा लेकिन सदन के बाहर से विपक्ष ने अपना एजेंडा जरूर जारी रखा, किसी ने ये कहा कि मौजूदा केंद्र सरकार संविधान का पालन नहीं कर रही तो किसी ने कहा कि अभी आरक्षण का दायरा और बढ़ाया जाना चाहिए तो राहुल गांधी जैसे नेताओं ने तो ट्विटर पर ही लोगों को इस दिन की शुभकामनाएं देकर अपना फर्ज निभा लिया. जिस संविधान के निर्माण के दौरान अलग-अलग विचारों के नेताओं ने अपनी विचारधारा से ऊपर देश को रखा था उस संविधान को याद करने के दिन विपक्ष ने राजनीति की.

संविधान को शासन की गीता नहीं बनने दिया

जो सांसद इस कार्यक्रम में मौजूद थे वो भी और जिन्होंने इसका बहिष्कार किया वो भी जब चुनकर संसद पहुंचते हैं तो ये लोग संविधान के प्रति निष्ठा रखने की शपथ खाते हैं लेकिन अब ये शपथ ही सवालों के घेरे में है क्योंकि हमारे देश के नेताओं ने कभी संविधान को शासन की गीता बनने ही नहीं दिया. सोचिए अगर किसी साधारण आदमी को श्रीमद्भगवद्गीता दी जाए तो वो क्या करेगा? उसे देखेगा और अपने माथे पर लगा लेगा फिर उसी आदमी को हम भारत का संविधान दें तो वो क्या करेगा वो आश्चर्य से पूछेगा इसका क्या करुं? मुझे ये क्यों दे रहे हैं? दरअसल हम एक राष्ट्र के रूप में अपने संविधान को शासन की गीता बनाने से चूक गए हैं. देश के सबसे कमजोर आदमी के जीवन में संविधान का असर पहुंचा नहीं पाए. हम अदालत में गीता की कसम लेकर सच बोलते हैं पर संविधान को लेकर वो भावना देश के नेताओं और नागरिकों में जन्म नहीं ले सकी.

1976 में संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए ये शब्द

आप लोगों में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसे गीता का सार याद ना हो, कि कर्म करो फल की इच्छा मत करो. पर हममें से शायद कुछ ही लोग ऐसे होंगे जिन्हें संविधान का सार याद हो कि स्वतंत्रता, समानता और न्याय ही हमारे शासन का आधार है. ऐसा क्यों हुआ? इसे समझाने के लिए आपको वर्ष 1949 में संविधान की मूल प्रस्तावना में लिखे गए शब्द 'हम भारत के लोग, भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए' को समझना चाहिए. संविधान स्वीकार करने के 27 साल बाद यानी वर्ष 1976 में दो शब्द प्रस्तावना में जोड़े गए, 'हम भारत के लोग भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए'. समाजवादी और पंथनिरपेक्ष ये वो दो शब्द हैं जिन्हें वर्ष 1949 में जगह नहीं दी गई थी. ऐसा कहा जाता है कि समाजवादी शब्द को शामिल करके तत्कालीन कांग्रेस सरकार खुद को गरीबों के साथ दिखाना चाहती थी और पंथनिरपेक्ष शब्द को संविधान में शामिल करके अल्पसंख्यकों को खुश करने की कोशिश की गई लेकिन वर्ष 1975 में इमरजेंसी लागू करने के बाद जनसंख्या नियंत्रण की कोशिशों से अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत हुई थीं.

तुष्टीकरण ही नीति बनती गई

समाजवादी शब्द पर गांधीवादी राजी नहीं थे. उन्हें लगता था कि भारत कैसा होगा ये तय करना अभी सही नहीं होगा. जबकि पंथनिरपेक्षता के लिए भीमराव आंबेडकर को लगता था कि इसकी जरूरत नहीं है क्योंकि भारत स्वभाव से सबको साथ में लेकर चलने वाला देश है. संविधान निर्माताओं को भारत की चुनौतियां पता थीं और उनका समाधान भी. देश को एक रखने के लिए सबका साथ सबका विकास की जरूरत तब भी महसूस की गई थी. राष्ट्र की एकता सबसे जरूरी बात मानी गई थी पर धीरे-धीरे हम उस रास्ते की ओर बढ़ गए जहां तुष्टीकरण ही नीति बन गया. जबकि भारत के संविधान के पीछे की सोच इससे ठीक उलट थी. संविधान की मूल कॉपी के हर पेज पर आपको भारत की सभ्यता और संस्कृति की झलक दिखाई देगी. जिस पन्ने पर मूल अधिकारों का जिक्र है उस पर प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने की तस्वीर भी है. इसमें कृष्ण और अर्जुन के साथ नटराज की तस्वीर भी मौजूद है. मूल प्रति में गौतम बुद्ध, महावीर, गुरु गोबिंद सिंह की तस्वीरें हैं.

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हिन्दू-मुस्लिम की समस्या नहीं हुई खत्म

जिस तरह से जड़ के बिना किसी विशाल पेड़ की कल्पना नहीं की जा सकती उसी तरह संस्कृति से जुड़े बिना भारतीय संविधान भी मजबूत नहीं हो सकता है, ऐसी सोच संविधान निर्माताओं की थी. पर धीरे धीरे राजनीतिक स्वार्थ के लिए संविधान की भावना को पीछे धकेल दिया गया. इतना पीछे कि हरा रंग मुसलमान का और भगवा हिन्दू का हो गया. बिरयानी मुसलमान की और चावल हिन्दू का हो गया. पक्षियों को भी हिन्दू मुस्लिम के पिंजड़े में बंद कर दिया गया. धार्मिक आधार पर देश का बंटवारा होने के बाद संविधान निर्माताओं ने ये सोच लिया था कि हिन्दू मुस्लिम की समस्या खत्म हो गई. पर ऐसा पूरी तरह से हुआ नहीं, देश के लोग बंटे रहे देश में एकता की कमी महसूस होती रही. संविधान की बुनियादी सोच और भविष्य के भारत में विरोध दिखने लगे. नागरिक अपने संविधान से दूर होते गए और संविधान अपने मकसद से.

इस तरह लिखा गया संविधान

26 नवंबर 1949 को संविधान स्वीकृत किए जाने के बाद एक विशेष कागज पर हाथ से लिखकर इसे तैयार किया गया था. इस विशेष कागज की उम्र करीब 1 हजार वर्ष है. यानी एक हजार वर्षों तक ये सुरक्षित रहेगा. 251 पन्नों पर लिखकर तैयार की गई संविधान की इस कॉपी का वजन करीब 4 किलोग्राम है. संविधान की इस कॉपी पर ही 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के 292 प्रतिनिधियों ने दस्तखत किए थे. भारत की संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी. संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा के कुल 11 अधिवेशन हुए थे. इन अधिवेशनों में कुल 53 हजार लोग शामिल हुए थे. संविधान सभा को इसे पास करने में दो वर्ष, 11 महीने और 17 दिन का समय लगा था. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि संविधान का प्रारूप तैयार करने वाली समिति ने इसे हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में हाथ से लिखकर तैयार किया था यानी इसमें कोई टाइपिंग या प्रिंटिंग शामिल नहीं थी.

भारत का संविधान सबसे बड़ा 

संविधान का ड्राफ्ट बनाने से पहले संविधान सभा के सलाहकार बीएन राव के निर्देशन में 60 देशों के संविधान का अध्ययन किया गया था. अमेरिका का संविधान पूरी दुनिया का सबसे छोटा लिखित संविधान है. इसके मुकाबले भारत का संविधान करीब 5 गुना बड़ा है. दुनिया के देशों में भारत का संविधान सबसे बड़ा है. इसमें 1 लाख 46 हजार से ज्यादा शब्द हैं. दुनिया का दूसरा बड़ा संविधान नाइजीरिया का है जिसमें करीब 66 हजार शब्द हैं यानी भारतीय संविधान इससे भी दोगुना बड़ा है. संविधान देश के लिए जरूरी है क्योंकि इसमें प्रशासन या सरकार के अधिकार, उसके कर्तव्य और नागरिकों के अधिकार विस्तार से बताये गये हैं. संविधान दिवस के मौके पर हम सभी को ये संकल्प लेना चाहिए कि हम संविधान की सच्ची भावना को अपने जीवन में उतारें, इसे गीता जैसा सम्मान दें.

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