अब UP के आदिवासी बच्चों को मिलेगा शिक्षा का नया आयाम, 4 जिलों में जल्द खुलेंगे एकलव्य स्कूल

मौजूदा समय में बहराइच और लखीमपुर खीरी में एकलव्य विद्यालय संचालित किए जा रहे हैं. इसके अलावा, ललितपुर में ये स्कूल अभी निर्माणाधीन है.

अब UP के आदिवासी बच्चों को मिलेगा शिक्षा का नया आयाम, 4 जिलों में जल्द खुलेंगे एकलव्य स्कूल
प्रतीकात्मक तस्वीर.

लखनऊ: 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यूनियन बजट पेश किया, जिसमें देश के विकास के लिए कई नई योजनाएं घोषित की गईं. जनता ने भी इन योजनाओं का स्वागत किया. बच्चों के विकास के लिए वित्त मंत्री ने कई राज्यों के अनुसूचित जनजाति बाहुल्य क्षेत्रों में एकलव्य स्कूल खोले जाने की बात रखी थी. इसी क्रम में उत्तर प्रदेश में 2021-22 में 4 एकलव्य स्कूल खोले जाएंगे. 

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स्कूल बनाने में आएगी इतनी लागत
इसको लेकर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जा चुका है. यह स्कूल उत्तर प्रदेश के लखनऊ, बिजनौर, सोनभद्र और श्रावस्ती में खोले जाएंगे. बता दें, सोनभद्र जैसे पहाड़ी इलाकों में एकलव्य स्कूल की लागत 48 करोड़ आएगी. वहीं, मैदानी इलाकों में 38 करोड़ की लागत से इन स्कूलों को बनाने का प्रस्ताव भेजा गया है. गौरतलब है कि मौजूदा समय में बहराइच और लखीमपुर खीरी में एकलव्य विद्यालय संचालित किए जा रहे हैं. इसके अलावा, ललितपुर में ये स्कूल अभी निर्माणाधीन है.

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क्या होते हैं एकलव्य विद्यालय?
उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के अनुसार, एकलव्य स्कूल नि:शुल्क आवासीय विद्यालय होते हैं, जिनमें 90% अनुसूचित जनजाति के बच्चों को पढ़ाने का लक्ष्य रखा जाता है. इसके लिए इन स्कूलों में 90% सीटें अनुसूचित जनजाति के बच्चों के लिए आरक्षित होती हैं. बता दें, एकलव्य स्कूल सहशिक्षा वाले विद्यालय होते हैं. यह आश्रम पद्धति की तर्ज पर बनाए जाते हैं, लेकिन इनका निर्माण और संचालन आश्रम पद्वति विद्यालयों से बेहतर है.

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दरअसल, एकलव्य स्कूलों की स्थापना आदिवासी बहुत ब्लॉकों में की जाती है (जहां 50% से ज्यादा की जनसंख्या आदिवासी समुदाय की होती है). सरकार चाहती है कि आदिवासी इलाकों से आने वाले बच्चे अपने ही परिवेश में एक अच्छी शिक्षा पा सकें. गौरतलब है कि आदिवासी समुदाय के लिए बनाए गए बहुत से विद्यालय एक शिक्षक के भरोसे ही चल रहे हैं. यहां संसाधनों की भी कमी है. लेकिन सराकर की इस नई योजना से आदिवासी अंचल में अच्छी शिक्षा मुहैया कराने के प्रयासों को गति मिलेगी. इसके साथ ही, बच्चों को स्थानीय कला सीखने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा. साथ ही, देश की संस्कृति, खेलों और कौशल को भी बढ़ावा दिया जाएगा. 

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