ZEE जानकारी: क्या भारतीय मीडिया का बंटवारा हो चुका है?

दुख की बात ये है कि भारत का मीडिया, राजनीतिक पार्टियों और नेताओं से भी ज़्यादा बंटा हुआ है और राजनीतिक है.

ZEE जानकारी: क्या भारतीय मीडिया का बंटवारा हो चुका है?

आज विश्लेषण की शुरुआत हम एक वीडियो से करना चाहते हैं. ये वीडियो पाकिस्तान से आया है. और इस वीडियो में भारत के मीडिया के लिए बहुत बड़ा सबक छिपा हुआ है. पाकिस्तान को पत्रकारों के लिए सबसे ख़तरनाक देशों में गिना जाता है. वहां एक पत्रकार की ज़िंदगी जीना, किसी सज़ा से कम नहीं है. लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान का मीडिया बंटा हुआ नहीं है. आप ये वीडियो देखिए और फिर हम इस विश्लेषण को आगे बढ़ाएंगे.

ये वीडियो कल का है. पाकिस्तान के जल संसाधन मंत्री फैसल वावडा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे. तभी एक पत्रकार ने उनसे सवाल पूछा जिस पर मंत्री जी थोड़ा तिलमिला गए. और सवाल पूछने वाले पत्रकार से बदसलूकी करने लगे. लेकिन इसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद सभी पत्रकारों ने पाकिस्तान के इस मंत्री का बहिष्कार कर दिया. ये मंत्री लगातार माफी मांगता रह गया, लेकिन पत्रकार नहीं माने. ये हाल तब है कि जब पाकिस्तान में सिर्फ दिखावे के लिए ही लोकतांत्रिक सरकार है. वहां असल में सत्ता, फौज के हाथ में होती है. इसके बावजूद पाकिस्तान के पत्रकारों की एकता बरकरार है. अगर कोई नेता किसी पत्रकार से बदसूलकी करता है, तो सारे पत्रकार मिलकर उसका सामना करते हैं. 

लेकिन ऐसी उम्मीद भारत के मीडिया से नहीं की जा सकती. क्योंकि भारत के मीडिया में एकता नहीं है. 1947 में जिस तरह भारत का बंटवारा हुआ था... ठीक उसी तरह अब भारत के मीडिया का भी बंटवारा हो चुका है. और मीडिया के इस बंटवारे में कांग्रेस पार्टी का बहुत बड़ा हाथ है. क्योंकि इमरजेंसी वाला Virus, कांग्रेस के DNA से अभी तक निकला नहीं है. इमरजेंसी के दौर में कांग्रेस को मीडिया के दमन का चस्का लग गया था. और आज 2018 में भी ये चस्का छूटा नहीं है.

इस दौर में मीडिया के लिए कांग्रेस की अनकही चेतावनी ये है कि अगर किसी पत्रकार ने कांग्रेस का पक्ष नहीं लिया, तो उसका सार्वजनिक अपमान किया जाएगा. उस पत्रकार को बीजेपी का भक्त बताया जाएगा, उसे दलाल कहा जाएगा और उस पर ये Tag लगा दिया जाएगा कि वो निष्पक्ष नहीं है... बल्कि वो एक बिका हुआ पत्रकार है.
कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता की तरह काम करने वाले पत्रकार, ऐसे मुद्दों पर कांग्रेस का विरोध करने के बजाए.. राहुल गांधी और उनकी पार्टी को प्रणाम करते हैं. ऐसे ही दरबारी पत्रकारों को बाद में पुरस्कार भी दिए जाते हैं. जबकि सच्ची पत्रकारिता करने वालों को बिका हुआ कहा जाता है. 

कल राहुल गांधी ने भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेने वाली पत्रकार को Pliable कहा, डिक्शनरी के हिसाब से इसका मतलब होता है लचीला. राहुल गांधी ने पत्रकार को सत्ता के प्रति बहुत लचीला बताया, लेकिन वहां मौजूद पत्रकारों ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की. 

कुछ समय पहले नवजोत सिंह सिद्धू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज़ी न्यूज़ को नानी याद दिलाने की बात कही थी. लेकिन तब भी वहां मौजूद किसी भी पत्रकार ने इस पर आपत्ति नहीं जताई थी.

दुख की बात ये है कि भारत का मीडिया, राजनीतिक पार्टियों और नेताओं से भी ज़्यादा बंटा हुआ है और राजनीतिक है. राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता तो फिर भी कुछ मुद्दों पर पार्टी लाइन से ऊपर उठकर, कभी कभी एक साथ आ जाते हैं. लेकिन भारत के मीडिया में बंटवारे लकीर बहुत गहरी हो चुकी है.

कल सच्चे पत्रकारों की प्रति कांग्रेस पार्टी की असहनशीलता हमने आपको दिखाई थी. और आज पूरे देश में इस पर हंगामा हो रहा है. कांग्रेस की इस असहनशीलता के खिलाफ पूरा देश एक है. लेकिन आज भी इस मुद्दे पर बहुत से पत्रकार कांग्रेस पार्टी की भक्ति में डूबे हुए हैं. शायद उन्हें राहुल गांधी से किसी पुरस्कार की उम्मीद है.

कल जब राहुल गांधी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ANI की एडिटर स्मिता प्रकाश की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे थे, तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद बाकी के पत्रकार चुपचाप बैठे हुए थे. इन पत्रकारों में से कोई भी राहुल गांधी का विरोध करने के लिए खड़ा नहीं हुआ. ये सारे पत्रकार खुद को अभिव्यक्ति की आज़ादी का चैंपियन बताते हैं. लेकिन राहुल गांधी के सामने ये सब एकदम ठंडे पड़ गये थे. 

किसी ने भी राहुल गांधी से ये नहीं कहा कि उन्हें किसी पत्रकार के बारे में ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने का कोई अधिकार नहीं है. जबकि पाकिस्तान में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सारे पत्रकार एकजुट हो गये थे.

हमारी बात समझने के लिए आपको एक बार फिर से राहुल गांधी का वो बयान सुनना होगा, जो उन्होंने ANI की एडिटर.. स्मिता प्रकाश के बारे में दिया था. 

राहुल गांधी ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले संसद में भी प्रधानमंत्री के इंटरव्यू को Staged Interview कहा था.
 
कोई भी इंटरव्यू अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा होता है. कोई भी संवाद चाहे वो किसी भी अखबार में छपे, या किसी भी मीडिया में आए, वो अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है. और लोकतंत्र में हर किसी को.. इस आज़ादी की रक्षा करनी चाहिए.. लेकिन राहुल गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस इसी आज़ादी को कुचलना चाहते हैं. वो देश के हर इंटरव्यू और हर संवाद को किसी भी कीमत पर अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं.

हमारे देश में बहुत से मुद्दे ऐसे होते हैं, जिनमें नेता भी एक साथ आ जाते हैं. लेकिन मीडिया किसी भी मुद्दे पर एक साथ नहीं होता. और यही मीडिया का बंटवारा है. हो सकता है कि आपको ये सब कुछ... अब पता चल रहा हो, लेकिन ये सब कुछ पिछले कई वर्षों से हो रहा है. और दुर्भाग्य से पत्रकारों ने अपनी ये दुर्गति स्वयं की है. क्योंकि पत्रकार पुरस्कारों और पद्मश्री के लालच में कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता बन गए. इसीलिए अब नेता पत्रकारों का अपमान करके सामने से निकल जाते हैं और दरबारी पत्रकार चुप रहते हैं.

कितने आश्चर्य की बात है कि पाकिस्तान में पत्रकारों की एकता देखने को मिल जाती है. लेकिन भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ऐसा देखने को नहीं मिलता. 
पाकिस्तान के अलावा हमारे पास एक और उदाहरण है. अमेरिका में भी पत्रकार एक दूसरे का अपमान सहन नहीं करते. 

आपको याद होगा पिछले वर्ष नवंबर में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने CNN के एक पत्रकार का Press Pass, रद्द कर दिया था. और अमेरिकी राष्ट्रपति के आवास White House में उस पत्रकार के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था. क्योंकि इस पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉनल्ड ट्रंप से कुछ तीखे सवाल पूछ लिए थे. हालांकि बाद में ये मामला अदालत में गया और अदालत ने पत्रकार के पक्ष में फैसला सुनाया. लेकिन इस पूरे मामले में अमेरिकी मीडिया के दो बड़े प्रतिद्वंद्वी भी एक साथ थे. CNN और Fox News अमेरिका के दो बड़े मीडिया संस्थान हैं और दोनों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है. लेकिन जब डॉनल्ड ट्रंप ने CNN के पत्रकार से बदसलूकी की तो Fox News ने भी CNN का साथ दिया था

लेकिन ऐसा भारत के मीडिया के नहीं होता. भारत का मीडिया... राजनीतिक पार्टियों से भी ज़्यादा बंटा हुआ है. 
 
स्मिता प्रकाश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हर वो सवाल पूछा था, जो पूछा जाना चाहिए था. जिस दिन ये इंटरव्यू आया था, उस दिन भी हमने आपसे ये कहा था कि इस इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर उस सवाल का जवाब दिया था, जो विपक्ष पूछना चाह रहा है. लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस और कांग्रेस के दरबारी पत्रकार स्मिता प्रकाश के सवालों से संतुष्ट नहीं हैं. 

इन सभी पत्रकारों को राहुल गांधी और सोनिया गांधी से पूछे जाने वाले सवालों को एक बार फिर से याद कर लेना चाहिए. इस वक्त हम आपको नरेन्द्र मोदी और गांधी परिवार से पूछे जाने वाले सवालों की एक तुलनात्मक लिस्ट दिखा रहे हैं. आप देख सकते हैं कि स्मिता प्रकाश ने नरेन्द्र मोदी से क्या सवाल पूछे और कांग्रेस के दरबारी पत्रकार गांधी परिवार से कैसे सवाल पूछते हैं. 

इसके कुछ उदाहरण देखिए - 

स्मिता प्रकाश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ये सवाल पूछा कि क्या मोदी मैजिक कम हो गया है या ना के बराबर रह गया है ? उन्होंने ये भी पूछा कि आपका कांग्रेस मुक्त भारत का मक़सद फेल हो रहा है ? या बीजेपी सर्जिकल स्टाइक का राजनीतिक इस्तेमाल क्यों कर रही है ? 

जबकि सोनिया गांधी का इंटरव्यू करने वाले पत्रकार ने उनसे ये पूछा कि क्या वो पास्ता बना लेती हैं . राहुल गांधी से तो एक पत्रकार ये भी पूछा था कि उन्हें समोसा पसंद है या गुड़ की जलेबी? एक पत्रकार ने तो इंटरव्यू के दौरान राहुल गांधी से उनके पालतू कुत्ते का हालचाल भी पूछा था. 

हैरानी की बात ये है कि इस तरह के सवाल पूछने वाले पत्रकारों का गैंग.. प्रधानमंत्री के इंटरव्यू पर सवाल उठा रहा है.
 
आजकल कांग्रेस का यही रवैया है कि अगर किसी पत्रकार या मीडिया हाउस ने उनकी बात नहीं सुनी, या उनके हिसाब से बात नहीं की, तो वो उस चैनल या पत्रकार की विश्वनीयता पर चोट करते हैं. कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता उस चैनल या पत्रकार को तुरंत बिका हुआ कहते हैं या फिर उन्हें बीजेपी का भक्त बताते हैं. कांग्रेस के प्रवक्ता ज़ी न्यूज़ का भी ऐसा अपमान करते रहे हैं. अगर कांग्रेस पार्टी देश की सबसे पुरानी पार्टी है तो Zee News भी देश का सबसे पुराना न्यूज़ चैनल है. पूरी दुनिया में हमारे करोड़ों दर्शक हैं. और हमारे दशर्कों की संख्या कांग्रेस पार्टी के वोटरों से ज़्यादा है. हमारे ये दर्शक, हम पर पूरी तरह से भरोसा करते हैँ. 

लेकिन पिछले कई वर्षों से कांग्रेस के प्रवक्ता ज़ी न्यूज़ के मंच पर आकर बदसलूकी करते रहे हैं. ज़ी न्यूज़ पर अलग अलग कार्यक्रमों में कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने कई बार निराधार आरोप लगाए और जब उनसे आरोपों पर जवाब मांगा गया तो उनकी बोलती बंद हो गई. कई मौके तो ऐसे भी आए, जब कांग्रेस के प्रवक्ता आरोप लगाने के बाद बहस छोड़कर ही भाग गए. ये कांग्रेस की हिट एंड रन वाली राजनीति है. आप इसे भी ध्यान से देखिए.
 
ये कांग्रेस के नेताओं और प्रवक्ताओं का एक रूप था. अब आपको दूसरा रूप दिखाते हैं. कांग्रेस का कोई नेता अगर कुछ गलत करता है और अगर हम उसे Expose करते हैं, तो कांग्रेस सीधे धमकी देने पर उतारू हो जाती है. आपको याद होगा राजस्थान के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के नेता नवजोत सिंह सिद्धू की रैली के दौरान पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगे थे. ज़ी न्यूज़ ने ये ख़बर प्रमुखता से दिखाई थी. ये ख़बर कांग्रेस को इतनी चुभी कि उन्होंने बाकायदा एक आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दी. और नवजोत सिंह सिद्धू ने खुलेआम ज़ी न्यूज़ को नानी याद दिलाने की धमकी दे दी. आप कांग्रेस के नेताओं की इस असहनशीलता को भी देखिए और ये समझने की कोशिश कीजिए कि मीडिया पर पाबंदी लगाने वाली ये सोच कहां से आ रही है? 

नोट करने वाली बात ये भी है कि सिद्धू ने खुलेआम ज़ी न्यूज़ को धमकी दी और सारे मीडिया संस्थान चुप रहे. अब आपको समझ में आ रहा होगा, कि इमरजेंसी वाला वायरस क्य़ा है और कांग्रेस को मीडिया का दमन करने का चस्का कब लगा. कांग्रेस के नेताओं और प्रवक्ताओं की इस बदसलूकी के खिलाफ हमने कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को एक चिट्ठी भी लिखी थी. ये चिट्ठी हमने पिछले वर्ष अक्टूबर में लिखी थी. और उनसे ये कहा था कि उनके प्रवक्ता और नेता, हिंट एंड रन की राजनीति करते हैं. और आरोप लगाने के बाद बिना जवाब सुने ही भाग जाते हैं. ये चिट्ठी आज मैं आपको पढ़कर सुनाना चाहता हूं. 
 
जब नवजोत सिंह सिद्धू ने ज़ी न्यूज़ को धमकी दी तो हमने Editor’s Guild को भी एक चिट्ठी लिखी थी. Editor’s Guild की स्थापना प्रेस की आज़ादी की रक्षा के लिए की गई थी. लेकिन ये बड़ी हैरानी की बात ये है कि ये संस्था भी सिर्फ मीडिया की राजनीति का अड्डा बनकर रह गई है. हमने नवजोत सिंह सिद्धू की धमकी के खिलाफ Editor’s Guild में शिकायत दर्ज कराई थी. लेकिन हमारी इस शिकायत पर हमें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. Editor’s Guild के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता हैं. मैंने खुद उन्हें कई बार फोन किया और मैसेज किए, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. ये चिट्ठी आज मेरे हाथ में है, मैं आपको ये चिट्ठी भी पढ़कर सुनाना चाहता हूं. 

ये संस्था इस देश के ऐसे वरिष्ठ पत्रकारों का VIP क्लब बन चुकी है, जहां मीडिया के मठाधीश और स्वयंभू संपादक होते हैं.
हालांकि स्मिता प्रकाश के अपमान के खिलाफ आज Editor's Guild की तरफ से एक बयान आया है. लेकिन इस चिट्ठी की भाषा बड़ी ही चालाकी से तैयार की गई है. और इसमें राहुल गांधी के बयान पर चिंता तो जताई गई है, लेकिन बड़ी चालाकी से ये भी लिखा गया है कि पत्रकारों के लिए ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल बीजेपी और आम आदमी पार्टी भी करती रही हैं. इसलिए अब ये सब बंद होना चाहिए. मैं आपको ये चिट्ठी पढ़कर सुनाना चाहता हूं. 

वैसे तो कल राहुल गांधी बड़े गर्व से ये कह रहे थे कि उनसे किसी भी तरह का सवाल पूछा जा सकता है. लेकिन जब राहुल गांधी से कोई कठिन सवाल पूछा जाता है, या ऐसा सवाल पूछा जाता है, जो उनकी पार्टी लाइन से मेल नहीं खाता तो वो उस सवाल से बचते हैं.