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Opinion : उत्तर-पूर्व में हिंदुत्व के बढ़ते कदम- चुनौतियां और सीमाएं

बांग्लादेशी घुसपैठिये के मसले पर बीजेपी मेघालय में अपनी जमीन मजबूत कर सकती है, लेकिन इत्मिनान के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि यह राजनीति बहुत आगे जा पाएगी. यह इस बात पर निर्भर करेगी कि वहां का ईसाई समाज इसे कितनी गंभीरता से लेता है.

Opinion : उत्तर-पूर्व में हिंदुत्व के बढ़ते कदम- चुनौतियां और सीमाएं

करीब 30 साल पहले उत्तर-पूर्व के सात राज्यों में से केवल एक में गैर-कांग्रेसी सरकार थी, लेकिन आज केवल एक में कांग्रेस की सरकार है. बीच के इन वर्षों में कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के बीच लड़ाई चल रही थी. क्षेत्रीय दल अब भी वहां अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस हाशिये पर चली गई और उसका स्थान बीजेपी ने ले लिया. बीजेपी का यह उभार आकस्मिक है या किसी सामाजिक, सांस्कृतिक-राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम? दूसरे शब्दों में यह केंद्र में मोदी सरकार के आने का स्वाभाविक परिणाम है या इसके पीछे वहां के समाज की आकांक्षा की अभिव्यक्ति है? अगर यह सामाजिक आकांक्षा है, तो यह कैसे और क्यों हुआ? क्या यह हिंदुत्व की स्वीकारोक्ति है?

केंद्र की मोदी सरकार के दौरान असम और मणिपुर चुनाव बीजेपी द्वारा जीत जाने के बाद भी कई राजनीतिक विश्लेषक मेघालय और नागालैंड में बीजेपी की जीत को लेकर आशंका प्रकट कर रहे थे, हालांकि त्रिपुरा के बारे में उनकी सोच प्रायः ऐसी नहीं थी. मानव विकास सूचकांक के लिहाज से अन्य राज्यों के परिप्रेक्ष्य में त्रिपुरा की हालत बुरी नहीं कही जा सकती, पर वहां की वामपंथी सरकार समाज के बदलते मनोभाव को समझ नहीं पाई. बेरोजगारी, महिला सुरक्षा जैसे कुछ ऐसे मसले थे, जो वहां की नई पीढ़ी को प्रभावित कर रहे थे, लेकिन बांग्लादेशी घुसपैठियों का मसला हिन्दू समाज को अन्दर ही अन्दर उद्वेलित कर रहा था. माकपा, कांग्रेस जैसी कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियां इसके प्रति उदासीन रहीं, लेकिन बीजेपी बांग्लादेश से आए बंगाली हिन्दुओं को घुसपैठिया नहीं मानती थी. इस संबंध में केंद्र सरकार 2016 में ही नागरिकता कानून में संशोधन के लिए विधेयक ला चुकी है, जो अभी संसदीय समिति के पास विचाराधीन है. असम की भांति यहां भी ऐसे हिन्दुओं द्वारा बीजेपी को समर्थन मिलना स्वाभाविक था.

माकपा सत्ता से बाहर हो गई, लेकिन उसका जनाधार अब भी काफी हद तक उससे जुड़ा हुआ है. असली नुकसान कांग्रेस को हुआ, जिसका मतदाता बीजेपी की ओर खिसक गया. वैचारिक दृष्टि से यह तुष्टीकरण की राजनीति को झटका है, लेकिन बीजेपी की असली परीक्षा अभी बाकी है. अगर उसने बांग्लादेशी घुसपैठिये के मसले को हिन्दू समाज की आकांक्षा के अनुरूप नहीं निपटाया, तो इसका लाभ वह दीर्घकाल तक नहीं उठा सकेगी. इसके अलावा उसके सामने आदिवासी समाज और बंगाली हिन्दुओं के बीच सामंजस्य बनाने की भी चुनौती होगी.

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फिलहाल हिन्दू बहुल त्रिपुरा में बीजेपी की जीत हिंदुत्ववादी ताकतों के लिए टॉनिक समान है, जहां हिंदुत्व की राजनीति के आगे बढ़ने की पर्याप्त संभावना है. लेकिन ईसाई बहुल मेघालय और नागालैंड की परिस्थितियां त्रिपुरा से अलग हैं. हिंदुत्व की राजनीति के लिए यहां की जमीन उर्वर नहीं है. वैसे बांग्लादेशी घुसपैठिये के मसले पर बीजेपी मेघालय में अपनी जमीन मजबूत कर सकती है, लेकिन इत्मिनान के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि यह राजनीति बहुत आगे जा पाएगी. यह इस बात पर निर्भर करेगी कि वहां का ईसाई समाज इसे कितनी गंभीरता से लेता है. अगर राष्ट्रीय सुरक्षा के बजाय उसमें हिंदुत्व का कोई एजेंडा उन्हें दिखाई पड़ेगा, तो वह इसे समर्थन नहीं देगा. मौजूदा चुनाव परिणाम पर भी बीजेपी को बहुत इतराने का कारण नहीं दिखाई पड़ता. अभी बीजेपी को वहां दो सीटें मिली हैं, जो 2003 में भी उसे मिल चुकी हैं. हां, मत प्रतिशत के हिसाब से इसमें करीब दोगुना बढ़ोतरी हुई है. हिन्दुओं की वहां जितनी आबादी है, उसके मद्देनजर यह उपयुक्त ही माना जाएगा, लेकिन करीब 10 प्रतिशत मत ऐसा नहीं है, जिस पर ज्यादा उत्साहित हुआ जा सकता है.

ऐसा प्रतीत होता है कि ईसाई समाज में बीजेपी को लेकर अब भी हिचक बरकरार है. बीजेपी के लिए संतोष की बात यह है कि अपने तमाम प्रयास के बावजूद कांग्रेस ईसाई मतदाताओं को पहले की भांति नहीं जोड़ पाई, उसमें कुछ कमी देखी गई. उल्टे बीजेपी ही नहीं, उसकी सहयोगी क्षेत्रीय पार्टी एनपीपी को ईसाई समाज का समर्थन मिला.

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नागालैंड में हिंदुत्व की राजनीति करना मेघालय से भी ज्यादा कठिन है. यहां मेघालय की तुलना में आनुपातिक दृष्टि से ईसाइयों की संख्या ज्यादा है, तो हिन्दुओं की कम. यहां हिंदुत्व की राजनीति के लिए बांग्लादेशी घुसपैठिये जैसा संवदेनशील मुद्दा भी उपलब्ध नहीं है. इसके बावजूद यहां बीजेपी का प्रदर्शन मेघालय से बेहतर रहा. हालांकि एनपीएफ का प्रदर्शन पिछले चुनाव की तरह नहीं रहा, फिर भी उसे बुरा नहीं माना जा सकता. चिंताजनक स्थिति कांग्रेस की रही, जिसे एक भी सीट नहीं मिली, और तो और मत प्रतिशत भी गिरकर दो तक पहुंच गया.

बीजेपी के इस प्रदर्शन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्रेय दिया जा सकता है, जिनके वादों पर उत्तर-पूर्व भारत अब भी विश्वास कर रहा है. मोदी के तहत उत्तर-पूर्व भारत में बीजेपी की उपलब्धियां वाजपेयी के शासन काल से भी ज्यादा हैं. पर इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके कई आनुषांगिक संगठन (वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, विद्या भारती इत्यादि) पिछले कई वर्षों से विभिन्न प्रकार के सेवाकार्यों के जरिये स्थानीय आबादी में अपने लिए जगह बना रहे हैं. हालांकि स्थानीय समाज, खासकर ईसाई समाज में पैठ बनाना आसान नहीं था, फिर भी संघ के स्वयंसेवक अपने संगठन के बारे में उनमें व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने में एक हद तक सफल रहे. इस तरह मौन भाव से हिंदुत्व की राजनीति के लिए जमीन तैयार होती रही, जिसका लाभ बीजेपी को अब मिल रहा है. लेकिन इसकी दशा-दिशा क्या होगी, अभी निर्णायक तौर पर कहना कठिन है.

अभी उत्तर-पूर्व में हिंदुत्व के सामने कई चुनौतियां हैं और इसी में उसकी सीमाएं भी छिपी हुई हैं. पहली बात तो यह कि चर्च की बीजेपी-संघ के प्रति शंका बरकरार है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्हें आशंका है कि ये उनकी धार्मिक आस्था में हस्तक्षेप करने के अलावा ऐसे नियम-कानून बनवा सकते हैं, जिससे उनके द्वारा संचालित स्कूलों के प्रशासन में वे हस्तक्षेप कर सकें और विदेशी फंडिंग रुकवा सकें. उन्हें यह भी डर सता रहा है कि ये गैर-ईसाई आदिवासियों को गोलबंद कर सकते हैं. बीजेपी-संघ के अधिकारी इन आशंकाओं के निराकरण स्वरूप बार-बार यही कहते आ रहे हैं कि संघ स्थानीय रीति-रिवाजों, परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं को बनाए रखने का पक्षधर है, वह किसी पर हिंदुत्व थोपने के पक्ष में नहीं है. शायद यह एक कारण रहा होगा, जिसके चलते चुनाव में गोमांस प्रतिबंध मुद्दा नहीं बन पाया, जबकि इस बार के चुनाव में पहले की अपेक्षा धर्म का ज्यादा इस्तेमाल किया गया. जाहिर है यहां टकराव के कारण मौजूद हैं. ऐसे में बीजेपी-संघ एक ऐसी राजनीतिक-सांस्कृतिक तस्वीर पेश कर रहे हैं, जिससे स्थानीय आबादी को हिन्दू राष्ट्रवादी धारा में जोड़ा जा सके. इसमें यह कोशिश रहेगी कि उनकी पहचान सुरक्षित रहे, लेकिन यहां पेंच यह है कि स्थानीय आबादी को जोड़ने के क्रम में कहीं ये अपने मूल से ही न भटक जाएं. अगर ऐसा होगा, तो इन्हें अपने मूल स्थान में ही सवालों का सामना करना पड़ सकता है.

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)