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चोट के डर से मां ने छुड़ाई थी मार्शल आर्ट्स, फिर देश को मिली 'गोल्डन गर्ल' मनु भाकर

18 साल की उम्र में 'अर्जुन अवॉर्ड' पाने वाली मनु भाकर की निगाहें अगले साल के टोक्यो ओलंपिक पर है. उन्हें उम्मीद है कि टोक्यों में उन्हें मेडल जरूर मिलेगा.

चोट के डर से मां ने छुड़ाई थी मार्शल आर्ट्स, फिर देश को मिली 'गोल्डन गर्ल' मनु भाकर
भारतीय निशानेबाज मनु भाकर. (फोटो-Twitter/@realmanubhaker)

नई दिल्ली. किसी एक खेल का नुकसान दूसरे खेल के लिए फायदा बनने के कई उदाहरण आपने देखे होंगे. महेंद्र सिंह धोनी की फुटबॉल छुड़ाकर कोच ने क्रिकेटर नहीं बनाया होता या युवराज सिंह की स्केटिंग छुड़ाकर पापा योगराज सिंह ने क्रिकेट का बल्ला नहीं थमाया होता तो भारतीय क्रिकेट को ये दो दिग्गज क्रिकेटर नहीं मिले होते. कुछ ऐसी ही कहानी युवा निशानेबाज मनु भाकर (Manu Bhaker) की भी है. बचपन में मार्शल आर्ट में अपने जौहर दिखाने वाली मनु को एक बार चोट क्या लगी कि मां ने वो खेल ही छुड़वा दिया. फिर मनु के हाथ में आई पिस्टल और देश को मिल गई वो "गोल्डन गर्ल" जो निशानेबाजी के लिए रेंज में उतरने के बाद पदक लेकर ही वापस लौटती है.
 

बचपन से ही थी खेलों में तेज
हरियाणा को कन्या भ्रूण के मामले में बेहद पिछड़ा राज्य माना जाता है, लेकिन ये भी सच है कि उसी राज्य से सबसे ज्यादा महिला खिलाड़ी देश का नाम रोशन करती हैं. इनमें से एक मनु भाकर है. मनु का जन्म 18 फरवरी, 2002 को झज्जर जिले के गोरिया गांव में हुआ था. मनु के पिता रामकिशन भाकर मैरीन इंजीनियर हैं तो उनके दादा राजकरण भारतीय सेना में थे और 1962 में चीन के खिलाफ तथा 1965 व 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में हिस्सेदारी कर चुके थे. मनु बचपन से ही खेलों में तेजतर्रार थी. 14 साल की उम्र तक ही मनु ने मणिपुरी मार्शल आर्ट, बॉक्सिंग और स्केटिंग में कई राष्ट्रीय स्तर की स्कूल प्रतियोगिताओं में मेडल जीता था. वो अपना करियर मार्शल आर्ट में बनाना चाहती थी. 

चोट लगी और मां ने छुड़ा दिए सभी खेल
मार्शल आर्ट का अभ्यास करने के दौरान एक दिन मनु को चोट लगी और उनकी मां सुमेधा ने वे सभी खेल छुड़वा दिए, जिनमें चोट लगने का डर होता है. तब मनु ने निशानेबाजी रेंज का रुख किया. वहां पहली बार में ही मनु ने शानदार निशाना लगाया, जिसमें उसे बेहद मजा आया और उस दिन से मनु इसी खेल में डूब गई.

Manu Bhaker

 

स्कूल की रेंज पर रोजाना 10 घंटे अभ्यास
मनु गोरिया गांव के यूनिवर्सल पब्लिक स्कूल में पढ़ती थी, जहां छोटी सी रेंज थी. मनु को इस रेंज पर निशानेबाजी में इतना मजा आ रहा था कि वो स्कूल टाइम के बाद भी 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा का अभ्यास करती रहती थी. कई बार उसका अभ्यास 10 घंटे से भी ज्यादा का हो जाता था. उसकी इस मेहनत को देखकर पापा ने 1.5 लाख रुपये की पिस्टल दिलाई तो मेहनत और ज्यादा बढ़ गई. इस मेहनत की बदौलत मनु ने 2017 के राष्ट्रीय खेलों में केरल की धरती पर 9 गोल्ड मेडल जीतकर तहलका मचा दिया. इसके बाद तो सफर पदकों की कतार में जारी ही है.

जीत चुकी है ओलंपिक कोटा, वर्ल्ड कप में जीते हैं 6 गोल्ड
2018 में पहली बार सीनियर लेवल पर देश के लिए खेलने वाली मनु ने दो साल में ही करीब 26 इंटरनेशनल पदक जीते हैं, जिनमें 6 वर्ल्ड कप गोल्ड भी शामिल हैं. टोक्यो ओलंपिक के लिए कोटा जीत चुकी मनु ने दो वर्ल्ड कप फाइनल (पूरे साल के चार वर्ल्ड कप के विजेताओं की फाइनल प्रतियोगिता) में भी गोल्ड जीत चुकी हैं. यूथ ओलंपिक-2018 में एक गोल्ड व एक सिल्वर मेडल जीतने वाली मनु ने गोल्डकोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में भी गोल्ड मेडल अपने नाम किया है.

 

 

बाल पुरस्कार नहीं मिलने से थी दुखी, मिल गया अर्जुन अवॉर्ड
मनु की मां सुमेधा का कहना है कि मनु को 2020 के राष्ट्रीय बाल पुरस्कारों की सूची में अपना नाम नहीं होने से बेहद दुखी थी. लेकिन उन्हें इससे भी बड़ा अर्जुन अवॉर्ड मिल गया. अब मनु के निशाने पर अगले साल होने वाले टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतना है.