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वायु प्रदूषण और कोरोना के बीच है गहरा संबंध, जानें क्या कहते हैं अध्ययन

क्या कोरोना (Coronavirus) का प्रदूषण से कोई संबंध है? इस सवाल का जवाब है ‘हां’. हाल ही में हुए दो अध्ययन बताते हैं कि वायु प्रदूषण ग्रस्त इलाकों में रहने वालों के कोरोना की चपेट में आकर जान गंवाने का खतरा सबसे ज्यादा है.

वायु प्रदूषण और कोरोना के बीच है गहरा संबंध, जानें क्या कहते हैं अध्ययन
फाइल फोटो

नई दिल्ली: क्या कोरोना (Coronavirus) का प्रदूषण से कोई संबंध है? इस सवाल का जवाब है ‘हां’. हाल ही में हुए दो अध्ययन बताते हैं कि वायु प्रदूषण ग्रस्त इलाकों में रहने वालों के कोरोना की चपेट में आकर जान गंवाने का खतरा सबसे ज्यादा है. पहला अध्ययन जर्मनी की मार्टिन लूथर यूनिवर्सिटी हाले-विटनबर्ग (MLU) के साइंस ऑफ़ टोटल एनवायरनमेंट जर्नल में प्रकाशित हुआ है. जिसमें वायु प्रदूषण और COVID-19 से हुई मौतों के रिश्तों को उजागर किया गया है. अध्ययन से पता चलता है कि ऐसे क्षेत्रों में जहां नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर स्थायी रूप से अधिक था, वहां दूसरे क्षेत्रों की तुलना में मरीजों की मौतें अधिक हुईं. 

नाइट्रोजन डाइऑक्साइड एक वायु प्रदूषक है जो मनुष्य के श्वसन पथ (respiratory tract) को नुकसान पहुंचाता है. इसके चलते कई प्रकार के श्वसन और हृदय संबंधी रोग होते हैं. यह आमतौर पर कारों, बिजली संयंत्रों और अन्य औद्योगिक कारखानों में ईंधन के दहन से बड़े पैमाने पर उत्पन्न होता है. अध्ययन के दौरान यूरोप के ऐसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जो कोरोना वायरस के हॉटस्पॉट थे और जहां वायु प्रदूषण बाकी इलाकों की तुलना में काफी ज्यादा था. शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन इलाकों में वायु प्रदूषण अधिक था, वहां कोरोना संक्रमित मरीजों की मौत के मामले भी ज्यादा रहे. 

दूसरे अध्ययन में, हार्वर्ड टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ (Harvard TH Chan School of Public Health) के शोधकर्ताओं ने संयुक्त राज्य में कोरोना वायरस से मौतों का विश्लेषण किया. इस दौरान उन्होंने पाया कि ऐसे संक्रमित मरीज जो लंबे समय से PM 2.5 के उच्च स्तर में रह रहे हैं, उनकी मौत की आशंका ज्यादा रहती है. शोधकर्ताओं के मुताबिक, सालों तक अधिक वायु प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहने वालों के लिए कोरोना से मौत का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में काफी ज्यादा है. वायु प्रदूषण में थोड़ी सी वृद्धि भी COVID-19 से मृत्यु दर को बढ़ा सकती है.

अध्ययन को अंजाम देने के लिए, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 4 अप्रैल तक संयुक्त राज्य अमेरिका की लगभग 3,000 काउंटियों का डेटा एकत्र किया और इसमें सूक्ष्म प्रदूषक कणों के स्तर की तुलना प्रत्येक क्षेत्र में कोरोना से हुई मौतों से की गई. यह दोनों अध्ययन ऐसे सामने सामने आये हैं, जब वैज्ञानिक कोरोना वायरस के मामलों और वायु प्रदूषण के बीच संभावित कनेक्शन की तलाश कर रहे हैं. एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका, जहां आमतौर पर प्रदूषण स्तर सबसे अधिक है, वहां की सरकारें महामारी को रोकने के लिए ज्यादा संघर्ष करती नजर आ रही हैं. 

इन दोनों अध्ययनों से यह साबित होता है कि अगर कोरोना से मौत के आंकड़ों को नियंत्रित रखना है, तो वायु प्रदूषण को भी नियंत्रित करना होगा. हालांकि, लॉकडाउन जैसे उपायों के चलते प्रदूषण स्तर में कमी देखने को मिली है.  

 

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