close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

तुर्की: यूरोप और अरब देशों के बीच उलझा यह देश पाकिस्तान समर्थक था, आज है भारत के साथ

तुर्की ऐसा देश है जो आधा एशिया और आधा यूरोप में आता है. यहां की राजनीति में दोनों महाद्वीपों का अंतरद्वंद भी झलकता है.

तुर्की: यूरोप और अरब देशों के बीच उलझा यह देश पाकिस्तान समर्थक था, आज है भारत के साथ
तुर्की की भौगोलिक स्थिति उसे दुनिया में एक अंतरराष्ट्रीय महत्व देती है. (फोटो: Reuters)

नई दिल्ली: तुर्की आज दुनिया का ऐसा देश है जो इस्लाम बहुल देश होने के बावजूद एक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है. यहां के ज्यादातर लोग मुस्लिम हैं लेकिन इसके बाद भी यहां की शासन व्यवस्था में इस्लाम या धार्मिक दखल नहीं है. आज यह देश कट्टर इस्लामी देशों, खासकर अरब देशों का विरोध झेल रहा है, लेकिन फिर भी आज तुर्की अपनी खास संस्कृति को बचाए रखते हुए दुनिया में अपना वजूद मजबूती से कायम रखे हुए है. इन दिनों तुर्की को अमेरिका की नाराजगी झेलनी पड़ रही है. आंतरिक राजनैतिक संघर्ष बरसों से जारी है. आर्थिक स्थिति चिंताजनक है. हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ-साथ तुर्की को भी अमेरिका की जीएसपी सूची से हटाने की वकालत की है. 

पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच स्थित यह देश भौगोलिक रूप से दोनों ही महाद्वीप में आता है. इनमें से ज्यादातर इलाका एशिया में आता है. तुर्की की आधिकारिक नाम रिपब्लिक ऑफ टर्की यानि तुर्क गणराज्य है. कभी ओटोमन साम्राज्य का केंद्र बिंदु रहे तुर्की को कामाल अतातुर्क ने 1920 के दशक में आधुनिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाया. इस क्षेत्र में यूरोप और पश्चिम एशिया दोनों का ही प्रभाव रहा यही वजह से काफी समय से यह क्षेत्र संघर्ष में उलझा रहा. ईसाईयों और मुस्लिमों के बीच संघर्ष के बीच य़ह देश हमेशा ही पिसा है. भू-रणनीतिक रूप से यह क्षेत्र बहुत अहम है. यूरोप और एशिया के लिए लंबे समय तक यह एक दूसरे का प्रवेश द्वार रहा है. 

Turkey protests

भौगोलिक स्थिति
तुर्की उत्तर में काला सागर, उत्तर पूर्व में जार्जिया, उत्तर पश्चिम में बुल्गारिया, पश्चिम में एजियन सागर, दक्षिण में भूम्ध्य सागर, दक्षिण पूर्व में सीरिया एवं इराक और पश्चिम में ईरान एवं अर्मेनिया से घिरा है. 780,580 वर्ग किलोमीटर (300,948 वर्ग मील) के क्षेत्र में घिरा यह देश प्रमुख रूप से पहाड़ों को देश है जहां के ज्यादाकर पर्वतीय क्षेत्र पूर्वी इलाके में हैं जिसे अर्मेनिया की उच्चभूमि कहा जाता है. केवल तटीय क्षेत्रों के पास (ज्यादातर पश्चिम में) ही यहां की निम्म भूमि पाई जाती है. यह क्षेत्र बाल्कन, मध्य पूर्व और पूर्वी भूमध्यसागरीय इलाकों के मिलने वाले स्थान में है. वही मध्य में एंतोलिया का पठार है. उत्तर पश्चिम में बाल्कल का दक्षिण पूर्व क्षेत्र थ्रास कहलाता है जो कि यूरोप का हिस्सा है. 

संक्षिप्त इतिहास
हजारों साल पहले यहां मानव के होने के अवशेष प्राप्त हुए हैं. 1900 ई.पू के बाद से एंतोलिया क्षेत्र में हिट्टी साम्राज्य का प्रभुत्व था. कहा जाता है की 12वी ई.पू. सदी में यहां ट्रॉय नाम का मशहूर शहर था जिस ग्रीक वासियों ने नष्ट कर दिया था. उस समय से यवनों का इस क्षेत्र में वर्चस्व बढ़ने लगा था. छठी ईसा पूर्व सदी में फारस के शाह ने इस यहां कब्जा किया और चौथी सदी में सिकंदर के उदय तक यहां राज किया. सिकंदर के बाद दूसरी सदी तक यह इलाका रोमन साम्राज्य में मिला लिया गया. इसके बाद से लंबे समय तक यहां ईसाइयों का प्रभाव रहा. यह क्षेत्र 12वीं सदी तक बेजेंटाइन साम्राज्य का हिस्सा रहा. इसी बीच इस्लाम का प्रभाव भी यहां रहा और अरबों ने भी कुछ समय तक यहां राज किया, लेकिन यह ज्यादातर बेजेंटाइन के कब्जे में रहा. 11वीं सदी में यहां इस्लाम और तुर्की भाषा का प्रसार हुआ और 14वीं सदी तक अंतोलिया प्रायद्वीप ओटोमन साम्राज्य का प्रभुत्व बढ़ता गया.

यह भी पढ़ें:  ईरान: अमेरिका का दुश्मन लेकिन भारत का दोस्त है यह इस्लामिक देश

20वीं सदी का आरंभ और खिलाफत आंदोलन
बीसवीं सदी की शुरुआत से ही तुर्की में युवा तुर्क क्रांति के चलते बदालाव का माहौल बनने लगा था. लेकिन इस आंदोलन को तुर्की सेना ने दबा दिया. 1912 तुर्की के खिलाफ इटली और बाल्कन युद्धों में ब्रिटेन का आना. मुस्लिम देशों को उनकी इस्लामी संस्कृति पर हमला लगा. दुनिया भर में ब्रिटेन को इसका विरोध झेलना पड़ा. इसमें भारत के मुसलमान भी अंग्रेजों से नाराज हो गए. प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने जर्मनी का साथ दिया जिससे उसके खिलाफ ब्रिटेन ने इस यु्द्ध में भी लड़ाई की. इससे भारतीय मुसलमानों की अंग्रेजों के प्रति नाराजगी और बढ़ गई. 1919 में के हुई जलियांवाला बाग हत्याकांड, रोलैट एक्ट जैसी कई घटनाओं ने भारत में ब्रिटेन के विरोध में एक बड़ा जनमानस तैयार कर दिया. ऐसे में तुर्की में (सुन्नी) इस्लाम के मुखिया माने जाने वाले वहां के ख़लीफ़ा के पद की पुन:स्थापना कराने के लिये अंग्रेज़ों पर दबाव बनाने के लिए खिलाफत आंदोलन की भारत में शुरुआत में आजादी की भावनाएं भी इसमें शामिल हो जाने से गांधी जी ने इस आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार कर लिया. यहां तक कि सितंबर 1920 में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन ने असहयोग आंदोलन में दो बड़ी मांगे रखीं, स्वराज्य और खिलाफत आंदोलन संबंधी मांग. 1922 में मुस्तफा कमाल पाशा ने खलीफा पद के राजनैतिक अधिकार काफी कम कर दिए और अंग्रेजों के खिलाफ यह खिलाफत आंदोलन धीरे-धीरे खुद ही खत्म हो गया. 

आधुनिक तुर्की
1919 में मुस्तफ़ा कमाल पाशा (अतातुर्क) ने देश के आधुनिकीकरण की शुरुआत की. उन्होंने शिक्षा, प्रशासन, धर्म इत्यादि के क्षेत्रों में पारम्परिकता छोड़ी और तुर्की को आधुनिक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया. दूसरे विश्वयुद्ध में टर्की तटस्थ रहा. 1945 में संयुक्त राष्ट्रसंघ का सदस्य बनने के बाद से तुर्की नाटो और बाल्कन पैक्ट का सदस्य है. 1950 से 1960 के बीच यहां लोकतंत्र रहा. जिसके बाद यहां सेना ने जनरल गुरसैल के नेतृत्व में तख्त पलट कर नया संविधान लागू किया गया और नई द्विसदनीय व्यवस्था (सीनेट और नेशनल असेंबली) लागू हुई जिसमें जनरल असेंबसी ने जरनल गुरसैल को राष्ट्रपति चुन लिया. इसके बाद के दौर में उदारीकरण और उन्नति का दौर देखा, लेकिन 1960 के अंतिम वर्षों में देश में हिंसा बढ़ने लगी.

यह भी पढ़ें: जानिए क्यों बदल गया ईरान और अब दे रहा है पाकिस्तान के खिलाफ भारत का साथ

1970 के बाद देश में सैन्य दखल बढ़ा और कमजोर सरकारें देश की राजनैतिक हिंसा पर लगाम नहीं लगा सकीं. इस दौरान महंगाई और बेरोजगारी में खासा इजाफा हुआ. 1980 में सैन्य तख्ता पलट के बाद एक बार फिर 1982 में देश को नया संविधान मिला. इसके बाद कुर्दिस्तान की मांग उठी और कुर्द मूल के लोगों ने हिंसा का रास्ता अपना लिया. इस हिंसा को दबाने के लिए सेना को आगे आना पड़ा. 

21वीं सदी में तुर्की
तुर्की में आंतरिक राजनैतिक संघर्ष  21वीं सदी में भी जारी रहा. यूरोपीय यूनियन की सदस्यता के लिए प्रयास, अमेरिका को इराक युद्ध में अपनी जमीन का उपय़ोग करने न देना, इस्तानबुल में आतंकी हमला, नई लीरा मुद्रा का चलन, 2010 के बाद तुर्की सीमा पर सीरियाई शरणार्थियों का जमवाड़ा, संवैधानिक सुधार, कुर्द भाषा को मान्यता जैसे कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिले. 2014 में प्रधानमंत्री रजब तैयब एर्दोगान देश के पहले राष्ट्रपति चुने गए. इसके बाद से एर्दोगान अपनी शक्तियां बढ़ाने के लिए जनमत संग्रह कराने में विफल रहे पर उन्हें 2017 में कम अंतर से जनमत संग्रह जीतने में सफलता भी मिली.  इस बीच तुर्की ने सीरिया में आईसिस के खिलाफ हमला बोल दिया और बाद में कुर्द विद्रोहियों पर भी कार्रवाई की. वहीं राष्ट्रपति एर्दोगान ने एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया है. 

Jamal Khashoggi

आज तुर्की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है. यहां के संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का वादा किया गया है. मुसलमानों में सुन्नी बहुसंख्यक हैं. यहां की भाषा तुर्की है जिसमें 1928 के भाषासुधार आंदोलन के बाद से अरबी लिपि की जगह रोमन लिपि का उपयोग होने लगा. यहां की आबादी लगभग 8 करोड़ है. अंकारा यहां कि राजधानी है, लेकिन इस्तानबुल यहां का प्रमुख शहर है जो एशिया और यूरोप को जोड़ता है. 

अर्थव्यवस्था
तुर्क लीरा य़हां की मुद्रा है. यहां के प्रमुख उद्योगों में कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण, ऑटोमोबाइल, कोयला, तांबा, स्टील पेट्रोलियम, निर्माण शामिल हैं. इसके अलावा कृषि उत्पादों में तंबाखू, कपास, अनाज आदि शामिल है. पिछले कुछ समय से यहां की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है. तुर्की आज यूरोप का सबसे बड़ा पर्यटन स्थल माना जाता है. 2018 में तुर्क लीरा की कीमत में भारी (40%) गिरावट आई. इसके अलावा उसके अमेरिका से रिश्तों में भी तल्खी आई. हाल ही में अमेरिका ने उससे जीएसपी (जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफ्ररेंस) का दर्जा छीनने की बात की है.  

वर्तमान परिदृश्य
आज तुर्की कई तरफ से समस्याओं से जूझ रहा है. पूर्व में कुर्द विद्रोहियों को कुचलने उसके प्रयासों को अमेरिका से तीखी चेतावनियां मिल रही है. अर्थव्यवस्था की हालत खराब है. आर्थिक मंदी चरम पर है, बेरोजगारी और महंगाई बढ़ने से असंतोष बढ़ रहा है. आंतरिक राजनैतिक संघर्ष आज भी जारी है. अमेरिका और अपने पड़ोसियों से खास तौर पर पश्चिम एशियाई देशों से भी उसके संबंध अच्छे नहीं हैं. सऊदी अरब मूल के पत्रकार जमाल खाशोगी की अपने ही देश में ही हत्या से तुर्की तिलमिलाया हुआ है. तुर्की पश्चिम एशिया में अमेरिका का दखल पसंद नहीं करता है. नाटो का सदस्य होने के बाद भी इन दिनों तुर्की की अमेरिका से नाराजगी और रूस के साथ नजदीकी है. उसके इलाके में कुर्द विद्रोहियों का अमेरिका को समर्थन हासिल है क्योंकि उन्होंने आईसिस के खिलाफ अमेरिका और सीरीया सरकार की मदद थी. 

भारत और तुर्की
भारत और तुर्की के बीच पहले अच्छे संबंध नहीं रहे थे. शीत युद्ध में तुर्की अमेरिका का साथी रहा था जबकि भारत का गुटनिरपेक्ष देश होना तुर्की से दूरियां बढ़ाने की वजह रहा. वह भारत की परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता के दावे का भी विरोध करता रहा है.  इसके अलावा तुर्की पाकिस्तान का घोर समर्थक रहा है. उसने खुल कर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन किया है. पर अब हालात काफी अलग हैं. अब दोनों देशो के साझा रणनीतिक लक्ष्य हैं. अब दोनों देशों के बीच शिक्षा, तकनीकी और व्यापार में सहयोग बढ़ा है. अब कश्मीर मुद्दे पर तुर्की भारत के साथ है. दोनों देश जी20 के सदस्य हैं आपसी व्यापार तेजी से बढ़ रहा है. आज तुर्की भी भारत की तरह आतंकवादी हमलों का शिकार है.