चुनावी समर में घोषणापत्र और उनके अधूरे रहने की कहानी! पढ़ें पूरा सच

चाहे चुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का. राजनीतिक दल चुनावी घोषणापत्र घोषित करके मतदाताओं को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. लेकिन इन घोषणापत्र के कुछ वायदे ही पूरे हो पाते हैं.

चुनावी समर में घोषणापत्र और उनके अधूरे रहने की कहानी! पढ़ें पूरा सच

नई दिल्ली: महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सभी राजनीतिक दल अपने अपने घोषणापत्र(Manifesto)जारी कर रहे हैं. जहां आज हरियाणा में भाजपा ने अपना संकल्प पत्र जारी किया, वहीं बीते दिनों शिवसेना, कांग्रेस ने भी अपने-अपने घोषणापत्र जारी किए. सभी घोषणापत्रों में मतदाताओं को रिझाने के लिए तरह-तरह के लोकलुभावन वायदे किए गए. लेकिन क्या घोषणापत्र वादों का पन्नाभर है. 

क्या है मैनिफेस्टो या घोषणापत्र

Manifesto इटली का शब्द है, जो लैटिन भाषा के manifestum शब्द से बना है. 'मैनीफेस्टो' शब्द का पहली बार प्रयोग अंग्रेजी में 1620 में हुआ था. 'हिस्ट्री ऑफ द कौंसिल ऑफ ट्रेंट' नामक पुस्तक में इसका जिक्र मिलता है. इस पुस्तक को पावलो सार्पी ने लिखा था. मैनीफेस्टो' शब्द का अर्थ दरअसल 'जनता के सिद्धान्त और इरादे' से जुड़ा है पर लोकतांत्रिक समाज में यह राजनीतिक दलों से जुड़ गया है. विश्व प्रसिद्ध चिंतक कार्ल मा‌र्क्स की तथा फ्रेड्रिक एंजिल्स की 1848 में छपी चर्चित पुस्तक 'द कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो' से पहले भी इस तरह का मैनिफेस्टो निकल चुका था पर वह किसी राजनीतिक पार्टी का घोषणा-पत्र नहीं था. मा‌र्क्स ने अपने घोषणा-पत्र में दुनिया को बदलने का सपना देखा था. लैटिन अमेरिका के क्रांतिकारी साइमन वोलीवर ने 1812 में ही 'कार्टेगेना मैनीफेस्टो' लिखा था. आधुनिक भारत का पहला घोषणापत्र राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 1907 में छपी पुस्तक 'हिन्द स्वराज' को माना जाता है. '

घोषणापत्र औपचारिकताभर
कई मायनों में घोषणापत्र एक औपचारिकता भर होता है और अक्सर यह राजनीतिक दलों के फोटो खिंचवाने से ज्यादा कुछ नहीं होता. घोषणापत्र जारी करने में अक्सर देरी की जाती है. ताकि मतदाताओं को घोषणापत्र में दिए गए विकल्पों को देखने के लिए समय नहीं मिले. भारत के अधिकांश हिस्सों में मतदान जाति व्यवस्था और पार्टी के प्रति व्यक्तिगत पसंद के आधार पर होता है. तर्क के आधार पर मतदाताओं को चुनने के लिए केवल सीमित भूमिका होती है.

कांग्रेस ने नहीं किए अपने वादे पूरे
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने किसान कर्जमाफ करने का वादा किया था, लेकिन वह अभी तक पूरा नहीं हुआ. ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार पर अपना वादा पूरा नहीं करने की बात कह चुके हैं. हालांकि यह केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है, ऐसा ही ज्यादातर पार्टियों के साथ होता है कि वह सत्ता में आने पर अपने वादे पूरे नहीं कर पातीं. 

इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी ने भी आज ही हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए अपना संकल्प पत्र जारी किया है. इसमें भी किसानों की आय दोगुनी करने की बात कही गई है. और इसका लक्ष्य 2022 तक रखा गया है. ऐसे में कांग्रेस हो, भाजपा हो या फिर शिवसेना इनके चुनावी वायदे कितने धरातल पर उतरते हैं. ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

48 घंटे की अवधि में जारी नहीं किया जा सकता

मार्च में चुनाव आयोग ने चुनाव आचार संहिता के नियमों में घोषणापत्र संबंधी प्रावधानों को जोड़ा और कहा कि मतदान से दो दिन पहले तक ही राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र जारी कर सकेंगे. आयोग ने यह भी साफ किया था कि प्रचार अभियान थमने के बाद मतदान से 48 घंटे पहले की अवधि में घोषणा पत्र जारी नहीं किया जा सकेगा.

दलों को उत्तरदायी ठहराने का कोई कानून नहीं

चुनावी वादों को पूरा करने की दर भी बहुत कम है और सत्ता में आने के बाद अपने घोषणापत्र से मुकरने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों की आलोचना की जाती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि चुनावी घोषणापत्र कानूनी रूप से लागू करने योग्य दस्तावेज नहीं हैं. 2015 में, भारत के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू और न्यायमूर्ति अमिताव रॉय की खंडपीठ ने इस विषय पर अधिवक्ता मिथिलेश कुमार पांडे द्वारा दायर एक याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था. खंडपीठ ने कहा था कि कानून में कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत राजनीतिक दलों को वादे पूरे नहीं करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सके. जो कि उन्होंने अपने चुनाव घोषणापत्र में बनाया था. 

मुफ्त का वितरण लोगों को प्रभावित करता है

2013 में, भारतीय चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए के आदेश का पालन करते हुए आदर्श आचार संहिता (MCC) में चुनाव घोषणापत्र पर दिशा-निर्देश जोड़े थे. एस सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार और अन्य (जुलाई 2013) में जस्टिस पी. सतशिवम और रंजन गोगोई की खंडपीठ ने फैसला सुनाया था कि किसी भी तरह के मुफ्त का वितरण, निस्संदेह सभी लोगों को प्रभावित करता है. और बड़े पैमाने पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की जड़ को हिलाता है.

सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि ऐसा कोई विधान नहीं है जो सीधे चुनाव घोषणापत्र की सामग्री को नियंत्रित करता है. अदालत ने चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के साथ परामर्श करके दिशा निर्देश तय करने को कहा था. यह भी सुझाव दिया गया था कि राजनीतिक दल द्वारा जारी किए गए चुनावी घोषणापत्र के लिए अलग से दिशानिर्देशों बनाए जाएं. इन दिशानिर्देशों को राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए आदर्श आचार संहिता में भी शामिल किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चुनाव आयोग राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों से मुलाकात की और उसके बाद आदर्श आचार संहिता के भाग आठ में कुछ दिशानिर्देशों को शामिल किया. 

1. चुनाव घोषणापत्र में संविधान में निहित आदर्शों और सिद्धांतों के विपरीत कुछ भी शामिल नहीं होगा और यह आदर्श आचार संहिता के अनुरूप होगा.

2. संविधान में निहित राज्य के नीति निर्देशक तत्व नागरिकों के लिए विभिन्न कल्याणकारी उपायों की रूपरेखा तैयार करने के लिए हैं और इसलिए चुनावी घोषणापत्र में इस तरह के कल्याणकारी उपायों के वादे पर कोई आपत्ति नहीं की जाएगी. हालांकि, राजनीतिक दलों को उन वादों को करने से बचना चाहिए, जो चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता को कम करने की संभावना रखते हैं या अपने मताधिकार का प्रयोग करने में मतदाताओं पर अनुचित प्रभाव डालते हैं.

3. पारदर्शिता के मद्देनजर यह अपेक्षा की जाती है कि घोषणापत्र भी वादों के औचित्य को दर्शाएंगे और यह भी कि इन वादों को पूरा करने के लिए वित्तीय आवश्यकताओं से पूरा होते हैं कि नहीं. उन वादों को ही किया जाना चाहिए, जो पूरे हो सकते हैं, ताकि मतदाताओं का विश्वास प्राप्त किया जा सके. 

घोषणापत्र जारी करने के लिए कुछ समय-सीमा भी निर्धारित की गई है

1. जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 की धारा 126 के अनुसार, एक चरण में होने वाले चुनाव में, घोषणापत्र प्रोहिबिटरी पीरियड(निषेधात्मक अवधि) के दौरान जारी नहीं किया जाएगा.

2. जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 की धारा 126 के अनुसार, कई चरणों में होने वाले चुनावों में निषेधात्मक अवधियों के दौरान घोषणापत्र जारी नहीं किया जाएगा. वहीं आरपी अधिनियम की धारा 126 के अनुसार, 'निषेधात्मक अवधि' चुनाव खत्म
 होने से पहले के 48 घंटे है.