शिवसेना के लिए 'भस्मासुर' बनते जा रहे हैं संजय राउत! पढ़े: 5 अहम सबूत

संजय राउत का बड़बोलापन महाराष्ट्र में गठबंधन के रिश्तों के लिए खतरा बनता जा रहा है. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे तक इस मसले में कुछ नहीं बोल रहे, लेकिन राउत बार हैं कि मानते ही नहीं. आखिर वह ये सब किसी के इशारे पर तो नहीं कर रहे है. हाल ही में उन्होंने शरद पवर से मुलाकात की थी  

शिवसेना के लिए 'भस्मासुर' बनते जा रहे हैं संजय राउत! पढ़े: 5 अहम सबूत

नई दिल्ली: जैसे-जैसे दिन बीतता जा रहा है महाराष्ट्र की सियासत और भी दिलचस्प होती जा रही है. प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी, और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन विराजमान होगा? इस सवाल का हर कोई बड़ी ही बेसब्री से इंतजार कर रहा है. जोड़-तोड़ और आंकड़ों को अपने पक्ष में करने का खेल चल रहा है. बहुमत से दूर भाजपा जहां शपथ ग्रहण की तैयारियों में जुटी है, तो वहीं शिवसेना ने बहुमत का जादुई आंकड़ा अपने पक्ष में होने का दावा कर दिया है. जो भी हो, संजय राउत दिन कुछ ऐसी बातें कर रहे हैं, जो शिवसेना-भाजपा के रिश्तों में खटास पैदा करने का काम कर रहे हैं.

संजय राउत कैसे दोनों पार्टियों के बीच के रिश्तों में दरार डालने की कोशिश कर रहे हैं इसक 5 अहम सबूत आपको बताते हैं.

सबूत नंबर 1

ये दावा कितना सच्चा?

महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा गठबंधन की मुश्किलें बढ़ाते दिख रहे राउत ने एक बार फिर अजीबो-गरीब दावा कर दिया है. शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि हमारे पास बहुमत का आंकड़ा है. अभी हमारे पास 170 विधायकों का समर्थन है, जो 175 तक पहुंच सकता है. उन्होंने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ ये बोला कि 'मैं आपको बता रहा हूं और मैं दावे के साथ कहता हूं. जल्द ही आपको पता चल जाएगा.'

सबूत नंबर 2

मुलाकात हुई, क्या बात हुई?

संजय राउत जिस भरोसे के साथ बहुमत का दावा कर रहे है. उससे ऐसे संकेत जा रहे हैं कि पार्टी की ओर से कोई ना कोई खिचड़ी तो पक रही है. गुरुवार को संजय राउत एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार से मिले थे. आज भी उन्होंने शरद पवार की जमकर तारीफ की है. जिसके बाद आज एनसीपी ने भी शिवसेना को समर्थन के संकेत दिए हैं. राउत ने कहा कि 'शरद पवार साहब महाराष्ट्र के लिए देश के लिए हमेशा एक बड़े अनुभवी नेता रहे हैं. हमने उसको देखा है, बाला साहेब के बाद या बालासाहेब थे तब भी उनका हमेशा आदर किया है. आज भी उनके जैसा बड़ा अनुभवी कद वाला नेता नहीं है. हम जब भी चाहें उनका मार्गदर्शन भी लेते हैं.' 

राफत यहीं नहीं रुके उन्होंने इसके साथ ही प्रदेश के हालात का जिक्र करते हुए ये तक कह दिया कि 'महाराष्ट्र में आज की जो स्थिति है परिस्थिति है जो चक्रव्यूह बना है ऐसा आपको लगता है. जो पेंच पड़ा है. उसके लिए अगर हम पवार साहब का मार्गदर्शन लेते हैं तो उसमें कुछ गलत नहीं है.'

सबूत नंबर 3

सामना के जरिए हमला

शिवसेना प्रवक्ता और सामना के एडिटर जितना मीडिया के माध्यम से भाजपा पर हमलावर हो रहे हैं. उतना ही उनके संपादन में छप रही पत्रिका में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है. शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में बीजेपी पर बड़े आरोप लगाए. शिवसेना ने साफ कर दिया है कि वो पिछली बार की तरह जल्दबाजी नहीं दिखाएगी और बीजेपी के सामने घुटने नहीं टेकेगी.

इसबार सामना में क्या लिखा?

शिवसेना ने सामना में लिखा है कि 'कलियुग ही झूठा है. सपने में दिया गया वचन पूरा करने के लिए राजा हरिश्चंद्र ने राजपाट छोड़ दिया. पिता द्वारा सौतेली मां को दिए गए वचन के कारण श्रीराम ने राज छोड़कर वनवास स्वीकार कर लिया. उसी हिंदुस्तान में दिए गए वचन से विमुख होने का ‘कार्य’ भारतीय जनता पार्टी ने पूरा कर दिया. ये सब एक मुख्यमंत्री पद के कारण हो रहा है और राज्य में सरकार बनाने की प्रक्रिया अधर में लटकी है.'

शिवसेना ना सिर्फ भाजपा पर झूठ बोलने का आरोप लगा रही है बल्कि अनैतिक तरीके से सरकार बनाने की कोशिश करने की तोहमत भी मढ़ रही है. सामना में ये भी लिखा है कि चुनाव से पहले ‘युति’ करते समय क्या करार हुआ था, वो महत्वपूर्ण है. श्री फडणवीस पहले निर्धारित शर्तों के अनुरूप शिवसेना को ढाई साल मुख्यमंत्री पद देने को तैयार नहीं हैं. पदों का समान बंटवारा ऐसा रिकॉर्ड पर बोले जाने का सबूत होने के बावजूद बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस पलटी मारते हैं और पुलिस, सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग की मदद से सरकार बनाने के लिए हाथ की सफाई दिखा रहे हैं. ये लोकतंत्र का कौन-सा उदाहरण है?

सबूत नंबर 4

कहीं इतिहास तो नहीं दोहरा रहा?

संजय राउत के ये तेवर इतिहास के एक पन्ने को याद दिलाने का काम कर रहा है. कई साल पहले की बात है, साल 1993 में संजय निरुपम शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादक बनाए गए थे. कुछ बीतने के बाद उन्होंने पार्टी लाइन से हटकर बागी तेवर अपना लिए. हालात ये हो गए थे कि हर कोई समझ ही नहीं पा रहा था, कि सामना में पार्टीलाइन के अलग बातें क्यों छप रही हैं. अप ऐसे में उस वक्त निरुपम को शिवसेना ने निकाल दिया था. संजय राउत के अलावा पार्टी का कोई बड़ा नेता आजकल इतनी बड़ी बातें नहीं बोल रहा है. लेकिन राउत हैं कि कभी अजीबो-गरीब पोस्टर साझा करते हैं. जिसमें शिवसेना पार्टी का निशान हाथ में कमल लिए गले में एनसीपी के निशान का माला पहना हुआ है. सिर्फ भाजपा पर ही नहीं, बल्कि पार्टी अध्यक्ष शाह को लेकर भी राउत ने सवाल खड़ा कर दिया. तो क्या राउत के तेवर इतिहास दोहराने का काम कर रहा है.

सबूत नंबर 5

ऐसा कहने वाले राउत कौन होते हैं?

संजय राउत भाजपा पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रहे हैं. जिनती शिवसेना नहीं भड़क रही है, उद्धव और अन्य नेता नहीं बोल रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा राउत का पारा चढ़ा हुआ है. राउत ने अब किसी भी फॉर्मूले पर बातचीत करने से इंकार कर दिया है. उनका कहना है कि अब बात होगी तो सिर्फ मुख्यमंत्री पद पर होगी वरना शिवसेना अपने दम पर बहुमत हासिल कर मुख्यमंत्री बनाएगी. संजय राउत ने कहा कि 'क्या शिवसेना बाजार में बैठी है? हमने बात की है मुख्यमंत्री पद की और मुख्यमंत्री पद पर ही चर्चा होगी. अगर नहीं होती है तो शिवसेना अपनी ताकत पर अपना मुख्यमंत्री बनाकर दिखाएगी.'

राउत ने ऐसा तो बोल दिया कि शिवसेना अपनी ताकत पर अपना मुख्यमंत्री बनाकर दिखाएगी, और चर्चा नहीं होगी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब पार्टी हाईकमान ने इसपर चुप्पी साध रखी है. हर कोई इस बात का इंतजार कर रहा है कि उद्धव ठाकरे और अमित शाह के बीच बात होगी तो उसमें क्या निकलकर आएगा. तो ये सब बोलने वाले संजय राउत कौन होते हैं?

चुनावी नतीजों में जैसे ही ये साफ हुआ था कि बीजेपी बहुमत से काफी दूर है और 2014 के मुकाबले उसकी सीटें काफी घट गई हैं. उसके बाद से ही राजनीतिक विश्लेषक मानने लगे थे कि शिवसेना अब बीजेपी की परीक्षा लेगी और वही हो रहा है. ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी शिवसेना के सामने घुटने टेकती है या फिर कोई और बड़ा सियासी उलटफेर सामने आता है. क्योंकि संजय राउत का बड़बोलापन दोनों पार्टी के रिश्तों पर असर जरूर डाल रहा है.