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शिवसेना के साथ गठबंधन का धर्म निभाना, क्या भाजपा को पड़ रहा है मंहगा?

महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन धर्म निभाने की क्या भाजपा को कीमत चुकानी पड़ेगी? ऐसा इसलिए माना जा रहा है क्योंकि सूबे में मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर भाजपा-शिवसेना में लंबे समय से मतभेद बरकरार है. यही वजह है कि नतीजों के साफ होने से पहले ही शिवसेना ने 50-50 फॉर्मूले की याद दिलाई है.

शिवसेना के साथ गठबंधन का धर्म निभाना, क्या भाजपा को पड़ रहा है मंहगा?

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के गठबंधन को लेकर तरह-तरह के हवा उड़ने लगे हैं. दरअसल, चुनावी नतीजों के रुझानों में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को बहुमत को मिलता दिखाई दे रहा है. लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर शिवसेना ने हेकड़ी दिखानी अभी से शुरू कर दी है. ऐसे में ये कहा जा रहा है कि कहीं शिवसेना से गठबंधन करके भाजपा ने गलती तो नहीं कर दी.

संजय राउत ने दोहराया 50-50 का फॉर्मूला

महाराष्ट्र में टिकट बंटवारे में बीजेपी को बड़ा भाई कबूल चुकी शिवसेना महाराष्ट्र में चुनावी तस्वीर साफ होने के साथ फिर फ्रंटफुट पर आ चुकी है. और दावा ये है कि सरकार बनी तो सत्ता में साझेदारी आधी-आधी करनी होगी. ऐसा कहना शिवसेना नेता संजय राउत का है. तो क्या भाजपा को गठबंधन का धर्म निभाना महंगा न पड़ जाए.

क्या रहा रुझानों का गुणा-गणित

एग्टिज पोल से मिले इशारों पर बीजेपी ने महाराष्ट्र में लड्डू बनाने की जो शुरुआत की थी, चुनावी नतीजों के रुझानों ने उसे करारा झटका दे दिया. वोटों की गिनती के दौरान शुरू में ही ऐसा लगने लगा था कि फडणवीस सरकार के छह मंत्री पंकजा मुंडे, राम शिंदे, अतुल सवे, विजय शिवतारे, बाला भेगड़े, मदन येरावर हारते नजर आ रहे थे.

हालांकि, शुरुआती रुझानों में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन 180 से ज्यादा सीटों पर आगे चल रही थी. लेकिन बाद में ये फिसलकर 160 के आसपास पहुंच गया. ये आंकड़ा बता रहा है कि चार महीने पहले मई आए लोकसभा के चुनावी नतीजों को ये गठबंधन महाराष्ट्र में पूरी तरह बरकरार नहीं रख पाया. दोनों पार्टियों के प्रदर्शन को अलग-अलग देखें तो बीजेपी को हुआ नुकसान साफ नजर आता है.

4 महीने में हुआ खासा नुकसान

इसी साल मई में महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में बीजेपी ने 41 सीटों पर जीत मिली थी. इन 41 लोकसभा सीटों में कुल 226 विधानसभा सीटें आती हैं. इसी समीकरण को ध्यान में रखकर बीजेपी आलाकमान ने अबकी बार महाराष्ट्र में 220 पार का नारा दिया था.

इस बीच नतीजों की तस्वीर साफ ही हो रही थी, रुझान आते ही एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार सामने आए और ये बयान दिया कि 'जनता ने बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के अबकी बार 220 पार नारे को नकार दिया.'

बढ़ गई शिवसेना की ताकत

महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावी नतीजों में महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की सरकार बनने का रास्ता तो साफ दिखा. लेकिन तय लक्ष्य से दूर होने और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को एग्जिट पोल के अनुमानों से बेहतर प्रदर्शन ने शिवसेना की बारगेनिंग (मोलभाव) पावर बढ़ा दी है. अगर सीट फॉर्मूला की बात करें, तो तस्वीर ये साफ बयां कर रही हैं, कि अगर शिवसेना चाहे तो यहां, तख्तापटल के हालात पैदा कर सकती है. और नतीजों की तस्वीर साफ होने से पहले ही एनसीपी ने शिवसेना को ऑफर भी कर दिया है. शिवसेना की ताकत में इजाफा तो हुआ है, वो मोलभाव करने की स्थिति में आ गई है, लेकिन अभी भाजपा और शिवसेना की तरफ से गठबंधन पर आंच आने की बात सामने नहीं आई है.

उद्धव ठाकरे ने पहले ही किया था इशारा!

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सीट बंटवारे में भले ही बीजेपी को बड़ा भाई मान लिया था. लेकिन सत्ता समीकरण में उसका गेमप्लान क्या है. इसका इशारा अपने बेटे और युवासेना के मुखिया आदित्य ठाकरे को सत्ता की सीधी लड़ाई में उतार कर साफ कर दिया था. आदित्य ठाकरे के नाम के एलान होने से एक दिन पहले ही उद्धव ठाकरे ने कहा था कि महाराष्ट्र का सीएम शिवसेना बनेगा. इसका वादा उन्होंने बाला साहेब ठाकरे से किया था.

आपको बता दें 2014 में बीजेपी से अलग चुनाव लड़कर शिवसेना ने 63 सीटों पर जीत हासिल की थी. बाद में सत्ता में साझीदार बनी थी. इस बार भी वो अपने प्रदर्शन को बरकरार रखने में कामयाब रही. ऐसे जाहिर है वो सत्ता में बराबर की साझेदारी का दावा आसानी से छोड़ने वाली नहीं है. ऐसे में ये सवाल उठना गलत नहीं है कि गठबंधन धर्म का पालन करना, क्या भाजपा को महंगा पड़ सकता है.