राहुल कांग्रेस अध्यक्ष तो बन जाएंगे, इन चुनौतियों से कैसे पार पाएंगे ?

राहुल गांधी ने भी फिर से पार्टी अध्यक्ष बनने के वरिष्ठ नेताओं के अनुरोध पर ये कहा है कि वो विचार करेंगे.

Written by - Shalini Tiwari | Last Updated : Oct 17, 2021, 10:46 PM IST
  • क्या खत्म होगी कांग्रेस की मुश्किलें ?
  • पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आपसी रार
राहुल कांग्रेस अध्यक्ष तो बन जाएंगे, इन चुनौतियों से कैसे पार पाएंगे ?

नई दिल्ली: 2024 के आम चुनाव से पहले एक बार फिर क्या कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथों में होगी? क्या कांग्रेस में राहुल युग की शुरुआत होगी?

कांग्रेस वर्किंग कमेटी की शनिवार को हुई बैठक से छन-छन कर जो बाहर आया, उससे तो फिलहाल यही लगता है कि कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव महज एक औपचारिकता होगी और अगले साल यानि अक्टूबर 2022 में राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिए जाएंगे. राहुल गांधी ने भी फिर से पार्टी अध्यक्ष बनने के वरिष्ठ नेताओं के अनुरोध पर ये कहा है कि वो विचार करेंगे.

गांधी परिवार को चुनौती देने वाला है कोई?

बीजेपी की सुनामी और मोदी की लोकप्रियता के बीच कांग्रेस की डूबती नैया सिर्फ गांधी परिवार ही बचा सकता है यही फिलहाल कांग्रेसियों की सोच है. वैसे भी पूर्व में सोनिया गांधी की अध्यक्षता को चुनौती देने वाले जीतेन्द्र प्रसाद और राजेश पायलट का क्या हश्र हुआ, ये सबको पता है.

ऐसे में अध्यक्ष पद के चुनाव का पूरा ड्रामा सिर्फ इसलिए होना है ताकि देश को दिखाया जा सके कि कांग्रेस भी एक लोकतांत्रिक पार्टी है. वरना ये सच हर कांग्रेसी जानता है कि वर्तमान में अध्यक्ष पद पर या मां, नहीं तो पुत्र, बस दो ही अध्यक्ष पद के दावेदार हैं. 

क्या खत्म होगी कांग्रेस की मुश्किलें ?

दरअसल कांग्रेस को गांधी परिवार की बैसाखी की लत लगी हुई है जो बर्बादी के कगार पर पहुंचने के बाद भी छूट नहीं रही. वैसे भी लत आसानी से छूट जाए तो लत किस बात की.

पर सवाल ये है कि क्या सिर्फ कांग्रेस को अंतरिम अध्यक्ष की जगह पूर्णकालिक अध्यक्ष मिलने से कांग्रेस की मुश्किलें खत्म हो जाएंगी. फिर चाहे वो पंजाब हो, छत्तीसगढ़ हो या फिर राजस्थान. ये वो राज्य हैं जहां कांग्रेस सत्ता में है लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर कांग्रेसी नेताओं में रार चरम पर है.

पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आपसी रार

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ पहले तो सिद्धू ने बगावत का झंडा बुलंद किया. फिर सिद्धू की रजामंदी से चन्नी सीएम तो बने लेकिन चन्नी के फैसलों पर भी सिद्धू ने सवाल खड़े किए और अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. हालात ये है कि सिद्धू अब ना सिर्फ चन्नी बल्कि राहुल और प्रियंका की समझदारी पर भी सवाल उठा रहे हैं. ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की राह कठिन है और अगर चुनाव बाद कांग्रेस सत्ता में आई भी तो सीएम की कुर्सी के लिए सिरफुटव्वल तय है.

बात राजस्थान की करें तो वहां भी कांग्रेस में हालात जुदा नहीं हैं. सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच की रार जग जाहिर है, जो कभी भी कांग्रेस के लिए परेशानी ख़ड़ी कर सकती है. राहुल गांधी कांग्रेस की कमान संभालते हैं तो सवाल ये रहेगा कि क्या राहुल राजस्थान में युवा नेता सचिन पायलट की सुनेंगे या वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत की ? राहुल का हाल ऐसे में  एक तरफ कुंआ दूसरी तरफ खाई वाला रहेगा. 

कांग्रेस शासित तीसरे राज्य छत्तीसगढ़ की हालत एकदम उलट है. यहां कहा जाता है कि सरकार गठन के वक्त ढ़ाई- ढ़ाई साल का फार्मूला बनाया गया था कि ढ़ाई साल भूपेश बघेल सीएम की कुर्सी संभालेंगे तो ढाई साल टीएस सिंह देव मुख्यमंत्री बनेंगे लेकिन ढ़ाई साल बीतने पर बघेल ने कुर्सी छोड़ने से इंकार कर दिया और अपने विधायकों को साथ लेकर शक्ति प्रदर्शन के लिए आलाकमान के दरबार में पहुंच गए.

यहां स्थिति राजस्थान से अलग इसलिए है क्योंकि जिन टीएस सिंह देव की कथित तौर पर सीएम बनने की बारी थी वे राजनीति से रिटायरमेंट की उम्र में हैं और बघेल अपेक्षाकृत युवा हैं. यहां कि रार को थामना भी राहुल गांधी के लिए टेढ़ी खीर है क्योंकि टीएस सिंह देव खेमे में भी कांग्रेस विधायकों की संख्या ठीक-ठाक बताई जाती है.

सोनिया ने पढ़ाया अनुशासन का पाठ

इस बात से वाकिफ सोनिया गांधी भी हैं और राहुल गांधी भी. सोनिया ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में कहा भी कि हमारे सामने कई चुनौतियां आएंगी, लेकिन अगर हम एकजुट रहते हैं एवं अनुशासित रहते हैं और सिर्फ पार्टी के हित पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो मुझे पूरा विश्वास है कि हम अच्छा करेंगे.

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सोनिया ने कहा- पूरा संगठन चाहता है कि कांग्रेस फिर से मजबूत हो लेकिन इसके लिए जरूरी है कि एकजुटता हो और पार्टी के हित को सर्वोच्च रखा जाए. इन सबसे ऊपर आत्मनियंत्रण और अनुशासन की जरूरत है.

बहरहाल कांग्रेस के सामने अंदरुनी चुनौतियां कई हैं पर गाँधी परिवार के लिए समर्पित कांग्रेसियों के आगे ये सारी चुनौतियां, परेशानियां और सवाल महत्वहीन हो जाते हैं.

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