कैसे चिराग को चाचा ने किया चित? पढ़िए पूरी कहानी

चाचा से जारी घमासान में चिराग पासवान को बड़ा झटका लगा है. लोकसभा अध्यक्ष ने भी चिराग के चाचा पशुपति पारस को संसदीय दल का नेता मान लिया है. 4 सांसद पारस के साथ हैं और रामविलास के चिराग अकेले पड़ गए.

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Jun 15, 2021, 12:20 AM IST
  • LJP में घमासान के बीच चिराग को झटका
  • लोकसभा अध्यक्ष ने चाचा पारस को माना नेता

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कैसे चिराग को चाचा ने किया चित? पढ़िए पूरी कहानी

नई दिल्ली: लोक जनशक्ति पार्टी में जारी घमासान से जुड़ी अहम जानकारी ये है कि चिराग पासवान को बड़ा झटका लगा है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने पशुपति पारस को पार्टी का नेता बनाने की अधिसूचना जारी कर दी है. इसके साथ ही पशुपति पारस लोक जनशक्ति पार्टी के संसदीय दल के नेता चुन लिए गए हैं, चिराग अकेले पड़ गए हैं.

चाचा ने चिराग को दिया झटका

LJP में जारी घमासान के बीच चिराग को झटका लग गया. लोकसभा अध्यक्ष ने पशुपति पारस को LJP का नेता मान लिया है. लोकसभा में पारस लोजपा संसदीय दल के नेता बन गए हैं. 6 में से 5 सांसदों ने पारस को चुनाव है.

सोमवार की शाम लोकसभा सचिवालय ने आदेश निकाला है. इसमें पशुपति कुमार पारस को लोजपा संसदीय दल का नेता बताया गया है. आदेश में लोजपा के सांसदों की सख्या 6 बतायी गई है. लोकसभा में चिराग पासवान के नेता भी पशुपति कुमार पारस होंगे.

यहीं से शुरू हुआ टूट का सिलसिला

21 साल पहले रामविलास पासवान ने जब LJP बनाई थी तो उन्होंने ये सोचा भी नहीं होगा कि उनकी मौत के एक साल के अंदर पार्टी ऐसे बिखड़ने लगेगी. भाई का रास्ता अलग होगा और बेटे का अलग.. लेकिन अब एलजेपी की सच्चाई यही है कि पार्टी पर कब्जे को लेकर परिवार में ही जंग छिड़ गई है और सवाल है ये क्यों हुआ.

दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव के पहले रामविलास पासवान का निधन हो गया था. चिराग चाहते थे कि LJP अकेले चुनाव लड़ें और पार्टी के कई सदस्य NDA के साथ चुनाव लड़ना चाहते थे. तभी तो सबने चिराग की बात मान ली.

लेकिन जब नतीजे अच्छे नहीं रहे थे. पशुपति पारस की अगुवाई में चिराग को छोड़कर सब एक होने लगे और जब पिछले दिनों मोदी कैबिनेट के विस्तार की ख़बर शुरू हुई तो पशुपति पारस ने LJP पर कब्जे का दांव फेंक दिया.

24 घंटे में हो गया सारा खेल

एलजेपी में 24 घंटे के भीतर जो हुआ है उस पर अभी तक चिराग पासवान की जुबान नहीं खुल रही है. अब सवाल ये है कि पशपुति पारस की अगुवाई में एलजेपी जब नीतीश कुमार को समर्थन करेगी तो बिहार की राजनीति में कैसे कैसे बदलाव हो सकते हैं. क्या जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी की VIP पार्टी को बैलेंस करना नीतीश कुमार के लिए आसान होगा?

पारस ने सोमवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सराहना करते हुए उन्हें एक अच्छा नेता तथा ‘विकास पुरुष’ बताया और इसके साथ ही पार्टी में एक बड़ी दरार उजागर हो गई क्योंकि पारस के भतीजे चिराग पासवान जद (यू) अध्यक्ष के धुर आलोचक रहे हैं.

हाजीपुर से सांसद पारस ने कहा, ‘मैंने पार्टी को तोड़ा नहीं, बल्कि बचाया है’ उन्होंने कहा कि लोजपा के 99 प्रतिशत कार्यकर्ता पासवान के नेतृत्व में बिहार 2020 विधानसभा चुनाव में जद (यू) के खिलाफ पार्टी के लड़ने और खराब प्रदर्शन से नाखुश हैं.

टूट की कगार पर थी लोजपा

चुनाव में खराब प्रदर्शन के संदर्भ में उन्होंने कहा कि लोजपा टूट के कगार पर थी. उन्होंने पासवान के एक करीबी सहयोगी को संभावित तौर पर इंगित करते हुए पार्टी में 'असमाजिक' तत्वों की आलोचना की. पासवान से उस नेता की करीबी पार्टी के कई नेताओं को खटक रही थी.

पारस ने कहा कि उनका गुट भाजपा नीत राजग सरकार का हिस्सा बना रहेगा और पासवान भी संगठन का हिस्सा बने रह सकते हैं. चिराग पासवान के खिलाफ हाथ मिलाने वाले पांच सांसदों के समूह ने पारस को सदन में लोजपा का नेता चुनने के अपने फैसले से लोकसभा अध्यक्ष को अवगत करा दिया है और स्पीकर ओम बिरला ने अधिसूचना जारी कर दी है.

जब चाचा से मिलने पहुंचे चिराग

सोमवार को चिराग पासवान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित चाचा पारस के आवास पर चिराग उनसे मिलने पहुंचे. चिराग पासवान के रिश्ते के भाई एवं सांसद प्रिंस राज भी इसी आवास में रहते हैं.

बीते कुछ समय से पासवान की तबीयत ठीक नहीं चल रही, उन्होंने 20 मिनट से ज्यादा समय तक अपनी गाड़ी में ही इंतजार किया जिसके बाद वह घर के अंदर जा पाए और एक घंटे से भी ज्यादा समय तक घर के अंदर रहने के बाद वहां से चले गए. उन्होंने वहां मौजूद मीडियाकर्मियों से कोई बात नहीं की.

ऐसा माना जा रहा है कि दोनों असंतुष्ट सांसदों में से उनसे किसी ने मुलाकात नहीं की. एक घरेलू सहायक ने बताया कि पासवन जब आए तब दोनों सांसद घर पर मौजूद नहीं थे.

काम करने के तरीके से नाखुश

सूत्रों ने बताया कि असंतुष्ट लोजपा सांसदों में प्रिंस राज, चंदन सिंह, वीणा देवी और महबूब अली कैसर शामिल हैं, जो चिराग के काम करने के तरीके से नाखुश हैं. इन नेताओं का मानना है कि नीतीश कुमार के खिलाफ लड़ने से प्रदेश की सियासत में पार्टी को नुकसान हुआ. कैसर को पार्टी का उप नेता चुना गया है.

इस गुट के निर्वाचन आयोग के समक्ष असली लोजपा का प्रतिनिधित्व करने का दावा ठोकने की भी उम्मीद है क्योंकि पिछले साल अपने पिता रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद पार्टी अध्यक्ष चिराग पासवान अलग-थलग होते दिख रहे हैं. गुट आने वाले वक्त में पासवान को पार्टी अध्यक्ष पद से भी हटा सकता है.

उनके करीबी सूत्रों ने जनता दल (यूनाइटेड) को इस विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि पार्टी लंबे समय से लोजपा अध्यक्ष को अलग-थलग करने की कोशिश कर रही थी क्योंकि 2020 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ जाने के चिराग के फैसले से सत्ताधारी पार्टी को काफी नुकसान पहुंचा था.

लोजपा के कारण 35 सीटें हारी जेडीयू

लोजपा उम्मीदवारों की मौजूदगी के कारण 35 सीटों पर अपने प्रत्याशियों की हार का सामना करने वाली जदयू पहली बार राज्य में भाजपा से कम सीट पाई और यही वजह है कि वह लोजपा के कई सांगठनिक नेताओं को अपने पाले में लाने की लिये प्रयासरत थी. लोजपा के एक मात्र विधायक ने भी जदयू का दामन थाम लिया था.

पशुपति पारस ने इन आरोपों को खारिज किया कि पार्टी के विभाजन में कुमार का कोई हाथ है. भाजपा ने इस मामले में फिलहाल चुप्पी साध रखी है और कुछ पार्टी नेताओं का कहना है कि यह लोजपा का आंतरिक मामला है.

विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने के लिये बिहार में सत्ताधारी राजग से अलग होने वाले पासवान ने हालांकि नरेंद्र मोदी और भाजपा समर्थक रुख कायम रखा था.

मंत्रिमंडल में फेरबदल की सुगबुगाहट

केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की सुगबुगाहट के बीच सियासी समीकरणों पर नजर रखने वालों का मानना है कि यह कदम पासवान को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने से रोकने का प्रयास है हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि भगवा दल लोजपा में इस फूट को कैसे देखता है.

बिहार में सत्ता में साझेदारी के बावजूद भाजपा और जदयू के रिश्ते बहुत अच्छे स्तर पर नहीं हैं और विधानसभा चुनावों में झटके के बाद कुमार अपनी पार्टी की ताकत बढ़ाने के लिये विभिन्न उपाय करते नजर आ रहे हैं.

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सूत्रों ने कहा कि पारस को भी भाजपा के मुकाबले नीतीश कुमार के ज्यादा करीब माना जाता है और पासवान को पूरी तरह हाशिये पर ढकेल दिया जाना पार्टी का एक वर्ग नहीं चाहेगा, भले ही पार्टी का एक वर्ग उनके व्यवहार को लेकर बहुत खुश न हो.

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