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दबे पांव आपके जीवन में जगह बना रहा एक नए तरह का प्रदूषण

प्रदूषण की समस्या से पूरा विश्व कितना बेहाल है, ये बात किसी से छुपी नहीं है. अब तक दुनिया कार्बन जनित और प्लास्टिक प्रदूषण से होने वाले नुकसान को ही जानती थी, लेकिन अब एक और नए तरह का प्रदूषण धीरे-धीरे पर्यावरण में अपनी जगह बना रहा है. वो कोई और नहीं नाइट्रोजन जनित प्रदूषण है.  

दबे पांव आपके जीवन में जगह बना रहा एक नए तरह का प्रदूषण

नई दिल्ली: नाइट्रोजन प्रदूषण धीरे-धीरे एक विकट समस्या बनते जा रहा है, जिसका असर न सिर्फ पर्यावरण तक सीमित है बल्कि मिट्टी की उर्वरक क्षमता से लेकर मानव शरीर को नुकसान पहुंचा सकने में सक्षम है. इसको लेकर दुनिया के सभी देशों के राजनायिक श्रीलंका के कोलंबो में इकठ्ठे हुए और इस समस्या के निपटारे को लेकर 'कोलंबो डिक्लेरेशन' पर हस्ताक्षर किए. इसमें 2030 तक नाइट्रोजन के प्रयोग और उससे होने वाली समस्याओं को आधा करने का लक्ष्य रखा गया है. 

2030 तक आधा हो जाएगा नाइट्रोजन प्रदूषण

श्रीलंका में इस दो दिन के कार्यकर्म को संयुक्त राष्ट्र के UNEP (United nation environmental programme) के सहयोग से आयोजित कराया गया. इसमे संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि शामिल थे. यूनाइटेड नेशन इंनवॉरमेंटल प्रोग्राम ने ट्वीट कर कहा कि नाइट्रोजन का अत्याधिक प्रयोग हमारे पर्यावरण और ग्रह पर नकारात्मक प्रभाव डालता है. इसके साथ ही यह वायुमंडल संकट का भी बड़ा कारण है. इसलिए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने 2030 तक नाइट्रोजन प्रदूषण को आधा करने के लिहाज से कोलंबो डिक्लेरेशन पर सर्वसम्मति जताई है. 

फ्रंटियर्स रिपोर्ट में शामिल नाइट्रोजन प्रदूषण भी

पिछले दिनों यूनाइटेड नेशन इंवॉरमेंटल असेंबली ने एक 'फ्रंटियर्स रिपोर्ट' 2019 जारी किया. संयुक्त राष्ट्र ने इसमें एक नया अध्याय नाइट्रोजन प्रदूषण भी जोड़ा ताकि इससे होने वाले नुकसानों का पता लगा, उन्हें कम किया जा सके. दिलचस्प बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने इस बार कार्बन प्रदूषण की तरह इसके फैल जाने तक इंतजार नहीं किया जैसे पेरिस समझौते के लिए किया गया. इसको दूर करने को कमर कस तैयार हो गई और सदस्य देशों को भी मना लिया. 

मिट्टी की उत्पादकता के लिए जरूरी है नाइट्रोजन

नाइट्रोजन प्रदूषण हालांकि कोई नई बात नहीं है. 90 के दशक के बाद से किसानों ने फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मिट्टी की उर्वरकता को बढ़ाने पर जोर दिया. तरीका निकाला गया कि मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाना होगा. फिर क्या था कई खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल बड़ी तेजी से होने लगा. राइजोबिया नामक जीवाड़ु को भी मृदा की उर्वरक क्षमता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल में लाया जाने लगा. इससे न सिर्फ मिट्टी की प्राकृतिक अवस्था पर प्रभाव पड़ा बल्कि इन खादों का छिड़काव धीरे-धीरे मिट्टी और पानी के साथ घुलकर जमीन के अंदर के स्वच्छ पानी में मिलने लगे. इससे ग्राउंड वाटर भी बुरी तरह प्रभावित हुआ. अब स्थितियां ये बन आईं कि अशुद्ध पानी के इस्तेमाल जिसमें अमोनिया और नाइट्रेट की मात्रा ज्यादा थी, उससे सेहत पर बुरा असर पड़ने लगा. 

वायुमंडल में सबसे ज्यादा पाया जाता है नाइट्रोजन 

जाहिर है कि हमारे ग्रह पृथ्वी पर तकरीबन 78 फीसदी नाइट्रोजन पाया जाता है. इससे जरूरी अमीनो अम्ल (amino acid) प्राप्त होता है. लेकिन ना ही पौधे और ना ही कोई जीव-जंतु इसे सीधे उपयोग में ला सकते हैं. इसके लिए नाइट्रोजन चक्र की आवश्यकता पड़ती है, जो फिलहाल काफी प्रभावित होता दिख रहा है. नाइट्रोजन हमारे जीवन के लिए एक जरूरी गैस है. इसलिए जरूरी है कि इसका इस्तेमाल भी उचित मात्रा में ही किया जाए.

नाइट्रोजन उपयोग के मामले में भारत दूसरे स्थान पर

1969 के हरित क्रांति के बाद हाइब्रिड बीज और मिट्टी की उर्वरकता बढ़ाने वाले पदार्थों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होने लगा. दौ वैज्ञानिक फ्रिच हैबर और कार्ल बॉच ने अमीनो एसिड बनाने का फॉर्मूला खोज निकाला जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन को बढ़ाया जा सके. इस प्रक्रिया को हैबर-बॉच मौडल का नाम दिया गया. भारत में इसका उपयोग बड़ी तेजी से बढ़ने लगा. इतना ज्यादा कि विश्व में चीन (44.97 मिलियन टन) के बाद नाइट्रोजन के प्रयोग के मामले में भारत (16.48 मिलियन टन) दूसरे स्थान पर है. 2014 में केमिक्लस और फर्टिलाइजर्स मंत्रालय की ओर से भारतीय फर्टिलाइजर सिनेरियो ने एक रिपोर्ट निकाला. इस रिपोर्ट में यूरिया के इस्तेमाल में 2000 के बाद से 50 फीसदी की वृद्धि बताई गई है. इसके अलावा देश के 8 राज्यों बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, तामिलनाडू, पुदुचेरी और आंध्रप्रदेश में नाइट्रोजन का प्रयोग प्रति हेक्टेयर 100 किलो के जितना है. 

UK ने 20 बिलियन डॉलर के सहयोग का रखा प्रस्ताव

नाइट्रोजन का अत्याधिक प्रयोग भारतीय किसानों ने भी खूब किया. दरअसल, उत्पादकता बढ़ाने के लिए किसान इसका इस्तेमाल जितना मन उतना करने लगे थे. इससे ग्राउंड वाटर में अल्यूमिनियम और अन्य हानिकारक मेटल्स की मात्रा बढ़ने लगी. हालांकि, भारत जैसे विकासशील और जनसंख्या बहुल देश में खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादकता को बढ़ाना भी आवश्यक है. भारत के सामने यह किसी चुनौती से कम नहीं कि बढ़ती जरूरतों की भी आपूर्ति कर सके और साथ ही नाइट्रोजन के प्रयोग को भी कम से कम किया जा सके. यूनाइटेड किंगडम ने ऩाइट्रोजन के प्रयोग को कम करने के लिए दक्षिण एशियाई देशों को 20 बिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता का प्रस्ताव भी रखा है. विश्व के सभी देशों का एक साथ आना ये संकेत है कि इस दिशा में कुछ बेहतर काम किया जा सकता है.