कोरोना सिर्फ एक झलक है, बेजुबानों पर जुल्म नहीं रुका तो और फैलेंगे वायरस

मासूम जानवरों पर जुल्म किया तो प्रकृति दंड देती है. भारत में तो परंपरागत रुप से हजारो सालों से लोग ये सत्य जानते हैं. लेकिन अब संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था ने वैज्ञानिक रिसर्च के आधार पर ऐसा ही निष्कर्ष निकाला है. 

कोरोना सिर्फ एक झलक है, बेजुबानों पर जुल्म नहीं रुका तो और फैलेंगे वायरस

नई दिल्ली: इंसान ने यदि जीवों को अपने स्वाद के लिए मारना और उनका उत्पीड़न करना बंद नहीं किया तो कोरोना जैसे और भी कई घातक वायरस हमला कर सकते हैं. 

संयुक्त राष्ट्र की संस्था ने बताया
यूएन इन्वायरमेंट प्रोग्राम एंड इंटरनेशनल लाइवस्टॉक रिसर्च इन्स्टीट्यूट ने एक रिसर्च प्रकाशित की है. जिसके मुताबिक स्वाद के लिए इंसान द्वारा जानवरों पर किया जा रहा जुल्म कोरोना जैसे संक्रमण की वजह बन रहा है. 
संयुक्त राष्ट्र की इस संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक अगर हमने जानवरों खास तौर पर जंगली जीवों को मारना और उनका उत्पीड़न करना जारी रखा तो कोरोना वायरस जैसी कई और घातक बीमारियां इंसानी सभ्यता को तबाह कर सकती हैं. 

मनुष्य की कई आदतें हैं जिम्मेदार
इस रिपोर्ट के मुताबिक विकास के नाम पर मनुष्य जितने भी कदम उठा रहा है. वह उसके भविष्य के लिए घातक साबित हो रहा है. इसके लिए कई कारक जिम्मेदार हैं. जैसे-
- पर्यावरण को लगातार पहुंचाया जाने वाला नुकसान
-विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों को दोहन
-औद्योगिक गतिविधियों के कारण होने वाला जलवायु परिवर्तन
-पशुओं का उत्पीड़न

'जूनोटिक डिजीज़' का प्रकोप
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने अपने शोध के जरिए यह साबित किया है कि पिछले कुछ सालों पशु पक्षियों के जरिए इंसानों में फैलने वाली बीमारियों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है. इस तरह की बीमारियों को 'ज़ूनोटिक डिज़ीज़' का नाम दिया गया है. 
वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि कोरोना वायरस तो महज एक बानगी है. अगर विकास के नाम पर पर्यावरण का विनाश और स्वाद के लिए जानवरों पर किया जाने वाला जुल्म बंद नहीं किया गया तो कोरोना जैसे और भी कई घातक वायरस मानव सभ्यता पर हमला कर सकते हैं. 
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ये बताती है कि मनुष्य ने अपनी बढ़ती आबादी की प्रोटीन की मांग पूरी करने के लिए जानवरों को बेरहमी से मारना तेज कर दिया है. लेकिन इसका बुरा प्रभाव आखिरकार इंसानों को ही झेलना पड़ रहा है. 

यूनाइटेड नेशन के पर्यावरण कार्यक्रम की ED इंगर एंडरसन के मुताबिक पिछले 50 सालों में मांस का उत्पादन 260 फीसदी बढ़ गया है. खेती का रकबा बढ़ाने के लिए पर्यावरण नष्ट किया गया. जंगली जानवरों के प्राकृतिक निवास से छेड़खानी की गई और उन्हें मारा गया. यह सभी नई बीमारियों के पैदा होने का कारण बन रहे हैं.  
बढ़ रही हैं बीमारियां
विशेषज्ञों ने आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि जानवरों के कारण पैदा होने बीमारियों की वजह से प्रति वर्ष लगभग 20 लाख लोग बेमौत मारे जाते हैं. 
जानवरों से होने वाली बीमारियां यानी 'ज़ूनोटिक डिज़ीज़' लगातार बढ़ती जा रही हैं. कोरोना वायरस के अतिरिक्त इबोला, बर्ड फ्लू, सार्स जैसी सभी बीमारियां जानवरों से ही फैली थीं. 
इस तरह की बीमारियां जानवरों में मौजूद होती हैं. यानी जानवर इन बीमारियों के वायरस के कैरियर होते हैं. लेकिन जब मनुष्य स्वाद के लिए इन जानवरों को मारकर खाता है तो यह घातक वायरस उसके शरीर में भी फैल जाते हैं. जिसकी वजह से मनुष्य कीड़े मकोड़ों की तरह मरने लगते हैं. 
पिछले कुछ समय से फैले घातक 'ज़ूनोटिक डिज़ीज़' में सबसे बुरा प्रभाव कोरोना वायरस का देखा गया. 
वायरस प्रभाव के अलावा भी एशिया और अफ्रीका जैसे देशों में जानवरों की वजह से होने वाले टीबी, रैबीज, गिल्टी जैसे रोगों से इंसानों की मौत हो रही है. यूएन रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले 100 सालों में इंसानी सभ्यता कोरोना जैसे नए तरह के वायरसों के 6 खतरनाक संक्रमणों के दौर से गुजर चुकी है. 
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अगर नई तरह की बीमारियों के खतरों से बचना है तो पर्यावरण को सुरक्षित रखना होगा और अपने खान पानी की आदतें सुधारनी होंगी.  

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कोरोना जैसे संक्रमण से बचने के लिए पूरी दुनिया को सनातन जीवन पद्धति के अनुसार जीवन व्यतीत करना होगा.