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PM मोदी की डिग्री देखने की जिद पर केजरीवाल पर हाईकोर्ट ने लगाया 25 हजार का जुर्माना

गुजरात उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री के संबंध में सीआईसी के आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें यूनिवर्सिटी को मोदी की डिग्री केजरीवाल को मुहैया कराने के  आदेश दिए गए थे. कोर्ट ने इस मांग के लिए केजरीवाल पर 25 हजार का जुर्माना भी लगाया है. 

PM मोदी की डिग्री देखने की जिद पर केजरीवाल पर हाईकोर्ट ने लगाया 25 हजार का जुर्माना

अहमदाबादः गुजरात हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के सात साल पुराने उस ऑर्डर को शुक्रवार को रद्द कर दिया, जिसमें गुजरात यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री के बारे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जानकारी मुहैया कराने को कहा गया था. सीआईसी के ऑर्डर के खिलाफ गुजरात यूनिवर्सिटी की अपील को मंजूर करते हुए न्यायमूर्ति बीरेन वैष्णव ने केजरीवाल पर 25,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है और उन्हें चार सप्ताह के अंदर गुजरात राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जुर्माने की रकम जमा करने के लिए कहा है. 

यूनिवर्सिटी ने सूचना आयोग के आदेश को दी थी चुनौती 
अरविंद केजरीवाल के वकील पर्सी कविना की अपील के बावजूद जस्टिस वैष्णव ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. अप्रैल 2016 में तत्कालीन केंद्रीय सूचना आयुक्त एम श्रीधर आचार्युलु ने दिल्ली यूनिवर्सिटी और गुजरात युनिवर्सिटी को मोदी को दी गई डिग्रियों के बारे में केजरीवाल को जानकारी देने निर्देश दिया था. वहीं, तीन महीने बाद, गुजरात हाईकोर्ट ने सीआईसी के आदेश पर रोक लगा दी, जब यूनिवर्सिटी ने उस आदेश के खिलाफ अदालत का रुख किया. 

जानकारी को ‘छिपाना’ क्यों चाहती है यूनिवर्सिटी 
वकील पर्सी कविना ने कहा कि सीआईसी का यह ऑर्डर अरविंद केजरीवाल द्वारा केंद्रीय सूचना आयुक्त एम श्रीधर आचार्युलु को पत्र लिखे जाने के एक दिन बाद आया था, जिसमें कहा गया था कि उन्हें (केजरीवाल) अपने सरकारी रिकॉर्ड को सार्वजनिक किए जाने से कोई ऐतराज नहीं है, और हैरानी की बात है कि सूचना आयोग मोदी की शैक्षणिक योग्यता के बारे में जानकारी को ‘‘छिपाना’’ क्यों चाहता है? पत्र के आधार पर आचार्युलु ने गुजरात यूनिवर्सिटी को अरविंद केजरीवाल को मोदी की शैक्षणिक योग्यता का रिकॉर्ड देने का निर्देश दिया था. 

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सरकार इस आधार पर कर रही है विरोध 
पिछली सुनवाइयों के दौरान, गुजरात यूनिवर्सिटी ने सीआईसी के आदेश पर ऐतराज जताते हुए कहा था कि सूचना का अधिकार कानून के तहत किसी की ‘गैर-जिम्मेदाराना बचकानी जिज्ञासा’ सार्वजनिक हित नहीं बन सकती है. फरवरी में हुई पिछली सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय की जानिब से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दावा किया था कि छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है, क्योंकि प्रधानमंत्री की डिग्री के बारे में जानकारी ‘पहले से ही सार्वजनिक है’ और विश्वविद्यालय ने पूर्व में एक खास तारीख पर अपनी वेबसाइट पर जानकारी को सार्वजनिक भी कर दिया था. 

विरोधियों के खिलाफ बचकाना हरकत करने के लिए नहीं है कानून 
सीआईसी के आदेश का पालन नहीं करने के लिए आरटीआई कानून के तहत दिए गए अपवादों का हवाला देते हुए, मेहता ने यह भी दलील दी थी कि आरटीआई कानून का इस्तेमाल ‘हित साधने’ और विरोधियों के खिलाफ बचकाना हरकत करने के लिए किया जा रहा है. आरटीआई कानून की धारा 8 के तहत दी गई छूट के बारे में सुप्रीम कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए पूर्व के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए, मेहता ने ये दलील भी दी थी कि कोई किसी की व्यक्तिगत जानकारी महज इसलिए नहीं मांग सकता, क्योंकि वह इसके बारे में उत्सुक है.

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