Suvigya Jain

क्या इस बार भी विवाद से बच पाएगा साहित्य का नोबेल

क्या इस बार भी विवाद से बच पाएगा साहित्य का नोबेल

यह नोबेल पुरस्कारों के ऐलान का हफ्ता है.

क्या वाकई गांधी को मानने का वक्त आ गया?

क्या वाकई गांधी को मानने का वक्त आ गया?

आज गांधी जयंती है. बापू को याद करने के लिए आवंटित दिन. आज के दिन कई जगह गांधी की याद में कार्यक्रम आयोजित होते हैं. तीन साल पहले आज के दिन ऐसे ही एक कार्यक्रम की मुझे याद आई.

BHU: छेड़खानी का विरोध और पीड़ितशास्त्र की याद

BHU: छेड़खानी का विरोध और पीड़ितशास्त्र की याद

बीएचयू में लड़की को छेड़ा गया. लड़कियों ने अपनी सुरक्षा की मांग की. उस पर घ्यान देने की बजाए प्रशासन ने पीड़ित लड़की को ही अपनी सुरक्षा के लिए सावधानी बरतने की समझाइश दे डाली.

मीडिया विमर्श से लुप्‍त होते मूल मुद्दे

मीडिया विमर्श से लुप्‍त होते मूल मुद्दे

हर जरूरी बात की चर्चा करने वाला देश का मीडिया खुद भी इस समय चर्चा में है. विश्व मीडिया भारत की खबरें यहां के मीडिया से ही उठाता है. यानी अपने देश के मीडिया पर विश्व मीडिया की नज़र भी है.

अब बाज़ार ही बचा-बढ़ा पाएगा हिन्दी को...

अब बाज़ार ही बचा-बढ़ा पाएगा हिन्दी को...

साल 2017 तक आते आते हिन्दी दिवस के बहाने हिन्दी पर ज्यादा बात करने का माहौल बचा नहीं है. सरकारी प्रतिष्ठानों में हिन्दी पखवाड़े के बैनर लगने के अलावा और कुछ होता हो यह भी नहीं दिखाई देता.

आखिर कुपोषण पर क्या सोचा नीति आयोग ने

आखिर कुपोषण पर क्या सोचा नीति आयोग ने

सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार के कामों और ऐलानों की लिस्ट बहुत लंबी है. इन कामों में एक यह था कि उसने योजना आयोग को खत्म करके नीति आयोग बनाया था. इसी नीति आयोग ने हाल ही में एक नया काम किया है.

शिक्षा और रोज़गार की बढ़ती दूरी

शिक्षा और रोज़गार की बढ़ती दूरी

शिक्षक दिवस का पर्व शिक्षा के किसी भी पहलू पर सोच विचार करने का भी अच्छा मौका होता है. इसीलिए आमतौर पर भारतीय शिक्षा प्रणाली पर भी इसी दिन कुछ बातें हो जाती हैं. क्या है? और क्या कम है?

गांव अगर शहर से कहे अपनी व्यथा

गांव अगर शहर से कहे अपनी व्यथा

‘किसान बदहाल है.' 'किसानी घाटे का सौदा है.' 'किसान आत्महत्या कर रहे हैं.' 'खेती में लागत तक नहीं निकल रही.' 'इस मौसम की फसल भी बर्बाद हो गई.' 

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