डियर जिंदगी : तुम खुश नहीं हो क्‍या...

डियर जिंदगी : तुम खुश नहीं हो क्‍या...
यह नाखुश, नाराज लोग किसी दूसरी दुनिया से नहीं आए हैं. यह रिश्‍तों के चक्रव्‍यूह में फंसे हुए अपने प्रिय ही हैं.

हमारे खुश रहने के लिए सबसे जरूरी क्‍या है! हमारा काम, बदले में मिलने वाली आय, रिश्‍तों में अपनापन, प्‍यार और क्‍या. हम एक बार विकल्‍प पर बात करनी शुरू करेंगे तो ढेर निकल आएंगे. लेकिन ऐसा सच है, क्‍या. एक उस पल में जब हम ठीक जिंदगी के भीतर होते हैं, कोई और हमारे साथ नहीं होता, ऐसा क्‍या है, जो हमें खुश करता है. मेरी असली खुशी का हासिल वहीं से मिलेगा. यह भी हो सकता है कि हम दुनिया को बताने के लिए एक खुशी रखते हैं और हमारे भीतर वाली खुशी दूसरी होती है. ऐसा इसलिए संभव है, क्‍योंकि हम अक्‍सर खुदसे झूठ बोलते रहते हैं. खुद से भागते रहते हैं. इस फेर में भटकते रहते हैं कि दूसरे हमें 'कैसा' समझें. हमारे बारे में दूसरो की राय जरूरी है, लेकिन वह इतनी जरूरी नहीं है कि उसके लिए मैं अपनी प्रसन्‍नता से दूर हो जाऊं.

हम अक्‍सर दूसरों से यह पूछते रहते हैं कि तुम खुश नहीं हो क्‍या! लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी सवाल यह है कि जब हम यह पूछ रहे हैं तो हम खुद कितने खुश हैं. मैं दूसरों को खुश देखना चाहता हूं लेकिन मैं कितना खुश हूं. क्‍योंकि जब तक मैं खुश नहीं हूं, यह संभव नहीं कि मुझसे जुड़े लोग खुश होंगे.

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खुशियां जहाज की तरह होती हैं. जिसमें कई छोटी-छोटी नावें सफर करती हैं. जहाज सबको साथ लेकर चलता है,और सब जहाज के साथ चलती हैं. तुम खुश नहीं हो क्‍या, एक सुंदर भावना है. दूसरे की फि‍क्र है, लेकिन क्‍या ऐसा इसलिए हुआ क्‍योंकि दूसरा कहीं पीछे छूटा हुआ महसूस कर रहा है. क्‍या यह सवाल हम उससे नहीं करते, जो हमारे साथ चलने के काबिल तो है, लेकिन कहीं पीछे रह गया है. अगर वह पीछे रह गया है, तो जाहिर तौर पर वह कुछ नाखुश ही होगा. उसके भीतर कुछ ऐसा टूटा होगा, जो उसे परेशान कर रहा है.

हमें समय रहते उस टूटन, उस पीड़ा को पकड़ना होगा. इससे पहले कि यह टूट अकेलेपन में बदले. स्‍वभाव में रूखापन आए. मन में छूट का भाव प्रबल होने से पहले नाखुशी के खरपतवार को जड़ से काटना जरूरी है. हमारे आसपास जो भी ऐसा है, जो परेशान है, नाखुश है. वह कभी न कभी किसी न किसी रूप में हमारी जिंदगी में परेशानी पैदा कर सकता है. इसलिए जितना संभव हो ऐसे लोगों से संवाद किया जाए. नाखुशी को भांपना अलग बात है, उसके समाधान के लिए विनम्रता से प्रयास करना अलग बात है.

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यह नाखुश, नाराज लोग किसी दूसरी दुनिया से नहीं आए हैं. यह रिश्‍तों के चक्रव्‍यूह में फंसे हुए अपने प्रिय ही हैं. इसलिए जितना संभव हो संवाद का पुल बना रहे. बात न टूटे. क्‍योंकि बात टूटते ही संबंधों में गांठ पड़ जाती है, और गांठ किसी भी रिश्‍ते को गला सकती है. इसलिए अपनों की जिंदगी के पास रहें, उनके साथ रहें. केवल शब्‍दों से नहीं, मन और प्रेम से भी.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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